पीएमएलए को सरफेसी-आरडीबी पर वरीयता, अधिकरण का आदेश रद्द: मुंबई उच्च न्यायालय
पीएमएलए को सरफेसी-आरडीबी पर वरीयता, अधिकरण का आदेश रद्द: मुंबई उच्च न्यायालय
मुंबई, 30 मार्च (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि “अपराध से अर्जित आय” की जब्ती के मामलों में धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) का प्रभाव सरफेसी और आरडीबी जैसे कर्ज वसूली कानूनों पर वरीयता रखता है।
उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने 23 मार्च को दिए गए फैसले में पीएमएलए अपीलीय अधिकरण के पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनमें बैंकों के कर्ज वसूली के अधिकारों को जब्त संपत्तियों पर प्राथमिकता दी गई थी।
न्यायमूर्ति एम एस जावलकर और नंदेश देशपांडे की पीठ ने कहा कि सरफेसी अधिनियम और ऋण वसूली और शोधन अक्षमता अधिनियम (आरडीबी अधिनियम) जैसे कर्ज वसूली कानून “पीएमएलए को अपने अधीन नहीं बना सकते, क्योंकि दोनों कानूनों के उद्देश्य और कारण अलग-अलग हैं।”
अदालत ने कहा कि पीएमएलए का उद्देश्य आरडीबी और सरफेसी अधिनियम से अलग है, इसलिए बाद के ये कानून पूर्ववर्ती पर प्रभावी नहीं हो सकते।
यह मामला वर्ष 2012 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा ग्रेस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ कोयला ब्लॉक आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच से जुड़ा है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने लगभग 24.92 करोड़ रुपये को “अपराध से अर्जित आय” के रूप में चिह्नित किया और 2015 में आरोपित संस्थाओं की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया। ये संपत्तियां ऋण के लिए गारंटी के तौर पर एचडीएफसी बैंक के पास गिरवी रखी गई थीं।
बैंक ने दलील दी कि चूंकि संपत्तियां ईडी की कार्रवाई से पहले उसके पास गिरवी रखी गई थीं, इसलिए आरडीबी और सरफेसी अधिनियम के प्रावधानों के तहत उसे वैधानिक वरीयता प्राप्त है।
एचडीएफसी बैंक ने इसके बाद पीएमएलए की धारा 26 के तहत अपीलीय अधिकरण का रुख किया और संपत्तियों की जब्ती को चुनौती दी। पीएमएलए अपीलीय अधिकरण ने बैंक के पक्ष में आदेश देते हुए कहा कि कर्ज वसूली कानूनों के तहत “सुरक्षित लेनदारों को वैधानिक प्राथमिकता प्राप्त होती है।”
हालांकि, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि अधिकरण ने “अपराध से अर्जित आय” की जब्ती को दीवानी कानूनों के तहत वसूल किए जाने वाले सरकारी बकाये के समान मानने में गलती की।
ईडी ने कहा कि पीएमएलए एक विशेष दंडात्मक कानून है, जिसका उद्देश्य अवैध संपत्ति की जब्ती है, न कि कर्ज की वसूली।
ईडी ने यह भी दलील दी कि विवादित आदेश पीएमएलए के जब्ती संबंधी उद्देश्य को कमजोर करता है और इसे दीवानी वसूली कार्यवाहियों के अधीन कर देता है।
उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए मुंबई उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों कानूनों के प्रावधानों को एक-दूसरे पर वरीयता रखने वाला नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा, “हम दिल्ली उच्च न्यायालय के उस दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं जिसमें कहा गया है कि पीएमएलए के तहत जब्ती का आदेश केवल इस आधार पर अवैध नहीं हो जाता कि सुरक्षित लेनदार का संपत्ति पर पहले से अधिकार है।”
हालांकि, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि संपत्ति की जब्ती का आदेश पारित हो चुका है या पीएमएलए की धारा चार के तहत अपराध के मामले में सुनवाई शुरू हो गई है, तो वैध हित का दावा करने वाले पक्ष के दावे का निर्णय केवल विशेष अदालत द्वारा ही किया जाएगा।
अदालत ने अधिकरण के आदेश को “अवैध, मनमाना और कानून के विपरीत” करार देते हुए बैंक को पीएमएलए के प्रावधानों के तहत विशेष अदालत के समक्ष संपत्ति की जब्ती हटाने के लिए उचित आवेदन दायर करने की अनुमति दी।
भाषा राखी सुरेश
सुरेश

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