पिता के निधन के बाद टूटी नहीं अस्मिता, जीता ऐतिहासिक स्वर्ण

पिता के निधन के बाद टूटी नहीं अस्मिता, जीता ऐतिहासिक स्वर्ण

पिता के निधन के बाद टूटी नहीं अस्मिता, जीता ऐतिहासिक स्वर्ण
Modified Date: July 31, 2026 / 11:15 pm IST
Published Date: July 31, 2026 11:15 pm IST

ग्लास्गो, 31 जुलाई (भाषा) भारतीय जूडो खिलाड़ी अस्मिता डे राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक जीतने की खबर सबसे पहले जिस व्यक्ति को देना चाहती थीं, वह अब इस दुनिया में नहीं हैं।

अस्मिता के पिता सात महीने पहले ‘ब्रेन स्ट्रोक’ के कारण चल बसे। वह साइकिल मैकेनिक थे और रोज करीब 300 रुपये कमाते थे। त्रिपुरा के एक छोटे से गांव में मिट्टी के घर में अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे।

शुक्रवार को जब 23 साल की अस्मिता ने राष्ट्रमंडल खेलों में महिलाओं के 48 किग्रा से कम के भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय जूडो खिलाड़ी बनकर इतिहास रचा, तो यह पदक जितना उनका था, उतना ही उनके पिता का भी था।

अस्मिता ने भावुक होकर कहा, ‘‘जब मेरे पिता का निधन हुआ, तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया, क्योंकि वही मेरा सबसे बड़ा सहारा थे। ’’

कुछ पल के लिए जश्न की जगह उन यादों ने ले ली, जो उस व्यक्ति से जुड़ी थीं जिसने उनके सपने को तब से संजोया था जब वह भारत का सपना भी नहीं बना था।

अस्मिता ने कहा, ‘‘मैं त्रिपुरा के एक बहुत छोटे गांव से हूं। वहां लोग इतने बड़े सपने नहीं देखते, लेकिन पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया। ’’

परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके पिता साइकिल ठीक करके रोज करीब 300 रुपये कमाते थे जिससे घर का खर्च चलता था। परिवार साधारण मिट्टी के घर में रहता था, लेकिन उन्होंने कभी पैसों की कमी को बेटी के खेल के रास्ते में नहीं आने दिया।

जब घुटने की चोट के कारण अस्मिता का करियर खतरे में पड़ गया तो उनके पिता उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लेकर आए, दवाइयां खरीदीं और अपनी क्षमता के अनुसार हर मदद की।

पिछले साल दिसंबर में पिता की अचानक मौत ने अस्मिता को तोड़ दिया। उन्हें लगा कि उनका सबसे बड़ा सहारा और उनका सपना दोनों खत्म हो गए हैं।

लेकिन उनकी मां ने पति की जगह जिम्मेदारी संभाली। अंतिम संस्कार के केवल 10 दिन बाद उन्होंने अस्मिता से दोबारा ट्रेनिंग शुरू करने को कहा। उन्होंने कहा, ‘‘अगर मैं आज तुम्हें रोक दूंगी, तो तुम्हारे पिता सोचेंगे कि मैंने तुम्हारे सपने तोड़ दिए। ’’

इसके बाद अस्मिता अपना सामान लेकर भोपाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण केंद्र लौट गईं।

राष्ट्रमंडल खेलों से पहले वह काफी तनाव में थीं और कई रातों तक सो नहीं पाती थीं। उन्होंने कहा कि पदक जीतने से पहले वह मुकाबलों के बारे में सोचती रहती थीं और सुबह 5:30 बजे अभ्यास के लिए उठ जाती थीं।

ग्लास्गो पहुंचने के बाद भी उनका डर कम नहीं हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘मैं सोच रही थी कि क्या होगा। बस मेरे दिमाग में यही था कि मुझे सबको हराकर जीतना है। ’’

उनका लक्ष्य इतना मजबूत था कि उन्होंने अपनी पसंदीदा मिठाई लवंगलता भी नहीं खाई। उनके भाई द्वारा खरीदी गई मिठाई घर के फ्रिज में रखी रही। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि कई बार खाने का मन हुआ, लेकिन फिर खुद को रोक लिया।

शुक्रवार को उनकी सारी मेहनत और त्याग सफल हो गया। इस स्वर्ण पदक के साथ अस्मिता डे ने भारतीय जूडो के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

भाषा नमिता मोना

मोना


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