अगरकर के तीन साल: आंकड़ों से परे जाकर कड़े फैसले लेने में माहिर
अगरकर के तीन साल: आंकड़ों से परे जाकर कड़े फैसले लेने में माहिर
(कुशान सरकार)
अहमदाबाद, सात मार्च (भाषा) अजीत अगरकर ने जब भारत की सीनियर चयन समिति के अध्यक्ष का पदभार संभाला, तो परिस्थितियां काफी भिन्न थीं।
अगरकर को चेतन शर्मा की जगह पर यह पद सौंपा गया था। शर्मा को एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए पाया गया था जिसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था।
अगरकर के तीन साल के कार्यकाल में काफी कठिन और साहसिक फैसले किए गए जिनके अनुकूल परिणाम निकले।
चयनकर्ता विकेटकीपर की तरह होता है। अच्छे कैच पर भले ही हल्की-फुल्की तालियां बजें, लेकिन अचानक गेंद छूट जाने पर तीखी आलोचना होगी। अगरकर के सफर में भी इस खास तरह की समरूपता है।
जब 2020-21 में चयन समिति के अध्यक्ष का पद खाली हुआ था, तब अगरकर के आवेदक होने के बावजूद चेतन शर्मा ने उन्हें पीछे छोड़ दिया था। आखिर में उन्हें 2023 में यह पद मिल गया और इसके बाद अपने फैसलों के कारण वह सुर्खियों में रहे।
भारत की चयन समितियों के व्यापक इतिहास में विशेष रूप से दिलीप वेंगसरकर और कृष्णमाचारी श्रीकांत के प्रभावशाली कार्यकाल के बाद अगरकर निस्संदेह सबसे चर्चित अध्यक्षों में से एक रहे हैं।
पिछले तीन वर्षों में भारतीय टीम ने आईसीसी के चार टूर्नामेंट (2023 वनडे विश्व कप, 2024 टी20 विश्व कप, 2025 चैंपियंस ट्रॉफी, 2026 टी20 विश्व कप) के फाइनल में जगह बनाई है। अगर भारत फाइनल में न्यूजीलैंड को हरा देता है तो यह उसकी पिछले तीन साल में तीसरी जीत होगी।
टीम की जीत पर खिलाड़ियों और सहयोगी स्टाफ के सदस्यों को सराहना मिलती है लेकिन वैश्विक टूर्नामेंटों के लिए टीमों को आकार देने में चयनकर्ताओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
अगरकर के कार्यकाल में ऐसे कई फैसले लिए गए जिनमें आलोचनाओं का सामना कर सकने वाले दृढ़ विश्वास की जरूरत थी। हार्दिक पंड्या की जगह पर सूर्यकुमार यादव को टी20 टीम का कप्तान नियुक्त करना एक ऐसा ही फैसला था।
वनडे कप्तान के पद से बेहद सफल और पसंदीदा रोहित शर्मा को हटाने का निर्णय कहीं अधिक संवेदनशील था। इन दोनों मामलों में अगरकर ने चुप्पी साधने की कोशिश नहीं की। उन्होंने इसका डटकर सामना किया और मुश्किल फैसलों के लिए होने वाली आलोचनाओं को भी स्वीकार किया।
अगर सिर्फ आंकड़े ही मापदंड होते तो हर क्रिकेट प्रेमी अपनी पसंद की टीम चुन सकता था। लेकिन चयन इतना आसान नहीं होता।
इसमें खिलाड़ियों की पहचान करने, उनकी भूमिकाओं को समझने और यह कल्पना करने की क्षमता की जरूरत होती है कि कोई खिलाड़ी किसी रणनीतिक ढांचे में कैसे फिट बैठता है। अगरकर की अगुवाई में उनकी टीम ने यह काम बखूबी किया है। उनकी टीम में एस शरथ (अब उनकी जगह प्रज्ञान ओझा हैं), सुब्रतो बनर्जी (अब उनकी जगह आरपी सिंह हैं), एसएस दास और अजय रात्रा शामिल रहे हैं।
भाषा
पंत
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