नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) भारत के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (एनआईटी) से पढ़ाई पूरी करने के बाद जसप्रीत कौर का भविष्य एक सफल सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में तय माना जा रहा था, लेकिन तीन साल की उम्र में पोलियो का शिकार हुईं इस पैरा एथलीट के लिए लंबे समय तक ऑफिस में बैठकर काम करना मुश्किल रहा क्योंकि इससे उनका वजन बढ़ गया और चलने-फिरने में परेशानी भी बढ़ने लगी।
बठिंडा की जसप्रीत ने अच्छी सेहत के इरादे से पैरा पावरलिफ्टिंग को अपनाया और अब वह ग्लास्गो में राष्ट्रमंडल खेलों के लिए जाने वाले दल का हिस्सा हैं।
वहीं बिहार के नालंदा जिले के हरनौत में झंडू कुमार का बचपन काफी संघर्षों में बीता, वह परिवार की आर्थिक मदद के लिए अपने माता-पिता के साथ सड़क किनारे सब्जियां बेचते थे।
पांच साल की उम्र में पोलियो की चपेट में आने के बाद झंडू ने काफी संघर्ष किया। बाद में ‘पैरा पावरलिफ्टिंग’ ने उन्हें रास्ता दिखाया जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। अब गांधीनगर में ट्रेनिंग ले रहे झंडू कुमार भारत के प्रमुख पैरा पावरलिफ्टरों में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने पुरुषों के 72 किग्रा वर्ग में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया है और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार हैं।
बत्तीस साल की जसप्रीत पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेंगी। उन्होंने हाल में खेलो इंडिया पैरा खेलों में महिलाओं की 45 किग्रा पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में 101 किलोग्राम वजन उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। अब वह इसी प्रदर्शन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोहराने की उम्मीद कर रही हैं।
फिलहाल वह जसप्रीत गांधीनगर स्थित ‘नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ में एथेंस 2004 पैरालंपिक के कांस्य पदक विजेता राजिंदर सिंह राहेलू के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग ले रही हैं। उन्हें भरोसा है कि वह राष्ट्रमंडल खेलों में अच्छा प्रदर्शन करेंगी।
जसप्रीत ने कहा, ‘‘मुझे जिस तरह की ट्रेनिंग मिल रहा है, उससे मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा है। मुझे विश्वास है कि मैं अच्छा प्रदर्शन करूंगी। ’’
अपने सफर को याद करते हुए जसप्रीत ने बताया कि एमटेक पूरी करने के बाद बैठकर काम करने वाली नौकरी के कारण उनका वजन तेजी से बढ़ गया।
उन्होंने कहा, ‘‘पोलियो और कम चलने-फिरने की वजह से मेरा वजन लगभग 80 किग्रा तक पहुंच गया था। इससे मेरे दूसरे पैर पर बहुत दबाव पड़ रहा था और रीढ़ की हड्डी भी झुकने लगी थी। ’’
जसप्रीत ने कहा, ‘‘इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी और फिट रहने के लिए जिम जाना शुरू किया। मैंने सोचना शुरू किया कि मैं पैरा एथलीट कैसे बन सकती हूं। तभी मुझे पावरलिफ्टिंग के बारे में पता चला। ’’
इस फैसले ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने सिर्फ 18 महीनों में करीब 40 किग्रा वजन कम किया और जल्द ही राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाने लगीं।
उन्होंने 101 किलोग्राम वजन उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाने के बाद इस साल की शुरुआत में बैंकॉक में हुई एशिया-ओशिनिया ओपन चैंपियनशिप में कांस्य पदक भी जीता।
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि वजन कम करने के साधारण लक्ष्य से शुरू हुआ मेरा सफर मुझे राष्ट्रमंडल खेलों और यहां तक कि एशियाई खेलों तक पहुंचा देगा। ’’
जसप्रीत ने अपनी इस यात्रा में साथ देने के लिए अपने परिवार को श्रेय दिया। उनके पिता एक निजी बैंक में कैशियर हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं। उन्होंने कहा, ‘‘उनका समर्थन मेरी ताकत रहा है। इसी वजह से मैं अपनी कोशिश को भारत का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने की यात्रा में बदल पाई। ’’
वहीं झंडू कुमार का खेल सफर 2010 से 2012 के बीच जिम से शुरू हुआ, जब वह सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने गोला फेंक और भाला फेंक में भी हाथ आजमाया, लेकिन बाद में उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग के बारे में पता चला।
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने बहुत मुश्किल दिन देखे हैं। आलू और प्याज बेचने से लेकर कोविड-19 महामारी के दौरान ई-रिक्शा चलाने तक का सफर तय किया है। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने लिफ्टिंग बेल्ट के साथ ट्रेनिंग शुरू की और धीरे-धीरे 100 किलो से ज्यादा वजन उठाने लगा। मेरे कोच ने मेरा हौसला बढ़ाया और 2018 में सासाराम में हुए बिहार राज्य खेलों जैसी सामान्य खिलाड़ियों की प्रतियोगिताओं में भी मुझे उतारा। मुझे मुकाबलों में हिस्सा लेना अच्छा लगा और मैं बिहार का नाम रोशन करना चाहता था। ’’
लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती जिम के बाहर थी। इस खेल के लिए जरूरी ‘डाइट’ का खर्च उठाना उनके परिवार के लिए आसान नहीं था। अपनी ‘डाइट’ के पैसे जुटाने के लिए कुमार ने छोटी-सी सब्जी की दुकान शुरू की। ‘व्हीलचेयर’ नहीं होने के बावजूद वह करीब 20 किमी दूर बाजारों तक जाते थे।
जब यह काम भी सफल नहीं हुआ तो उन्होंने दोस्तों से पैसे उधार लेकर ई-रिक्शा खरीदा, लेकिन कोविड-19 महामारी ने उनकी इस योजना को भी प्रभावित कर दिया।
कुमार ने कहा, ‘‘आखिरकार मैंने ई-रिक्शा बेच दिया और दिल्ली आया, जहां मेरी मुलाकात राजिंदर सिंह राहेलू सर से हुई। शुरुआत में मैं अपने तीनों लिफ्ट के प्रयासों में असफल रहा, फिर भी उन्होंने मुझ पर भरोसा रखा। आज मैं जहां हूं, वह उनकी मदद और समर्थन की वजह से हूं। ’’
राहेलू को कुमार से राष्ट्रमंडल खेलों में काफी उम्मीदें हैं। पूर्व पैरालंपिक पदक विजेता राहेलू ने कहा, ‘‘मुझे विश्वास है कि वह स्वर्ण पदक भी जीत सकते हैं। ’’
भाषा नमिता मोना
मोना