महाराष्ट्र: नगर निकायों के चुनाव नतीजों के बाद एमवीए के समीकरण में बदलाव की संभावना
महाराष्ट्र: नगर निकायों के चुनाव नतीजों के बाद एमवीए के समीकरण में बदलाव की संभावना
मुंबई, 18 जनवरी (भाषा) महाराष्ट्र में 29 नगर निकायों के चुनाव नतीजों से विपक्षी गठबंधन महा विकास आघाडी के भीतर समीकरणों में बदलाव आने की संभावना है। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (शप) को उसके गढ़ पुणे में करारी हार का सामना करना पड़ा है, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उबाठा) ने अपने गढ़ मुंबई में तो कड़ी टक्कर दी, लेकिन अन्य शहरों में उसका आधार सिकुड़ गया, वहीं कांग्रेस ने कई शहरों में अपनी पकड़ मजबूत की है।
अंतिम परिणामों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 29 नगर निकायों की कुल 2,869 सीट में से 1,425 सीट जीतीं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 399, कांग्रेस ने 324, अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने 167, शिवसेना (उबाठा) ने 155, राकांपा (शरद चंद्र पवार) ने 36, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने 13, बसपा ने छह, राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) के साथ पंजीकृत दलों ने 129, गैर-मान्यता प्राप्त दलों ने 196 सीट पर और 19 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे में जब कांग्रेस ने चुनाव में कुल मिलाकर तीसरा स्थान हासिल किया और महा विकास आघाडी में अपने सहयोगी दलों शिवसेना (उबाठा) और राकांपा (शप) से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया, तो यह स्थिति 2029 के विधानसभा चुनाव से पहले समन्वय, सीट बंटवारे और नेतृत्व पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करेगी।
जहां शिवसेना (उबाठा) ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका की सत्ता गंवा दी और राकांपा (शप) को अजित पवार की राकांपा के साथ गठबंधन के बावजूद पुणे और पिंपरी-चिंचवड में अपने गढ़ गंवाने पड़े, वहीं कांग्रेस कोल्हापुर, चंद्रपुर और भिवंडी में सबसे बड़ी पार्टी बनने में सफल रही।
कांग्रेस सूत्रों ने कहा कि पार्टी अब यह दावा करते हुए महाविकास आघाडी (एमवीए) में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग करेगी कि ठाकरे और पवार का ‘‘क्षेत्रीय गौरव’’ कार्ड भाजपा की बढ़त को रोकने में विफल रहा।
विश्लेषकों के अनुसार, ठाकरे की पार्टी मुंबई में भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है, लेकिन राज्य के अन्य हिस्सों में उसका प्रभाव घट गया है, जो सीधे तौर पर एमवीए में वरिष्ठ साझेदार होने के उसके दावे को प्रभावित करेगा।
विश्लेषकों ने बताया कि शिवसेना (उबाठा) और शिवसेना के बीच मतों के बंटवारे से कई वार्ड में सत्तारूढ़ गठबंधन को फायदा हुआ है। उन्होंने कहा कि ठाकरे की पार्टी भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखे हुए है, लेकिन एकजुट संगठनात्मक ढांचे के बिना इसे वार्ड स्तर पर जीत में बदलना चुनौती बना हुआ है।
विश्लेषकों ने कहा कि राकांपा (शप) सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है, खासकर पुणे जिले में बुरी हार और अधिकतर शहरी क्षेत्रों में एक अंक में सीट मिलने के बाद, जिससे अब एमवीए के ‘वास्तुकार’ होने के उसके दावे पर सवाल उठ खड़ा हुआ है।
सीट संख्या से पता चलता है कि विपक्षी दलों में कांग्रेस अब एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसकी पूरे महाराष्ट्र में मौजूदगी है जो इसे अपने राष्ट्रीय एजेंडे को प्राथमिकता देने वाला सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम आगे बढ़ाने के लिए मजबूर करेगी। इससे शिवसेना (उबाठा) और राकांपा (शप) को या तो सहायक भूमिका में रहने या विपक्षी वोट में तीन तरफा बंटवारे का जोखिम उठाना पड़ेगा।
वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने कहा, ‘‘राकांपा (शप) और शिवसेना (उबाठा) के पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वे अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर कांग्रेस के साथ आएं, ताकि उनका चिह्न पूरे महाराष्ट्र में पहुंचे। 2029 के विधानसभा चुनाव दूर हैं, लेकिन जिला परिषद के चुनावों से ही दोनों दलों को कांग्रेस के साथ मिलकर चलना होगा।’’
भाजपा नेता माधव भंडारी ने कहा कि कांग्रेस समेत विपक्षी दल जमीनी हकीकत से दूर हैं। उन्होंने कहा कि विकास ही जनता का मुख्य मुद्दा है और यह स्थानीय चुनाव में निर्णायक रूप से उजागर हुआ है।
राकांपा (शप) के महासचिव अरविंद तिवारी ने कहा, ‘‘अब समय आ गया है कि शिवसेना (उबाठा) और राकांपा (शप) सड़कों पर उतरें और अपने संगठन को फिर से मजबूत करके नया नेतृत्व बनाएं।’’
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रत्नाकर महाजन ने कहा कि उनकी पार्टी विपक्षी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन हाल के स्थानीय निकाय और नगर निकाय चुनाव के नतीजे दिखाते हैं कि विजेताओं और विपक्ष के बीच अंतर काफी बड़ा है।
उन्होंने कहा, ‘‘पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं तक नकदी पहुंचना इसका कारण हो सकता है, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी की गई है। कांग्रेस के आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता ब्लॉक स्तर पर संगठन को मजबूत करना है। इसका मतलब यह नहीं कि नेतृत्व इसे नहीं समझता, लेकिन लागू करने में कुछ कमियां हैं। भाजपा से लड़ने के लिए पार्टी को एकजुट होना होगा और गठबंधन रणनीति पर दोबारा सोचना होगा।’’
भाषा
अमित नेत्रपाल
नेत्रपाल

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