नागौद विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए जनता का मूड-मीटर
नागौद विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए जनता का मूड-मीटर
सतना। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है मध्यप्रदेश के नागौद विधानसभा सीट की। नागौद विधानसभा की बात की जाए तो सतना जिले में आने वाली इस सीट पर रियासतों और राजपरिवारों का दबदबा रहा है। आज़ादी के बाद भी पूरे इलाके में राजपरिवार और उनके वंशजों का वर्चस्व रहा है। लेकिन लोकतंत्र के दौर में राजघरानों का बैकग्राउंड जीत की कोई गारंटी नहीं देता है। इसे साबित किया है कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह ने, जो एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं और पिछले चुनाव में जिन्होंने राजपरिवार से आने वाले बीजेपी प्रत्याशी गगनेंद्र सिंह को शिकस्त दी।
रियासतों और राजे-रजवाड़ों का दौर भले ही बहुत पहले बीत गया हो लेकिन नागौद महल की चमक दमक और शानो शौकत फीकी नहीं पडी है। नागौद की सियासत में महल और राजपरिवार का दखल बना हुआ है। हालांकि पिछली बार यहां की जनता ने रियासत के दबदबे को नकार कर एक आम किसान के बेटे को अपना जनप्रतिनिधि चुना।
नागौद में राजशाही तो खत्म हो गई। लेकिन न तो यहां की जनता की किस्मत बदली और न ही क्षेत्र की ही सूरत बदल पाई जबकि जनता से लुभावने वादे कर नेता वोट तो हथिया लेते है। जीत के बाद मतदाताओं की उपेक्षा का सिलसिला नागौद में भी देखने को मिलता है। विकास की उम्मीदों और पिछड़ेपन से मुक्ति का सपना देखने वाली नागौद की जनता को 2013 के चुनाव के बाद से लगातार नाउम्मीदी ही मिली है। जाहिर है ये सारे मुद्दे आगामी चुनाव में नेताओं के खिलाफ जा सकते हैं। हालांकि मौजूदा विधायक का दावा है कि उन्होंने नागौद में काफी विकास कार्य किए और यहां की जनता फिर से उनपर भरोसा जताएगी।
यह भी पढ़ें : राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा कांग्रेस भवन के कर्मचारी पकलु और बुधराम ने
यूं तो नागौद की सियासत में महलों का असर हमेशा से ही रहा है लेकिन पिछले चुनाव में नागौद सीट पर राजशाही का सीधा दखल नहीं रहा है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि लोकतंत्र के इस दौर में सिर्फ महलों का बैकग्राउंड ही सियासत में सफलता की गारंटी है। यदि ऐसा होता तो 2013 में बीजेपी के गगनेंद्र सिंह को जीत के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।
मुद्दों की बात की जाए तो नागौद में इनकी कमी नहीं है। पिछले चुनाव में किये गए वादों पर कुछ भी नहीं हो पाया है। इसके चलते कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह के खिलाफ नागौद की जनता में नाराजगी साफ देखी जा सकती है, जिसका जवाब उन्हें इलाके की जनता को देना होगा। आने वाले चुनाव में नागौद में विकास और जल संकट के साथ बेरोजगारी भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनता नजर आ रहा है।
नागौद की जनता ने पिछली बार जिस भरोसे के साथ कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह को अपना विधायक चुना था और जिन वादों के साथ नेताजी चुनाव लड़े थे। नागौद में उन वादों पर धरातल में कोई काम हुआ हो, नजर नहीं आता। शायद कांग्रेस विधायक भी इस बात को भलीभांति जानते हैं। इसलिए वो भी चुनावी साल में एक बार फिर क्षेत्र की जनता के सामने अपने पिछले कार्यकाल का हिसाब दे रहे हैं। देखा जाए तो यादवेंद्र सिंह के लिए ये खतरे की घंटी है। नागौद में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ये इलाका पिछड़ा नजर आता है। वहीं सरकारी योजनाओं के अमल में ईमानदार कोशिशों का अभाव भी यहां के वोटर्स में नाराजगी की एक वजह है।
नागौद में 90 फीसदी किसान मतदाता है जो आजादी के बाद से सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। मौजूदा विधायक से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। किसान हो या आम जनता आज भी बुनियादी जरूरतों से महरूम है। यही वजह है कि मौजूदा विधायक के खिलाफ जनता में गुस्सा नजर आ रहा है। यादवेंद्र सिंह की माने तो कांग्रेसी होने की वजह से उनको ज्यादा तबज्जो नहीं दी गई। इसकी वजह से इलाके का न तो विकास तेजी से हो सका और न ही नागौद में उद्योग ही लग सकें। कांग्रेस विधायक भले राज्य सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाकर अपने-आप को निर्दोष बता रहे हो। लेकिन बीजेपी कोई मौका नहीं गंवाना चाहती और वो इन मुद्दों को लेकर उन्हें आगामी चुनाव में घेरने में जुट गई है।
यह भी पढ़ें : केंद्रीय मंत्री ने मोदी को बताया टाइगर, विपक्ष को कहा- बंदर, कौवा और गधा
करीब दो लाख की आबादी वाले नागौद विधानसभा क्षेत्र ने सियासत के कई रंग दिखाए हैं। यहां एक वक्त ऐसा भी था जब जनता महलों के आगे गुहार लगाती थी, लेकिन जनता के राजतंत्र यानी लोकतंत्र में नागौद की जनता अपने हक के लिए अब महलों की परवाह किए बगैर आवाज बुलंद कर रही है। लेकिन अब भी कई मुद्दे ऐसे है जिनका का हल न तो पहले हुआ और ना ही आज हो पाया है।
नागौद विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही होता आ रहा है। यहां की जनता ने बारी-बारी से दोनों को जीत का सेहरा पहनाया है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो दो बार बीजेपी तो एक बार कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव जीते। जाहिर है कि यहां कि जनता लोक लुहावने वादों के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष की लोकप्रियता और साफ-स्वच्छ छवि देख कर वोट करती आ रही है। यही वजह है कि दोनों ही पार्टियां यहां अपना उम्मीदवार ऐसा चुनती हैं, जो जनता की कसौटी में खरा उतर सके।
नागोद में सियासत की गोटियां बिछाई जाने लगी हैं। निशाने भी साधे जा रहे हैं और दुश्मन पर करारी चोट करने की भी तैयारी है। विंध्य क्षेत्र में नागौद को एक अहम सियासी केंद्र माना जा सकता है। यहां होने वाली सियासी गतिविधियों का असर दूसरी सीटों पर भी पड़ता है। लिहाजा आने वाले चुनाव में इस सीट पर सबकी नजर होगी।
वैसे नागौद के सियासी इतिहास की बात की जाए तो यहां का राजनीति पर महल का असर शुरू से ही रहा है। 2003 में इस सीट से राजघराने से आने वाले नागेंद्र सिंह ने बीजेपी के टिकट पर कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह को हराया। 2008 के विधानसभा चुनाव में भी इन्हीं दोनों नेताओं में सियासी घमासान हुआ, जिसमें नागेंद्र सिंह ने एक बार फिर बाजी मारी। 2013 में कांग्रेस ने तीसरी बार यादवेंद्र सिंह पर भरोसा जताते हए उन्हें चुनावी अखाड़े में उतरा। जबकि बीजेपी ने युवा नेता गगनेंद्र प्रताप सिंह को मौका दिया, लेकिन गगनेन्द्र जनता की कसौटी में खरे नहीं उतर सके और कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह ने उन्हें शिकस्त दी। इस चुनाव में कांग्रेस को जहां 55 हजार 879 वोट मिले। वहीं बीजेपी को 45 हजार 815 वोट मिले। इस प्रकार जीत का अंतर 10 हजार 64 वोटों का रहा।
सतना जिले में आने वाली इस महत्वपूर्ण विधानसभा सीट में एक बार फिर सियासी पारा चढ़ने लगा है और नेता टिकट पाने के लिए जोड़तोड़ में जुट गए हैं। कांग्रेस की बात की जाए तो राहुल गांधी के कर्नाटक फार्मूले के तहत कई युवा नेता अपनी दावेदारी कर रहे हैं। हालांकि मौजूदा विधायक यादवेंद्र सिंह इन दावेदारों से ज्यादा परेशान नजर नहीं आते है। उनकी माने तो जनता ने जब उन्हें सेवक के रूप में चुना है तो उनका फर्ज है कि वो अपना काम ईमानदारी से करें।
यह भी पढ़ें : विपक्षी महागठबंधन के ख्वाब के बीच देवेगौड़ा के बदले सुर, जानिए क्या कहा
दूसरी ओर बीजेपी में भी संभावित उम्मीदवारों की लंबी फेहरिस्त है। पिछले चुनाव में कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह को कड़ी टक्कर देने वाले गगनेंद्र सिंह का दावा सबसे मजबूत नजर आ रहा है। गंगनेंद्र सिंह भी अपनी उम्मीदवारी को लेकर आश्वस्त है। लेकिन बीजेपी में ही उनको चुनौती देने वालों की कमी नहीं है। इस लिस्ट में सबसे पहला नाम पिछड़ा वर्ग से जिला पंचायत उपाध्यक्ष बनी डॉ रश्मि सिंह का है, तो वहीं खजुराहो सांसद नागेंद्र सिंह के अलावा नागौद नगर परिषद के अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह भी टिकट की रेस में शामिल हैं।
कुल मिलाकर राजे-रजवाड़ों के असर वाले इस क्षेत्र के मतदाता सियासी चालों को खूब समझते हैं। लिहाजा आने वाले चुनाव में दोनों ही दलों को जनता को लुभाने के लिए हर कदम सोच समझ कर उठाना होगा।
वेब डेस्क, IBC24

Facebook


