मुंबई, 15 सितंबर (भाषा) फिल्म निर्माता तिग्मांशु धूलिया का कहना है कि हर फिल्म एक संघर्ष है और उद्योग में परियोजनाओं को हरी झंडी देने वाले लोगों के पास ‘‘कोई दृष्टि नहीं’’ है, जिसकी वजह से फिल्मकारों को पर्दे पर अच्छा काम करने की कोशिश से रोक दिया जाता है।
‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’ एवं ‘साहेब बीवी और गैंगस्टर’ जैसी फिल्मों तथा ‘क्रिमिनल जस्टिस’, ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ और ‘गर्मी’ जैसे ओटीटी शो से चर्चा में आए धूलिया ने एक जैसी कहानियों वाली फिल्मों को लेकर उद्योग के जुनून पर सवाल उठाया और कहा कि इनका प्रदर्शन भी लगातार एक जैसा नहीं रहा है।
धूलिया ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘हर फिल्म एक संघर्ष है। अगर आप किसी कहानी को अलग तरीके से कहना चाहते हैं तो यह उद्योग हमें अच्छा काम करने से रोकता है। यहां परियोजनाओं को हरी झंडी देने वाले लोगों के पास कोई दृष्टि नहीं है इसलिए आप अभिशप्त हैं। अगर आप भारत में फिल्में बना रहे हैं तो आपको हमेशा अच्छा काम करने से रोका जाएगा। आपको ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘निर्माताओं का अनुपात क्या है? उनके पास फ्लॉप फिल्मों का अनुपात अधिक है। नियमों का पालन करने के बावजूद वे असफल हो रहे हैं।’’
निर्देशक की नयी फिल्म ‘घमासान’ में अरशद वारसी, प्रतीक गांधी और राजपाल यादव ने अभिनय किया है। यह फिल्म जी5 मंच पर देखी जा सकती है।
फिल्मकार ने कहा कि ‘घमासान’ एक व्यावसायिक फिल्म है, लेकिन इसके रिलीज होने में भी चुनौतियां आईं।
धूलिया ने कहा कि इस बात से उन्हें ‘‘बहुत दुख’’ होता है कि मूल रूप से बड़े पर्दे के लिए बनाई गई यह फिल्म सिर्फ ओटीटी पर ही रिलीज हो सकी।
यह पूछे जाने पर कि क्या उनकी कहानियों की गैर-पारंपरिक प्रकृति उद्योग में उनका सफर और मुश्किल बनाती है, निर्देशक ने कहा कि उनके लिए ऐसा हमेशा से रहा है, लेकिन ‘घमासान’ पूरी तरह व्यावसायिक फिल्म है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह एक व्यावसायिक फिल्म है। वे समझ ही नहीं पाते कि यह व्यावसायिक फिल्म है या नहीं। इसका नाम ‘घमासान’ है, बहुत सरल। इसमें बंदूकें और गोलियां हैं। यह एक सरल कहानी है। कहानी पारंपरिक है।’’
धूलिया फिलहाल हिंदी लेखक उदय प्रकाश की लघु कहानी ‘दिल्ली की दीवार’ पर आधारित फिल्म बना रहे हैं। इसका नाम ‘वो फिर कभी दिखा नहीं’ रखा गया है।
भाषा राखी अविनाश
अविनाश