जानिए नौकरशाह से सियासत का शाह बनने जा रहे ओपी चौधरी के बारे में, देखिए उनसे खास बातचीत
जानिए नौकरशाह से सियासत का शाह बनने जा रहे ओपी चौधरी के बारे में, देखिए उनसे खास बातचीत
रायपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत में एक नया नाम जुड़ने वाला है। हम बात कर रहे हैं, रायपुर के कलेक्टर ओपी चौधरी के बारे में, जिन्होंने केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय को अपना इस्तीफा भेज दिया है। उनके इस्तीफे की अटकलें पिछले कई दिन से लगाई जा रही थी और कहा जा रहा है कि वे बीजेपी के साथ अपनी नई सियासी पारी की शुरुआत कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ में ओपी चौधरी की पहचान एक ऐसे युवा अफसर के रुप में है जिन्होंने खासतौर पर शिक्षा और आदिवासी इलाकों की बेहतरी के लिए काम किया है। आइए जानते हैं नौकरशाही छोड़कर सियासत के शाह बनने की तैयारी कर रहे ओपी चौधरी की शुरुआती सफर और उनके राजनीतिक भविष्य की संभावनाओं के बारे में।
ओपी चौधरी मूलतः रायगढ़ जिले के बयंग नामक गांव के निवासी हैं। वे अघरिया समुदाय से आते हैं। उनके पिता दीनानाथ चौधरी शिक्षक थे, ओपी जब कक्षा 2-3 में थे तभी उनके पिता की मौत हो गई। पिता की मौत के बाद ओपी की मां कौशिल्या पर तीन बच्चों की पढ़ाई और परवरिश की जिम्मेदारी आ गई। उनकी मां ने महज चौथी तक की ही शिक्षा हासिल की थी लेकिन फिर भी उन्होंने ये जिम्मेदारी बखूबी निभाई। पेंशन के रूप में उन्हें जो भी रकम मिली उन्होंने बच्चों की पढ़ाई में लगा दी।
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ओपी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई के बाद भिलाई के एक कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। उन्होंने हिंदी मीडियम से ही पढ़ाई की। 6वीं कक्षा में आकर उन्होंने पहली बार अंग्रेजी पढ़ी। लेकिन आईएएस परीक्षा के लिए उन्होंने हिंदी का ही विकल्प चुना। ग्रेजुएशन के दौरान ही उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और 22 साल की उम्र में पहले ही प्रयास में उनका सलेक्शन आईएएस के लिए हो गया।
ओपी की पहली पोस्टिंग असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में 2006 में कोरबा में हुई, इसके बाद 2007 में उन्हें रायपुर में एसडीओ बनाया गया। 2007 में उन्हें जांजगीर जिला पंचायत का सीईओ बनाया गया। साल 2011 में उन्हें दंतेवाड़ा में कलेक्टर के तौर पर पदस्थ किया गया। दंतेवाड़ा कलेक्टर के पद पर रहते हुए उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को विज्ञान की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया। इंजीनियरिंग तथा मेडिकल कॉलेजों की प्रवेश परीक्षाओं के लिए विशेष कोचिंग दिलाने के लिए सुविधाओं के साथ आवासीय स्कूल की शुरुआत कराई।
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गीदम ब्लाक में स्थित एक छोटे से गांव जावंगा को 2011 में शिक्षा के एक बड़े केन्द्र के रूप में विकसित किया। उन्होंने जिले में लाइवलीहुड कॉलेज की भी शुरुआत की। जिसे बाद में पूरे प्रदेश में लागू किया गया। 2011-12 में बेहतर काम के लिए उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा एक्सीलेंस अवार्ड दिया गया था।
अब भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर वे सियासत में भाग्य आजमाने की तैयारी हैं। चर्चा है कि वे बीजेपी का दामन थाम सकते हैं, हालांकि अभी किसी भी स्तर पर इसकी घोषणा नहीं हुई है लेकिन कहा जा रहा है कि बीजेपी के राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में उन्हें भाजपा की सदस्यता दिलाई जा सकती है। इसके पहले 24 अगस्त को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में चौधरी को बीजेपी प्रवेश कराने की योजना बनाई गई थी लेकिन शाह का दौरा टलने के कारण यह संभव नहीं हो सका।
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चर्चा यह भी है कि उन्हें खरसिया विधानसभा सीट से स्वर्गीय नंदकुमार पटेल के बेटे और मौजूदा विधायक उमेश पटेल के खिलाफ उतारा जा सकता है। लेकिन उनके लिए जांजगीर-चांपा की किसी सीट पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह खरसिया सीट को ही उनके लिए उपयुक्त मान रहे हैं। जातिगत समीकरण और कांग्रेस के गढ़ को ढहाने के लिए चौधरी को उपयुक्त उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा है। फिलहाल उनके अगले कदम और सीट के बारे में स्थिति साफ नहीं है। चौधरी और भाजपा नेता इस मुद्दे पर बोलने से परहेज कर रहे हैं। इस्तीफे की मंजूरी के बाद ही दोनों तरफ से स्थिति स्पष्ट होने के आसार हैं।
वेब डेस्क, IBC24

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