अपने पिता की वजह से कराटे की बजाय तीरंदाजी चुना था चिकिता ने
अपने पिता की वजह से कराटे की बजाय तीरंदाजी चुना था चिकिता ने
(फिलेम दीपक सिंह)
नागोया, 30 सितंबर (भाषा) पहली बार एशियाई खेलों में उतरी चिकिता तानीपर्थी ने दो स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा की झलक तो दिखाई ही , साथ ही अपने पिता के फैसले को भी सही साबित कर दिया जिन्होंने स्कूली दिनों में उन्हें तीरंदाजी चुनने को कहा था जबकि उनकी रूचि कराटे में थी ।
तेलंगाना के पेड्डापल्ली जिले के सुल्तानपुर गांव की रहने वाली 21 वर्ष की चिकिता ने ज्योति सुरेखा वेन्नम और प्रिथिका प्रदीप के साथ महिला टीम वर्ग का स्वर्ण जीता और साहिल जाधव के साथ मिश्रित टीम स्पर्धा में भी अव्वल रही ।
उन्होंने कहा ,‘‘ तीरंदाज बनने का फैसला मेरा नहीं था, यह मेरे पिता की पसंद थी । वह चाहते थे कि मैं खिलाड़ी बनूं क्योंकि उनका यह सपना अधूरा रहा था । जब मैं छोटी थी, तब वह मुझे मैदान पर ले जाते थे । रोज हम कोई खेल खेलते थे ।’’
उन्होंने कहा ,‘‘ स्कूल में छठी से आठवीं कक्षा तक मैं कराटे खेलती थी । मेरे पास पहला ब्लैक बेल्ट भी है ।’’
उनका पहला तोहफा तीर कमान था जो उनके चाचा ने दशहरे पर दिया था । उन्हें धीरे धीरे तीरंदाजी में मजा आने लगा ।
उन्होंने कहा ,‘‘दशहरे की छुट्टी में मेरे चाचा हैदराबाद से मेरे लिये रिकर्व डेकाथलन तीर लेकर आये थे । मुझे धीरे धीरे तीरंदाजी में मजा आने लगा ।’’
उनके पिता ने उनके भीतर क्षमता देखकर कर्ज लेकर अच्छे उपकरण खरीदे । चिकिता ने 2018 से तीरंदाजी शुरू की और 2021 में जूनियर शिविर में चुन ली गई ।
चिकिता के पिता हमेशा से चाहते थे कि वह व्यक्तिगत खेल में उतरे । हैदराबाद की साइना नेहवाल ने जब ओलंपिक में बैडमिंटन में भारत के लिये पहला पदक जीता तो उनकी इच्छा और प्रबल हो गई ।
चिकिता ने कहा ,‘‘ साइना नेहवाल के ओलंपिक पदक जीतने के बाद उन्होंने तय किया कि मैं कराटे की बजाय तीरंदाजी में उतरूंगी । उस समय मैं स्कूल में थी और मैने अभिषेक वर्मा सर ( जाने माने तीरंदाज) की पत्नी को मैसेज किया । उन्होंने मुझे बुलाया और पांच दिन अभ्यास के बाद मेरा सोनीपत में शिविर में चयन हो गया। अभिषेक वर्मा सर ने मेरी काफी मदद की और मुझे सिखाया , वह मेरी प्रेरणा रहे । ’’
भाषा
मोना नमिता
नमिता

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