(तस्वीरों के साथ) … अमनप्रीत सिंह …
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) पाकिस्तान के नये टेनिस सितारे मुहम्मद शोएब के लिए एक समय ऐसा भी था जब वह चप्पलों में और सलवार-कमीज़ पहनकर टेनिस का अभ्यास करते थे, क्योंकि जूते और टेनिस किट खरीदने की उनकी आर्थिक स्थिति नहीं थी। कई बार उनके पुराने जूतों के तलवे फटने की वजह से पैरों में छाले पड़ते और खून तक निकल आता, लेकिन उनका हौसला नहीं डिगा और उन्होंने खेलना जारी रखा। पेशावर क्लब के कोर्ट पर अभ्यास के लिए उन्हें दोपहर की भीषण गर्मी का इंतजार करना पड़ता, क्योंकि उसी समय वहां भीड़ कम होती थी। बीस साल का यह खिलाड़ी संघर्षों को धता बताकर रविवार को इस्लामाबाद में पाकिस्तान का नया टेनिस चैंपियन बनकर उभरा। वह देश के इतिहास में इस उपलब्धि को हासिल करने वाले सिर्फ तीसरे खिलाड़ी बन गए। उनसे पहले ऐसाम-उल-हक़ कुरैशी और अकील खान ने यह उपलब्धि हासिल की थी। शोएब की आईटीएफ फ्यूचर्स खिताबी जीत ने न केवल उनका निजी सपना पूरा किया, बल्कि पाकिस्तान के लिए 20 वर्षों से चले आ रहे सिंगल्स खिताब के सूखे को भी खत्म किया। आखिरी बार 2007 में अकील खान ने लाहौर में फ्यूचर्स टूर्नामेंट जीता था, जबकि उसी साल ऐसाम-उल-हक कुरैशी ने दिल्ली में चैलेंजर खिताब अपने नाम किया था। यह खिताब पेशेवर टेनिस सर्किट के निचले स्तर पर आता है, लेकिन एकल वर्ग में बेहद सीमित सफलता हासिल करने वाले पाकिस्तान जैसे देश में शोएब की यह उपलब्धि बेहद अहम मानी जा रही है। शोएब की टेनिस यात्रा किसी बड़े सपने से नहीं, बल्कि पेशावर में एक ‘बॉल बॉय’ के रूप में शुरू हुई। उन्होंने अपने भाई शाह हुसैन के नक्शेकदम पर चलते हुए और मामा रोमन गुल के मार्गदर्शन में खेल सीखा। उनके पिता हैदर हुसैन दिहाड़ी मजदूर हैं। वह अक्सर उन्हें टेनिस छोड़ने की सलाह देते थे। परिवार की रोजी-रोटी के लिए वह खेतों में 500-600 रुपये प्रतिदिन कमाते थे और बारिश के दिनों में खाने की चिंता सताने लगती थी। शोएब ने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहा, “पिता चाहते थे कि मैं पढ़ाई कर शिक्षक या इंजीनियर बनूं, क्योंकि टेनिस हमारे लिए बहुत महंगा था।” लेकिन उनकी मां ने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी। उन्होंने कहा, “वह हमेशा कहती थीं कि मेहनत करोगे तो सबको गलत साबित करोगे।” टेनिस के बुनियादी संसाधन भी उनके लिए विलासिता थे। वह स्थानीय बाजारों से पुराने रैकेट और पुराने जूते खरीदते थे। कई बार वे भी उपलब्ध नहीं होते थे। शोएब ने कहा, “मैं चप्पलों में खेलता था और सलवार-कमीज़ पहनता था। हमारे पास कुछ भी खरीदने के पैसे नहीं थे।” उन्होंने कहा, “अभ्यास की परिस्थितियां भी बेहद कठिन थीं। पुराने टेनिस बॉल को पानी से गीला कर धीमा किया जाता था और कड़ी गर्मी में अभ्यास करना पड़ता था, क्योंकि दोपहर के समय ही टेनिस कोर्ट खाली रहता था।” उन्होंने कहा, “मेरे जूतों के तलवे पूरी तरह से घिसे होते थे और अभ्यास या खेल के दौरान मेरे पैरों के निचले हिस्से से खून आने लगता था, लेकिन मैं खेलना जारी रखता था।” शोएब ने कहा कि इस्लामाबाद में हुए टूर्नामेंट में उनका मकसद सिर्फ एक एटीपी अंक हासिल करना था, लेकिन प्रतियोगिता शुरू होने के साथ ही उनका सफर शानदार रहा। शोएब ने इस्लामाबाद से ‘पीटीआई’ से कहा, “मेरा लक्ष्य सिर्फ एक अंक (रैंकिंग) हासिल करना था। मैं सिर्फ अपने सफर का आगाज़ करना चाहता था।” पिछली असफलताओं ने उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर दिया था। कई बार वह बेहतर रैंकिंग वाले खिलाड़ियों के खिलाफ बढ़त बनाने के बावजूद अहम मौकों पर चूक गए थे। इस्लामाबाद में सब कुछ बदल गया। पहला अंक हासिल करने के बाद उन्होंने बेखौफ होकर खेलना शुरू किया। एक जीत दो में बदली, और फिर उन्होंने शीर्ष वरीय खिलाड़ी को हराकर बड़ा उलटफेर किया। शोएब ने कहा, “मैंने खुद से कहा कि 100 प्रतिशत दूंगा, ताकि कोई पछतावा न रहे।” वह फाइनल तक पहुंचते-पहुंचते इतिहास के बारे में नहीं, बल्कि हर अगले अंक के बारे में सोच रहे थे। एक एटीपी अंक के लक्ष्य के साथ शुरू करने वाले शोएब 15 अंक और खिताब लेकर लौटे। शोएब इस तरह एक सप्ताह के अंदर बिना रैंकिंग वाले खिलाड़ी से पाकिस्तान के शीर्ष एकल खिलाड़ी बन गए। यह उपलब्धि ऐसे देश में और भी खास है, जहां टेनिस को लंबे समय से पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। भाषा आनन्द पंतपंत