(नीलाभ श्रीवास्तव)
देवली, 22 जनवरी (भाषा) झारखंड की राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉलर रोशनी वर्मा जब यहां सीआईएसएफ के क्षेत्रीय ट्रेनिंग सेंटर में ‘पासिंग आउट’ परेड कर रहीं थी तो स्टैंड में खड़े अपने बड़े भाई अशोक को देखकर उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।
उनके अंदर की भावनाएं सिर्फ भाई को देखकर ही नहीं बल्कि इस अहसास से भी उमड़ पड़ीं कि उनके और उनके परिवार के संघर्ष के दिन आखिरकार खत्म हो गए हैं।
यह पल उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि का प्रतीक था जो उनकी ट्रेनिंग पूरी होने और आधिकारिक रूप से बल में शामिल होने का पल था।
झारखंड के लिए दो बार राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉलर रह चुकी रोशनी अपने राज्य में एक घरेलू सहायिका के तौर पर काम कर रही थीं और जब कुछ स्थानीय जान-पहचान वालों ने उन्हें सीआईएसएफ (केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) में खिलाड़ियों के लिए खाली जगह के बारे में बताया।
रोशनी ने जिंदगी बदलने के इस मौका को देखा और बीए की तीसरे साल की छात्रा ने पिछले साल इस नौकरी के लिए आवेदन किया।
उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘‘मैंने राष्ट्रीय फुटबॉल टूर्नामेंट में दो बार झारखंड का प्रतिनिधित्व किया है। मैं रांची के कांके के पतरागोंडा गांव में पली-बढ़ी, मेरे परिवार के पास मेरे खेल के सपनों के लिए, यहां तक कि पढ़ाई के लिए भी पैसे नहीं थे।
रोशनी ने कहा, ‘‘मेरे छह लोगों के परिवार (माता-पिता सहित) में कोई भी नौकरी नहीं करता है। ’’
उन्होंने फिर अपनी कठिनाइयों के बारे में विस्तार से बताया जिनका सामना उन्हें अपने माता-पिता को घर चलाने में मदद करने के लिए करना पड़ा।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे माता-पिता की आय का कोई स्रोत नहीं है। मेरे तीन भाई पढ़ रहे हैं और वे दिहाड़ी मजदूरी करके मिलने वाले बहुत कम पैसों से घर चलाने में मदद करते हैं। ’’
रोशनी ने कहा, ‘‘कुछ स्थानीय ‘दीदियों’ (बड़ी बहन) ने मुझे पिछले साल सीआईएसएफ की नौकरी के बारे में बताया और मैंने इस उम्मीद में अप्लाई किया कि यह मेरी जिंदगी बदल देगा। ’’
अब सच में, यह हो गया है!
रोशनी अशोक को समारोह में देखकर बहुत खुश थीं क्योंकि उनके बड़े भाई रांची से दिल्ली और कोटा होते हुए लंबी ट्रेन यात्रा के बाद देवली सीआईएसएफ सेंटर पहुंचे थे।
अशोक ने रोशनी की वर्दी पर ‘हेड कांस्टेबल’ रैंक को देखते हुए कहा, ‘‘हमारे माता-पिता नहीं आ सके। उनकी तबीयत ठीक नहीं है। हमें कन्फर्म टिकट भी नहीं मिल पाए। तो रोशनी के ‘पासिंग आउट’ समारोह में सिर्फ मैं ही आ सका।’’
रोशनी उन 324 खेल कोटा कर्मियों में से एक थीं जिन्होंने यहां खेल मंत्री मनसुख मांडविया को सलामी दी। यह केंद्रीय अर्धसैनिक बल के 56 साल के इतिहास में एक साथ भर्ती किए गए खिलाड़ियों का अब तक का सबसे बड़ा बैच भी था।
हालांकि रोशनी की कहानी ऐसे कई प्रशिक्षु की कहानियों से मिलती-जुलती है जिन्हें देश के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में पदक जीतने के मकसद से बल में भर्ती किया गया था।
सीआईएसएफ के महानिदेशक प्रवीर रंजन ने कहा, ‘‘यह सुनिश्चित किया जाएगा कि इन खिलाड़ियों को खेलने और प्रदर्शन करने का मौका मिले। ’’
वहीं 22 साल की बास्केटबॉल खिलाड़ी विधि की कहानी रोशनी से थोड़ी अलग है, लेकिन उसकी चुनौतियां समान लगती हैं।
विधि ने कहा, ‘‘मैं हरियाणा के पानीपत की रहने वाली हूं। मैं अपने खेल को बेहतर बनाने के लिए बेहतर मौकों की तलाश में थी, लेकिन मुझे कुछ खास नहीं मिला। तभी मैंने सीआईएसएफ में यह पद देखा और इसके लिए अप्लाई किया क्योंकि आखिरकार यह हम जैसे खिलाड़ियों के लिए ही है। ’’
नए बैच को जल्द ही देश भर में सीआईएसएफ की अलग-अलग इकाईयों में शामिल किया जाएगा और बाद में उन्हें अलग-अलग खेल टीम में बांटा जाएगा जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलेंगी।
भाषा नमिता आनन्द
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