लोकतंत्र की ताकत ने मुझ जैसे आम आदमी को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया: फडणवीस
लोकतंत्र की ताकत ने मुझ जैसे आम आदमी को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया: फडणवीस
नागपुर, 23 अगस्त (भाषा) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने रविवार को कहा कि भारत के लोकतंत्र और संविधान की ताकत तथा देश के युवाओं की शक्ति ने उनके जैसे एक साधारण व्यक्ति को राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुंचने में सक्षम बनाया, जिसने कभी नगर निगम पार्षद बनने की भी कल्पना नहीं की थी।
नागपुर में ‘जेन-जी’ के लिए आयोजित ‘मंथन 4 युवा’ कार्यक्रम में सवाल-जवाब सत्र के दौरान मुख्यमंत्री ने युवाओं को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
उन्होंने कहा कि सरकार ने ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ के लिए नीति तैयार की है, कोष स्थापित किए हैं, ‘इन्क्यूबेशन’ केंद्र बनाए हैं और अब उनका विकेंद्रीकरण किया जा रहा है।
युवाओं के राजनीति में रुचि दिखाने और मुख्यमंत्री बनने के सवाल पर फडणवीस ने कहा, ‘यह आसान नहीं है। हमारे संविधान ने इस देश में लोकतंत्र दिया है। इस लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि देवेंद्र फडणवीस जैसा व्यक्ति, जिसने शायद कभी नगर निगम पार्षद बनने की भी कल्पना नहीं की थी, मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच गया या गुजरात में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाला एक लड़का देश का प्रधानमंत्री बन गया।’
उन्होंने कहा, ‘यह भारत के संविधान की ताकत है, भारत के लोकतंत्र की शक्ति है और यही देश के युवाओं की ताकत है।’
फडणवीस ने कहा, ‘ जब मैंने राजनीति में प्रवेश किया तो मैं केवल विचारों से प्रेरित था। उस समय मेरे पास जो विचार थे और जिस पार्टी में मैं काम करता था, उससे ऐसा नहीं लगता था कि कभी सत्ता आएगी। हम सोचते थे कि हम विपक्ष में राजनीति करने के लिए ही पैदा हुए हैं। हम हर दिन आंदोलन करते थे। रोज संघर्ष करते थे लेकिन किसी तरह जनता ने हम पर भरोसा जताया और एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए एक दिन मुझे महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने की जिम्मेदारी मिली।’
उन्होंने कहा कि राजनीति सामाजिक-आर्थिक बदलाव का एक माध्यम है।
मुख्यमंत्री ने अपने संघर्षों को याद करते हुए राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान 20 वर्ष की उम्र में बदायूं केंद्रीय जेल में 18 दिन बिताने का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा, ‘मैं वहां से प्रयागराज गया और वहां से अयोध्या की ओर गया। यह पहली बार था जब मैंने देखा कि भाषण और बयानबाजी किस तरह काम करती है। हम पर गोलियां चलाई गईं, लाठियों से पीटा गया और गिरफ्तार किया गया। बीस साल की उम्र में मैंने बदायूं की केंद्रीय जेल में 18 दिन बिताए। मैं वापस आया और फिर आंदोलन में शामिल हो गया और जब 1992 में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया, तब मैं वहां था। मुझे इस पर बहुत गर्व है।’’
भाषा
राखी संतोष
संतोष

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