(कुशान सरकार)
कोलकाता, 28 फरवरी (भाषा) यह किस्सा 90 के दशक का है, जब रणजी ट्रॉफी के नॉकआउट दौर से पहले तक मैच क्षेत्रीय प्रारूप में खेले जाते थे। तब प्रत्येक खिलाड़ी को पता होता था कि रन बनाने के लिए उसे किस को निशाने पर रखना है।
बंगाल के लिए पूर्व क्षेत्र में त्रिपुरा प्रमुख प्रतिद्वंदी हुआ करता था। दक्षिण में तमिलनाडु और कर्नाटक गोवा को आसानी से हरा देते थे। उत्तर में दिल्ली के दिग्गज खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जम्मू कश्मीर के खिलाफ होने वाले मैच पर नजर रखते थे।
भारत की तरफ से टेस्ट और वनडे खेलने वाले दिल्ली के एक पूर्व कप्तान ने यह मजेदार किस्सा सुनाया।
इस पूर्व कप्तान ने कहा, ‘‘यह प्रथम श्रेणी क्रिकेट में मेरा पहला सत्र था और हमने जम्मू कश्मीर के खिलाफ बल्लेबाजी करने का फैसला किया था। आमतौर पर दिन की शुरुआत में पांचवें नंबर तक के बल्लेबाज पैड पहनते हैं। मुझे याद है कि घरेलू क्रिकेट में ढेरों रन बनाने वाला पांचवें नंबर का हमारा बल्लेबाज पैड पहन रहा था। तभी हमारे तीसरे नंबर के बल्लेबाज ने एक ऐसा सवाल पूछा जिसे वह जरूरी समझते थे। इस बल्लेबाज ने कहा था ‘भाई तू पैड क्यों पहन रहा है।’’
पांचवें नंबर के बल्लेबाज ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘‘जम्मू कश्मीर है तो क्या पैड भी न पहनूं।’’
तीसरे नंबर के बल्लेबाज ने पलटवार करते हुए कहा कि दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर होने के कारण शायद उनकी बारी भी न आए।
जम्मू कश्मीर की शनिवार को रणजी ट्रॉफी में पहली खिताबी जीत ने इस बात को साबित कर दिया कि तीन दशक पुराना यह किस्सा इसका संकेत बन गया है कि टीम ने तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए कितनी प्रगति की है।
दिल्ली के एक अन्य भारतीय खिलाड़ी ने उस समय को याद किया जब दिग्गज मोहिंदर अमरनाथ की उपस्थिति ही जम्मू कश्मीर के खिलाड़ियों को खौफ में डालने के लिए काफी होती थी।
इस खिलाड़ी ने कहा, ‘‘उनके लिए जिम्मी पा किसी दूसरे ग्रह से आए थे। उस पीढ़ी के जम्मू कश्मीर के खिलाड़ी उन्हें देखकर घबरा जाते थे। उन्हें विश्वास ही नहीं होता था कि जिम्मी पा उनकी गेंदबाजी का सामना कर रहे हैं।’’
घरेलू क्रिकेट में दिल्ली के दबदबे वाले दिन अब लद चुके हैं और जम्मू कश्मीर के कमजोर टीम होने के दिन भी खत्म होते दिख रहे हैं।
जम्मू कश्मीर के इस मुकाम पर तक पहुंचने में दिल्ली के खिलाड़ियों का योगदान अहम रहा है। पूर्व भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी का कोच के रूप में जम्मू कश्मीर से जुड़ना पहला बदलाव था।
जम्मू कश्मीर के पहले भारतीय क्रिकेटर परवेज़ रसूल ने दिवंगत भारतीय कप्तान की सलाह को याद करते हुए कहा, ‘‘बेदी सर हमसे कहते थे, ‘बेटा तुम यहां सिर्फ गिनती पूरी करने के लिए नहीं हो। तुम यहां प्रतिस्पर्धा करने के लिए हो। संगठन की राजनीति में मत पड़ो और अपनी पूरी क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करो।’’
दिल्ली के पूर्व क्रिकेटर बेदी ने टीम चयन से जुड़े विवादों को समाप्त करने के लिए भी कड़ी मेहनत की।
बेदी के बाद पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज और दिल्ली की तरफ से खेलने वाले संजीव शर्मा ने जम्मू कश्मीर के कोच के रूप में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
लेकिन जम्मू कश्मीर को चैंपियन टीम में बदलने के लिए मिथुन मन्हास जैसे खिलाड़ी की जरूरत थी जो वर्तमान समय में भारतीय क्रिकेटबोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष हैं।
जम्मू के मूल निवासी कश्मीरी पंडित मन्हास किशोरावस्था में ही दिल्ली आ गए थे और वहां के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में से एक बन गए। मन्हास हालांकि अपने करियर के आखिरी दिनों में जम्मू कश्मीर लौट गए थे और उन्होंने अपनी इस नई टीम की तरफ से खेलते हुए ही प्रथम श्रेणी क्रिकेट से संन्यास लिया।
जम्मू कश्मीर क्रिकेट (जेकेसीए) में काफी भ्रष्टाचार था तब बीसीसीआई के तत्कालीन सचिव जय शाह ने मन्हास को प्रशासक के रूप में जेकेसीए की जिम्मेदारी सौंपी। मन्हास ने व्यवस्था में काफी सुधार किया जिससे टीम पर सकारात्मक असर पड़ा।
मन्हास का सबसे अच्छा फैसला अजय शर्मा को जम्मू कश्मीर का मुख्य कोच बनाना था, जिससे उन्हें मैच फिक्सिंग कांड में धूमिल हुई अपनी छवि और प्रतिष्ठा को सुधारने का मौका मिला।
अगर बेदी ने दिल्ली की प्रतिस्पर्धी भावना को जम्मू कश्मीर की टीम में शामिल किया तो मन्हास और शर्मा ने टीम को दिल्ली की तरह जीतना सिखाया। दिल्ली की टीम अब पहले जैसी नहीं रही और दिलचस्प बात यह है कि जम्मू कश्मीर की टीम उससे बेहतर हो गई है।
भाषा
पंत
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