Vasudha 12 June 2026/Image Credit: ScreenGrab / Youtube / @TellyChakkar
Ganga Mai ki Betiyan: ‘ZEE TV’ का सबसे पसंदीदा शो ‘गंगा माई की बेटियां‘ में एक ऐसा निर्णायक मोड़ आने वाला है, जहां पंचायत की सुनवाई का अंत बेहद नाटकीय होगा। सिद्धू और स्नेहा की किस्मत अब पूरी तरह से गाँव के फैसले पर टिकी है।
जब स्नेहा, सिद्धू को सबके सामने पति के रूप में स्वीकार कर लेती है तो पंचायत भी स्नेहा के पक्ष में फैसला सुनाती है। इस बात से नाराज़ होकर दुर्गावती, हार मानने से इनकार कर देती है और नए जोड़े को अलग करने का आखरी प्रयास करते हुए सिद्धू से सीधे स्नेहा को अपनाने से मना करने को कहती है। वह सिद्धू को चेतावनी देती है कि इस फैसले से कई ज़िंदगियां तबाह हो जाएंगी और सिद्धू को मजबूर करती है कि वह सबके सामने स्नेहा को घर ले जाने से इनकार कर दे।
यह सुनते ही वहां सन्नाटा पसर जाता हैं। सिद्धू भी दुर्गावती की बात सुनकर हैरान होता है किन्तु वह दुर्गावती से साफ़-साफ़ कह देता है कि वह कभी भी स्नेहा को अस्वीकार नहीं करेगा। तभी सरपंच बीच में आकर सिद्धू से पूछते हैं कि क्या वह पारिवारिक दबाव में आकर कभी स्नेहा का साथ छोड़ देगा या फिर जीवनभर उसका साथ निभाने के लिए तैयार है?
सिद्धू का जवाब इतना सटीक होता है कि शक की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। सिद्धू दृढ़ निश्चय के साथ कहता है कि वह स्नेहा का साथ कभी भी नहीं छोड़ेगा क्योंकि उसने स्नेहा को अपनी पत्नी मान लिया है और आखरी दम तक उसके साथ रहेगा। उसके इस भावुक बयान से पूरी सभा में चुप्पी छा जाती है और यह साफ़ हो जाता है कि अब वह किसी भी दबाव में आकर अपने प्यार को नहीं छोड़ेगा।
सिद्धू के इरादे देख, पंचायत स्नेहा के हक़ में फैसला सुनाती है और कहते हैं कि स्नेहा की ज़िन्दगी को पहले ही काफी उथल-पुथल मच चुकी है और वे अपना अंतिम फैसला स्नेहा के पक्ष में सुनाते हैं। यह फैसला दुर्गावती के लिए एक करारा झटका साबित होता है। सरपंच दुर्गावती को चेतावनी देते हैं कि उन्हें पंचायत के फैसले का सम्मान करना होगा और स्नेहा को सिद्धू की कानूनी पत्नी के रूप में स्वीकार करना होगा। साथ ही, वे घोषणा करते हैं कि अगला दिन शुभ मुहूर्त है और दुर्गावती को इस दिन स्नेहा का बहु के रूप में गृहप्रवेश कराना होगा।
पंचायत का यह फैसला दुर्गावती के लिए करारी हार साबित होता है वह गुस्से और अपमान से भर जाती है। वह सरपंच से कहती है कि उसे यह फैसला मंज़ूर नहीं है फिर सरपंच उसे चेताते हुए कहते हैं कि पंचायत का फैसला अंतिम है। फिर दुर्गावती, गंगा से यह कहते हुए कि “वह स्नेहा को बहु के रूप में कभी भी नहीं अपनाएगी”, वहां से चली जाती है।
स्नेहा को न्याय मिलता देख, गंगा राहत की सांस लेती है। भावुक स्नेहा अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए सिद्धू से कहती है कि वह हर मुश्किल में उसके साथ खड़ी रहेगी। किन्तु कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती..
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या दुर्गावती, पंचायत के आदेश के आगे घुटने टेकेगी? या फिर ठाकुर हाउस की चौखट लांघते ही, स्नेहा के जीवन में दुखों का पहाड़ टूटेगा?