(अजय मसंद)
नयी दिल्ली, 12 जून (भाषा) निशानेबाजी में विलक्षण प्रतिभा, मैदान के बाहर बेबाक अंदाज और युवा खिलाड़ियों को पहचानने में माहिर कोच, जसपाल राणा शायद पहले ऐसे निशानेबाज थे जिन्होंने इस खेल में भारत के मजबूत होने से पहले ही भारतीयों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था।
राणा ने 49 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उन्हें दिल से जुड़ी समस्याएं हो गई थीं, जो म्यूनिख से दिल्ली लौटते समय उनकी उड़ान के दौरान सामने आईं। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मे राणा सिर्फ एक चैंपियन निशानेबाज ही नहीं थे। वह एक खेल क्रांति का चेहरा थे। भारत के विश्व में निशानेबाजी में एक ताकत के रूप में उभरने से काफी पहले किशोर राणा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने शानदार प्रदर्शन से एक पीढ़ी को प्रेरित किया और उस खेल के पहले स्टार खिलाड़ियों में से एक बन गए जो उस समय भारत में क्रिकेट के दीवाने लोगों के लिए काफी हद तक अनजान था।
उनका उदय भारतीय निशानेबाजी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
वह तस्वीर भारतीय खेल जगत की स्मृतियों में हमेशा के लिए बनी रहेगी जब विक्टोरिया में 1994 के राष्ट्रमंडल खेलों में शानदार प्रदर्शन के बाद किशोर राणा को उनके पिता ने कंधों पर उठा दिया था।
जिस निशानेबाजी खेल से भारत लगभग अपरिचित था, उस खेल में उन्हें एक नायक मिल गया था। उनका यह प्रदर्शन एक ऐसे खिलाड़ी का उदय था जो एक चैंपियन और एक कोच दोनों के रूप में भारतीय निशानेबाजी के भाग्य को नई दिशा देने वाला था।
उस सफलता ने राणा परिवार की किस्मत बदल दी, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने भारत के लिए पदक दिलाने वाले खेल के रूप में निशानेबाजी की क्षमता को उजागर किया।
राणा के पिता नारायण सिंह राणा पूर्व सैनिक हैं। इन दोनों पिता पुत्र की जोड़ी ने राजनीति में हाथ आजमाया और अलग-अलग समय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों से जुड़े रहे। हालांकि उन्हें चुनाव में सफलता नहीं मिली।
महज 12 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने वाले राणा का करियर लगभग दो दशकों तक चला, जिसके दौरान उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में कई पदक जीते।
वह ओलंपियन भी थे। उन्होंने 1996 के अटलांटा ओलंपिक खेलों में भाग लिया था लेकिन पदक नहीं जीत पाए थे।
राजवर्धन सिंह राठौड़ (2004 एथेंस ओलंपिक में रजत पदक) और अभिनव बिंद्रा (2008 बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक) ने बाद में ओलंपिक में पदक जीते लेकिन इसकी नींव एक तरह से राणा ने रखी थी।
दोहा में 2006 के एशियाई खेलों में उन्होंने तेज बुखार और मतली आने के बावजूद तीन स्वर्ण पदक जीते।
उनका जुझारूपन 1995 में दिल्ली में राष्ट्रमंडल निशानेबाजी चैंपियनशिप में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी थी जब उन्होंने ‘फूड प्वाइजनिंग’ से पीड़ित होने के बावजूद प्रतिस्पर्धा की।
जहां राष्ट्रीय कोच सनी थॉमस इस बात को लेकर चिंतित थे कि क्या उनका स्टार निशानेबाज अभ्यास के लिए पहुंच भी पाएगा या नहीं, वहीं राणा ने बीमारी को नजरअंदाज करते हुए आधा दर्जन से अधिक पदक जीते और उस दृढ़ता का नमूना पेश किया जो उनके जुझारू व्यक्तित्व की पहचान बन गई।
ओलंपिक में पदक नहीं जीत पाने के बावजूद उनका महत्व कम नहीं हुआ क्योंकि वह राणा ही थे जिन्होंने भारतीय निशानेबाजी को नई दिशा दी थी। भारतीय निशानेबाजी की दशा बदलने में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है।
लंबे समय तक राष्ट्रीय कोच रहे सनी थॉमस के पसंदीदा खिलाड़ियों में से एक राणा को भारत के सबसे प्रतिभाशाली निशानेबाजों में से एक माना जाता था। थॉमस अक्सर कहते थे कि ‘‘जसपाल को बहुत कम देखरेख की जरूरत थी।’’
उनके अच्छे प्रदर्शन में दिवंगत टिबोर गोंज़ोल का भी अहम योगदान रहा जो हंगरी के कोच थे। उनका रिश्ता कोच और खिलाड़ी से भी अधिक था। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि गोंजोल की तस्वीर राणा के सोशल मीडिया प्रोफाइल पर स्थायी रूप से बनी रही, भले ही अन्य तस्वीरें बदलती रहीं। यह उस गुरु के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धांजलि थी।
शायद गोंज़ोल के साथ अपने संबंधों से प्रेरित होकर ही राणा ने सिर्फ एक कोच से बढ़कर कुछ नया करने का निश्चय किया। देहरादून में अपनी अकादमी और राष्ट्रीय टीम के साथ अपने काम से उन्होंने नए निशानेबाजों को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दृढ़ इच्छाशक्ति वाले और अपने खिलाड़ियों के प्रति बेहद सुरक्षात्मक भाव रखने वाले राणा ने कुछ गलत होने पर कभी भी व्यवस्था से टकराव लेने में संकोच नहीं किया।
मनु भाकर को जब पेरिस ओलंपिक में दो पदक जीतने के बावजूद खेल रत्न पुरस्कार से पहले नजरअंदाज कर दिया गया था तो वह राणा ही थे जिन्होंने अपनी शिष्या के लिए खुलकर आवाज उठाई थी।
राणा के लिए कोचिंग कभी सिर्फ एक पेशा नहीं था। यह एक ऐसी प्रतिबद्धता थी जिसमें उन्होंने अमिट छाप छोड़ी।
पेरिस ओलंपिक में भाकर के दो कांस्य पदक राणा के लिए अपार गर्व की बात थी क्योंकि तोक्यो ओलंपिक खेलों से पहले उनकी कोचिंग की कड़ी पद्धतियों को लेकर मतभेदों के कारण दोनों के बीच तीन साल पहले अलगाव हो गया था। राणा का मानना था कि भाकर में ओलंपिक पदक जीतने की क्षमता है और आखिर में यह सच भी साबित हुआ।
भारतीय निशानेबाजी ने न केवल अपने एक महान निशानेबाज खो दिया, बल्कि एक दूरदर्शी व्यक्ति को भी खो दिया, जिनका प्रभाव आगे भी बना रहेगा।
भाषा
पंत आनन्द
आनन्द