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ATAL_RAAG_राष्ट्र के स्व की झंकार : दीपावली के जनजातीय रंग

राष्ट्र के स्व की झंकार : दीपावली के जनजातीय रंग ~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल भारतीय धर्म एवं दर्शन में कार्तिक मास की अमावस्या का विशेष महत्व है। क्योंकि यह तिथि …

ATAL_RAAG_राष्ट्र के स्व की झंकार : दीपावली के जनजातीय रंग
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 20 Oct 2025 | 10:56 amModified: 20 Oct 2025 | 10:57 am
HIGHLIGHTS
  1. दीपावली का पर्व जिस प्रकार नगरों, महानगरों, गांवों में मनाया जाता है। ठीक उसी प्रकार से वनांचलों में रहने वाले हमारे जनजातीय बंधु-बांधव भी बड़ी श्रद्धा के साथ दीपावली मनाते हैं। प्रकृति और जीव प्रेम के दर्शन अपनी विविध परंपराओं के माध्यम से प्रकट करते हैं। अभिप्रायत: हमारे सभी पर्व, त्योहार और उत्सव — आत्म से तो साक्षात्कार कराते ही हैं। साथ ही हमें जीवन के वास्तविक अर्थों का बारंबार बोध प्रदान कराते हैं। दीपावली, गोवर्धन पूजा जैसे त्योहार हमें ये बताते हैं कि— जीवन के किसी भी क्षेत्र में अंधियारा न रहे।

राष्ट्र के स्व की झंकार : दीपावली के जनजातीय रंग

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

 

भारतीय धर्म एवं दर्शन में कार्तिक मास की अमावस्या का विशेष महत्व है। क्योंकि यह तिथि हमारी सांस्कृतिक चैतन्यता की अमरता का नाद लिए हुए है। 'असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय' की परंपरा को मानने वाला भारतीय समाज अपनी उत्सवधर्मिता के लिए जाना जाता है। राष्ट्र की यही परंपरा 'अप्प दीपो भव' का संदेश देती है। कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला दीपावली पर्व— जो अंधकार से प्रकाश की ओर समूचे समाज का पथ प्रशस्त करता है। धार्मिक महत्व के रूप में दीपावली का पर्व भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास पूरा करने के बाद उनके अयोध्या आने की प्रसन्नता में मनाया गया था। जब समूची अयोध्या माता सीता, अपने राम-लक्ष्मण और उनके समस्त अनुचरों को पाकर प्रफुल्लित हो गई थी। द्वार-द्वार बंदनवार बांधे गए। पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा उठी थी। इस प्रकार त्रेतायुग से दीपावली की परंपरा भारतीय जीवन में रच बस गई। मूल्यों, आदर्शों, धर्म-कर्म, अध्यात्म की उत्सवधर्मिता के साथ अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण बन गई।

दीपावली केवल हमारे जीवन के तिमिर का ही हरण नहीं करती बल्कि धन-धान्य की समृद्धि देती है। हमारे ये त्योहार सामाजिक समरसता, एकजुटता के प्रकटीकरण का महान संदेश लिए होते हैं। भारत के कोने-कोने में माटी के दीये जगमगाते हैं। हर घर में खुशियों की चहक सुनाई देती है। हर कोई उत्सव के रंग में डूबा भक्ति के साथ एकाकार होता दिखाई देती है। घर से लेकर अपने गांव और देवालयों में हर कोई दीप-दान करता है। अपने कुलदेवी- देवता, ग्राम देवता, स्थान देवता के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर सुख- शांति और समृद्धि की प्रार्थना करता है। समाज के हर वर्ग के लोग एक दूसरे से मिलते जुलते हैं। प्रसाद बांटते हैं। एक-दूसरे को पान खिलाते हैं। यानी दीपावली के त्योहार में हर प्रकार के बंटवारे तिरोहित हो जाते हैं। बस दिखाई देती है तो चहुंओर समरसता की मनभावन छटा। यही हमारा वैशिष्ट्य है जो हमें एक माला में पिरोए हुए है।

भील-भिलाला समाज में दीप पर्व की झलक :

इसी प्रकार दीपावली की उत्सवधर्मिता को लेकर जब हम जनजातीय समाज की परंपराओं को देखते हैं। तो जनजातीय समाज के बंधु-बांधवों में दीपावली की विशिष्ट महत्ता दिखाई देती है। भील-भिलाला जनजाति समाज में दीपावली को लेकर विशेष तैयारियां की जाती हैं। भील-भिलाला समाज में दो बार दीपावली मनाई जाती है।पहली दीपावली कार्तिक मास की धनतेरस से अमावस्‍या तक और दूसरी 'पछलि दीपावली'— कार्तिक मास शुक्‍ल पक्ष की तेरस से पूर्णिमा तक मनाई जाती है। वैसे भील-भिलाला समाज में कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी से दीपावली मनाई जाने लगती है।

 

इसके लिए दीपावली से कुछ दिन पहले लोग अपने-अपने घरों को गोबर और मिट्टी से लीपते (रंगते) हैं। इसके बाद अमावस्या के दिन प्रात: देवी लक्ष्मी और नए अनाज का पूजन करते हैं। फिर पूरे दिन उत्सव में डूबे आतिशबाजी करते हैं। दीपावली की शाम को दरवाजे, अनाज की कोठरी, गोहाल और रसोई घर सहित आस्था के विभिन्न स्थानों पर दीप जलाकर रखते हैं। इसके साथ ही भील समाज में अमावस्या की तिथि को तंत्र-मंत्र को लेकर भी विशेष मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि इस तिथि को तंत्र-मंत्र और जाप से विशेष सफलता मिलती है। इसी के निमित्त भील समाज मे काली चौदस और अमावस्या की रात्रि को बड़वा (पुजारी/तांत्रिक) और उनके शिष्य तांत्रिक सिद्धियाँ करते हैं।

कोरकू जनजाति की अनूठी परंपराएं :

इसी प्रकार कोरकू जनजाति में भी दीपावली प्रकृति के साथ एकात्म और साहचर्यता के बोध को प्रकट करती है। कोरकू समाज में 'दीवा दावी' की परंपरा उल्लास पूर्वक निभाई जाती है। 'दीवा दावी' अर्थात् मिट्टी के दीपक जलाकर गऊ (गाय) की आरती उतारी जाती है। अब सोचिए न! कितना अच्छा दर्शन है न ये? जब हमारा समाज अपनी आस्था के मानबिंदुओं के प्रति इस प्रकार श्रद्धा प्रकट करता है। इसी प्रकार भारतीय समाज कैसे प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करता है। उसका उदाहरण भी कोरकू समाज में दीपावली को उत्सव के तौर पर दिखाई देता है। कोरकू समाज के लोग पशुओं के खुरों में होने वाली बीमारी से बचाव के लिए गाय-बैल और ग्वाल देव की पूजा करते हैं। पड़वा ( अमावस्या ) के दिन हनुमान मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं। हनुमानजी महाराज से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसके बाद रात्रि में 'भूगड़ू' पर विभिन्न लोक धुनें बजाकर नृत्य करते हैं।

उत्साह के साथ अपनी परंपराओं में भाव विभोर होकर आनंद मगन हो जाते हैं। 'भूगड़ू' बाँसुरी जैसा लगभग चार फीट लंबा वाद्य यंत्र होता है जिसे फूँककर बजाए जाता है। तत्पश्चात दूसरे दिन सूर्योदय से पहले पशुओं के शरीर पर हाथों से विभिन्न रंगों के छाप लगाते हैं। इसके साथ ही कोरकू समाज में दीपावली के दिन मांसाहार वर्जित रहता है। इस दिन मीठे पकवान बनाए जाते हैं । साथ ही गाय, बैल की जूठी खिचड़ी खाने की मान्यता भी देखने को मिलती है।

गोंड समाज में ऐसे मनाई जाती है दीपावली :

हिंदू समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले गोंड जनजातीय समाज में भी दीपावली को लेकर विभिन्न परंपराएं देखने को मिलती हैं। गोंड समाज में दीपावली दो प्रकार से मनाई जाती है। कहीं-कहीं दीपावली कार्तिक माह की अमावस्या को ही मनाई जाती है तो कहीं-कहीं कुंवार (क्वांर) मास की अमावस्या से प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा तक यानी पूरे पन्द्रह दिन दीपावली मनाने की परंपरा है।

दीपावली की रात्रि को गोंड समाज में 'दौगुन गुरु' और 'अनाज' की पूजा की जाती है। साथ ही अमावस्या की रात्रि को ही मंत्र सिद्धि की जाती है और गुरु मंत्र लिया जाता है। इस दौरान औषधियों को मंत्रसिद्धि के माध्यम से जगाया जाता है। दीपावली के दिन ही व्रती मुखिया संध्या के समय घर में आटा का चौका पूरते (बनाते) हैं। गेरु (गेर) से पोते हुए बाँस की टोकनी (टोकरी) में चावल, फूल रखकर घी का दीपक जलाया जाता है। इसके अतिरिक्त कुलदेवी, दौगुन गुरु और पूर्वजों के लिए दीपदान किया जाता है। इसी प्रकार शेष समाज की भांति ही गोंड समाज के लोग भी घर के विभिन्न हिस्सों में दीपक जलाते हैं। पशुधन की सुरक्षा के लिए उनके शरीर पर गेरू (गेर) लगाया जाता है। गोंड जनजाति में प्रायः यह मान्यता है कि — पृथ्वी पर अमावस्या की तिथि को ही अन्न और लक्ष्मी (गाय) आए थे। साथ ही दौगुन गुरु पूजन से ही दीपावली का जन्म हुआ है। दीपावली के पश्चात अगले दिन लक्ष्मी/गोवर्धन की पूजा करने की परंपरा भी गोंड समाज में अपने विविध उत्सवी रंगों में दिखाई देती है।

उत्सव में जीवन दर्शन कराता भारिया समाज :

इसी प्रकार भारिया जनजाति समुदाय में दीपावली का उत्सव अपने विविधवर्णी रुप में दिखाई देता है। दीपावली के दिन भारिया समाज के लोग मिट्टी और आटे से बने पाँच दीपक जलाकर माता लक्ष्मी और धन की पूजा करते हैं। अहिराई झूमर पहनकर प्रत्येक घर को एक दीप— दान करते हैं। इसके बदले में उन्हें हर घर से नेग ( उपहार ) मिलता है। अगले दिन प्रातः बेला में भारिया समाज में खिचड़ी-तिल्ली खाने की परंपरा है। दीपावली का ये उत्सव भारिया समाज में कई दिनों तक चलता है। दीपावली के तीसरे दिन आँगन में गाय के गोबर से गोवर्धन बनाए जाते हैं। उनकी पूजा की जाती है। इस दौरान महिलाएँ गोवर्धन गीत गाती हुई लोक-मंगल की कामना करती हैं। साथ ही भारिया समाज में भी पशुधन की रक्षा के लिए पशुओं के शरीर पर गेरू (गेर) लेपन किया जाता है। इतना ही नहीं भारिया समाज के बच्चे दोहरा गीत गाकर प्रत्येक घर में जाकर गोंदा फूल या झूमर देते हैं। दोहरा गीत के कुछ बोल इस प्रकार हैं —

ऊँचो उसारी, ओ ऊँचो राहुल, तुम्हारों रे नाव।
नावन सुन-सुन हम आये दादी, दरसन दइयो बनाय रे
उई-ई............
कट-कट तेरी टकिया बाजी रे, धुकुर फुकर जीव होय।
खोल बड़ी बहू की बटुआ रे, अहिरा को कर दे दान रे।
उई-ई...........”

इसी प्रकार कोल जनजातीय समाज में भी दीपावली को बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। वहीं छत्तीसगढ़ में दीपावली के दौरान'सुरहुत्ती' मनाए जाने की परंपरा है। सुरहुत्ती में दीपावली की रात को बच्चे थालों में दीपक जलाए हुए अपने-अपने घरों से निकलते हैं। फिर वो जहां-जहां, जिन-जिन घरों में पहुंच सकते हैं। वहां-वहां जाते हैं और उन घरों के 'तुलसी चौरे' (तुलसी के चबूतरे) में एक दीप रख आते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि दीपावली का पर्व संपूर्ण भारत वर्ष में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल हमारी आध्यात्मिक चेतना को आलोकित करता है बल्कि हमारे जीवन में 'समरसता' की बयार बहाता है। दीप की ज्योति के साथ हर व्यक्ति लोक-मंगल की प्रार्थना करता है। अपने आराध्य देवी-देवताओं और प्रकृति के प्रति दीपदान के माध्यम से कृतज्ञता व्यक्त करता है। गीत और नृत्य, आतिशबाजी के साथ उत्सव का आनंद मनाता है। वहीं दीपावली के बाद गाय के गोबर से गोवर्धन बनाए जाते हैं। उनकी पूजा की जाती है। हर घर में गोवर्धन को भोग लगाने के बाद ही लोग भोजन ग्रहण करते हैं। गाय और गौवंश को अच्छा भोजन बनाकर खिलाया जाता है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति अपनी परंपराओं के माध्यम से सभी के प्रति आत्मीयता और कृतज्ञता के भावों को बारंबार प्रकट करती है।

 

दीपावली का पर्व जिस प्रकार नगरों, महानगरों, गांवों में मनाया जाता है। ठीक उसी प्रकार से वनांचलों में रहने वाले हमारे जनजातीय बंधु-बांधव भी बड़ी श्रद्धा के साथ दीपावली मनाते हैं। प्रकृति और जीव प्रेम के दर्शन अपनी विविध परंपराओं के माध्यम से प्रकट करते हैं। अभिप्रायत: हमारे सभी पर्व, त्योहार और उत्सव — आत्म से तो साक्षात्कार कराते ही हैं। साथ ही हमें जीवन के वास्तविक अर्थों का बारंबार बोध प्रदान कराते हैं। दीपावली, गोवर्धन पूजा जैसे त्योहार हमें ये बताते हैं कि— जीवन के किसी भी क्षेत्र में अंधियारा न रहे। समूचा समाज एकजुट हो। आत्मीयता और बंधुता के साथ एक-दूसरे से जुड़ा रहे। सुख-दुख का साझीदार बने। सबको अपनाए और एकता की बांसुरी बजाता हुआ उन्नति के पथ पर बढ़ता जाए। जहां अभाव और पीड़ा रुपी अंधेरा है उसे दूर करने के लिए सबकोई प्रतिबद्ध हों। अपने बंधुओं के सहायतार्थ आगे आएं। सबके जीवन में खुशियों के दीप जलाएं। यही सत्य की जीत का संदेश है। यही सच्चे अर्थों में दीपावली का मूलमंत्र है।

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
( साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)

Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

संदर्भ सूची :

•कोरकू देवलोक , डॉ. धर्मेंद्र पारे
प्रकाशन - आदिवासी लोक कला अकादमी मध्‍यप्रदेश संस्‍कृति परिषद
•भील देवलोक , भानुशंकर गेहलोत, डॉ.
डॉ. धर्मेंद्र पारे
प्रकाशन - आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्‍यप्रदेश संस्‍कृति परिषद
•गोंड देवलोक, डॉ. धर्मेंद्र पारे
प्रकाशन -आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्‍य अकादमी मध्‍यप्रदेश संस्‍कृति परिषद
•सम्‍पदा , प्रधान संपादक - वन्‍दना पाण्‍डेय, सम्‍पादक - अशोक मिश्र
प्रकाशन - आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्‍यप्रदेश संस्‍कृति परिषद

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