Premanand Maharaj: मृत्यु के समय पछतावा नहीं चाहिए… प्रेमानंद महाराज का ये संदेश बदल सकता है आपकी जिंदगी !
हाल ही में एक वार्तालाप के दौरान उन्होंने मृत्यु से जुड़े एक ऐसे प्रश्न का उत्तर दिया, जिसने वहां मौजूद श्रद्धालुओं को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।
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- प्रेमानंद महाराज का भावनात्मक और गहन संदेश
- पछतावे से मुक्त मृत्यु का सरल आध्यात्मिक मार्ग
- हर सांस के साथ प्रभु नाम जपने पर जोर
Premanand Maharaj: वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज अपने सरल शब्दों के लिए देशभर में श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय हैं। जीवन, भक्ति और मृत्यु जैसे गूढ़ विषयों पर उनकी बातें आम व्यक्ति के हृदय तक सहजता से पहुंच जाती हैं। हाल ही में एक वार्तालाप के दौरान उन्होंने मृत्यु से जुड़े एक ऐसे प्रश्न का उत्तर दिया, जिसने वहां मौजूद श्रद्धालुओं को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।
प्रेमानंद महाराज ने पछतावे से मुक्त मृत्यु का मार्ग बताया
एक श्रद्धालु ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि जीवन में ऐसा क्या किया जाए, जिससे मृत्यु के समय किसी भी तरह का पछतावा न रहे। इस प्रश्न के उत्तर में महाराज ने कहा कि पछतावे से मुक्त मृत्यु के लिए निरंतर अभ्यास बेहद आवश्यक है। यह अभ्यास यदि बचपन से हो जाए तो सर्वोत्तम है, लेकिन यदि ऐसा न हो सका हो तो शेष जीवन में भी स्वयं को सही दिशा में मोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जीवन का हर क्षण अनमोल है और इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
हर सांस के साथ भगवान का नाम जपने पर दिया जोर
Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज के अनुसार जीवन को सही मार्ग पर ले जाने का सबसे सरल उपाय है, हर सांस के साथ भगवान का स्मरण। यदि मनुष्य श्वास-प्रश्वास के साथ प्रभु के नाम का अभ्यास कर ले, तो भय और भ्रम स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति जीवनभर भगवान का नाम जपता है, उसके लिए अंतिम समय में भी वही स्मरण स्वाभाविक बन जाता है। ऐसे में मृत्यु भय का कारण नहीं रहती, बल्कि एक उत्सव के समान अनुभव होती है, जिसे उन्होंने “मृत्यु महोत्सव” की संज्ञा दी।
जीवन को सार्थक बनाने का सरल आध्यात्मिक संदेश
Premanand Maharaj: महाराज ने यह भी चेतावनी दी कि जो व्यक्ति जीवनभर गलत आचरण और स्वार्थ में लिप्त रहता है, उसके लिए अंतिम क्षणों में भगवान का स्मरण कर पाना कठिन हो जाता है। जीवन जैसा जिया जाता है, अंतिम समय में मन उसी दिशा में प्रवाहित होता है। इसलिए उन्होंने वर्तमान क्षण को भजन, स्मरण और सत्कर्म में लगाने पर विशेष जोर दिया।

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