मुंबई, 17 जून (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक महिला दुनिया से जा चुके अपने पूर्व पति की संपत्ति में से बकाया गुजारा भत्ता वसूल सकती है, लेकिन राशि बढ़ाने की मांग नहीं कर सकती क्योंकि इसकी अनुमति देने से याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी।
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ ने मई में पारित एक आदेश में कहा कि गुजारा भत्ते में उचित बढ़ोतरी तय करने के लिए पत्नी की जरूरतों और पति की वास्तविक आर्थिक क्षमता के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता है, लेकिन जब पति की मृत्यु हो चुकी हो, तब इस न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पक्ष मौजूद नहीं रहता।
खंडपीठ कुटुंब अदालत के आदेश के खिलाफ दायर नरेन गोरेगांवकर नामक व्यक्ति की पत्नी वर्षा (62) की अपील पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका के अनुसार गोरेगांवकर और वर्षा की शादी जनवरी 1974 में हुई थी, लेकिन 1977 में दोनों अलग हो गए और उनकी कोई संतान नहीं थी। 1980 में गोरेगांवकर ने तलाक के लिए याचिका दायर की, जो स्वीकार कर ली गई और गोरेगांवकर को वर्षा को प्रतिमाह 6,000 रुपये देने का आदेश दिया गया।
मार्च 2012 में गोरेगांवकर की मृत्यु के बाद वर्षा ने कुटुंब अदाल में बकाया गुजारा भत्ते की वसूली और बढ़ती महंगाई तथा चिकित्सा खर्चों को देखते हुए गुजारा भत्ते की राशि बढ़ाने की मांग की।
फरवरी 2023 में कुटुंब अदालत ने उन्हें गोरेगांव की संपत्ति से बकाया राशि वसूलने की अनुमति दे दी, लेकिन गुजारा भत्ता बढ़ाने की मांग खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।
गोरेगांवकर के कानूनी उत्तराधिकारियों की ओर से अधिवक्ता प्रदीप चव्हाण ने दलील दी कि बकाया गुजारा भत्ता उनकी संपत्ति से वसूला जा सकता है, लेकिन महिला राशि बढ़ाने की मांग नहीं कर सकती।
उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर पति की मौत हो जाती है, तो पत्नी उसके बकाया गुजारा भत्ते की रकम उसकी संपत्ति या उत्तराधिकारियों से वसूल सकती है, लेकिन पति-पत्नी के बीच जारी अन्य वैवाहिक मामले मृत्यु के बाद अपने आप खत्म हो जाते हैं।
अदालत ने कहा कि गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी की अनुमति देने से ‘अव्यावहारिक स्थिति पैदा होगी, अनिश्चितता बढ़ेगी और मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी।’
भाषा जोहेब अविनाश माधव
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