इस तरह के स्वागत की कभी कल्पना नहीं की थी, गृह नगर कोटा में मिले भव्य सम्मान पर अरुंधति ने कहा

इस तरह के स्वागत की कभी कल्पना नहीं की थी, गृह नगर कोटा में मिले भव्य सम्मान पर अरुंधति ने कहा

इस तरह के स्वागत की कभी कल्पना नहीं की थी, गृह नगर कोटा में मिले भव्य सम्मान पर अरुंधति ने कहा
Modified Date: August 7, 2026 / 04:48 pm IST
Published Date: August 7, 2026 4:48 pm IST

कोटा, सात अगस्त (भाषा) राष्ट्रमंडल खेलों की स्वर्ण पदक विजेता मुक्केबाज अरुंधति चौधरी (70 किग्रा) अपने गृह नगर कोटा में मिले भव्य स्वागत से भावुक हो गईं।

इंजीनियरिंग और मेडिकल की कोचिंग के लिए मशहूर कोटा ने अरुंधति के ग्लास्गो में शानदार प्रदर्शन के बाद उनका शानदार स्वागत किया।

अरुंधति के शानदार अभियान में फाइनल में विश्व चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता शैंटेल रीड को हराना शामिल था और उन्होंने सेमीफाइनल में गत चैंपियन रोजी एक्लेस को भी मात दी थी।

जयपुर से कोटा तक लगभग 250 किमी की यात्रा के बाद जब अरुंधति अपने घर पहुंचीं तो भावुक और थकी हुई नजर आईं। घर पहुंचते ही उन्होंने अपना स्वर्ण पदक अपनी मां सुनीता को दे दिया।

उन्होंने बृहस्पतिवार रात कोटा पहुंचने पर कहा, ‘‘पहले मुझे लगता था कि खेलों के लिए इतना उत्साह और समर्थन केवल हरियाणा में ही मिलता है, लेकिन अब ऐसा नहीं है। राजस्थान में भी खेलों के प्रति वही माहौल है। यह पहली बार है जब मुझे राजस्थान में जनता और सरकार, दोनों की ओर से इतना शानदार स्वागत मिला है। ’’

अरुंधति और उनके पिता सुरेश चौधरी ने अपनी बेटी के संघर्षपूर्ण सफर के बारे में शुक्रवार को पीटीआई से बात की जिसमें शाारीरिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां शामिल रहीं। उनके पिता कोटा मुक्केबाजी संघ के अध्यक्ष भी हैं।

अरुंधति ने कहा, ‘‘वजन कम करना हमेशा सबसे बड़ी चुनौती रहा। ’’

इस मुक्केबाज ने भविष्य की योजनाओं पर कहा कि फिलहाल उनका सबसे बड़ा लक्ष्य आगामी ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई करना है। लॉस एंजिलिस ओलंपिक में अब दो साल से भी कम समय बचा है और उनका मुख्य लक्ष्य अगले साल अप्रैल में होने वाली विश्व चैंपियनशिप के जरिए ओलंपिक का टिकट हासिल करना है।

अरुंधति ने बताया कि विदेशों में प्रतियोगिताओं के दौरान शाकाहारी होने के कारण खान-पान को लेकर उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘कल रात मैंने चार चपातियां खाईं, फिर भी मेरा मन और खाने का था। ’’

उनके पिता सुरेश ने कहा, ‘‘मुक्केबाजी में उचित रिंग और एक पेशेवर कोच की जरूरत होती है, लेकिन शुरूआती दिनों में अरुंधति को ये सब नहीं मिले। उसने ऐसे कोच के मार्गदर्शन में कोटा स्टेडियम की कंक्रीट (एस्फाल्ट) की सतह पर ट्रेनिंग ली जिसका मुक्केबाजी से कोई लेना देना नहीं था। उन्होंने उसे ट्रेनिंग देने के लिए खुद यूट्यूब वीडियो देखकर तकनीक सीखीं। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे समाज में औरतें हमेशा से पारंपरिक भूमिका निभाती रही हैं और शायद ही कभी अकेले बाहर निकलती। जब अरुंधति ने 15-16 साल की उम्र में ट्रेनिंग के लिए पहली बार खेलों वाले ‘शॉर्ट्स’ पहने, तो कोटा और बूंदी में रिश्तेदारों और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। ’’

सुरेश ने कहा, ‘‘लोगों ने मेरी आलोचना की और कहा कि मैं बेवकूफ हूं जो अपनी बेटी को छोटे बाल रखने और ‘शॉर्ट्स’ पहनकर ट्रेनिंग करने दे रहा हूं। मुझे लगातार समाज की ऐसी सोच से लड़ना पड़ा। ’’

भाष नमिता मोना

मोना


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