जबलपुर कैंट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए जनता का मूड-मीटर
जबलपुर कैंट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए जनता का मूड-मीटर
जबलपुर। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है जबलपुर कैंट विधानसभा सीट के विधायक की। जबलपुर कैंट बीते 5 विधानसभा चुनावों से बीजेपी का अभेद्य किला बना हुआ है। रक्षा मंत्रालय की फैक्ट्रियों और उच्च शिक्षा के सबसे ज्यादा संस्थानों के चलते जबलपुर का कैंट विधानसभा क्षेत्र अपना अलग मुकाम रखता है, लेकिन 25 सालों से बीजेपी राज के बाद भी यहां जलसंकट, बेरोज़गारी,अपराध और भ्रष्टाचार के मुद्दे आगामी चुनाव में मौजूदा विधायक की अग्निपरीक्षा जरूर लेंगे।
भारतीय सेना के लिए गोला, बारूद, असलाह, तोपें और गाड़ियां बनाकर, रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करने वाली चार फैक्ट्रियों और थलसेना का मध्यभारत एरिया मुख्यालय होने की वजह से जबलपुर का कैंटोनमेंट एरिया किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जबलपुर के छावनी क्षेत्र और उसके आसपास के इलाके को जोड़कर जो विधानसभा क्षेत्र बनाया गया उसे कैंट विधानसभा का नाम दिया गया। प्रदेश की राजनीति में ये सीट इसलिए भी चर्चित रही क्योंकि यहां से मध्यप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और महाकौशल के दिग्गज नेता ईश्वरदास रोहाणी लगातार बीस सालों तक विधायक रहे। बीते विधानसभा चुनाव से ऐन पहले ईश्वरदास रोहाणी का निधन हो गया था जिसके बाद बीजेपी ने उनके बेटे अशोक रोहाणी को ही प्रत्याशी बनाया। 2013 के चुनाव में अशोक रोहाणी को सहानुभूति लहर का बड़ा सहारा मिला और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी सर्वेश्वर चमन श्रीवास्तव को हराया। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 83 हजार 676 वोट मिले, वहीं कांग्रेस महज 29 हजार 935 वोट ले सकी..इस तरह जीत का अंतर 53 हजार 741 वोटों का रहा। 1 लाख 90 हजार 186 मतदाता वाले कैंट विधानसभा में एक बार फिर बीजेपी और कांग्रेस ने अपनी सियासी बिसात बिछा ली है और सीट के सियासी समीकरणों को साधने की कवायद भी तेज कर दी है।
जबलपुर कैंट विधानसभा क्षेत्र में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी के सियासी अंदाज, इस कदर पैठ बना चुके थे कि आज भी यहां की सियासत में उनकी छाप, साफ दिखाई देती है। वोटर्स को कुछ ना कुछ बांटते रहकर उसे चुनाव में अपनी याद दिलाने की ये परंपरा आज भी जारी है, जिसमें मशगूल मौजूदा विधायक अशोक रोहाणी रोज़ाना कहीं पन्नी, कहीं बस्ते तो कहीं कॉपी-किताबें बांटते नज़र आते हैं। विपक्ष भले इस तरीके पर सवाल उठाता हो मगर वो भी इसी रास्ते पर है। विपक्ष कहीं पानी तो कहीं ढोल मंजीरे बांटने में व्यस्त है।
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सीट पर जाति समीकरण की बात की जाए तो अनारक्षित विधानसभा सीट पर सवर्ण और ओबीसी वोटर्स किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं। यहां करीब 40 हज़ार सामान्य जबकि 60 हज़ार ओबीसी वोटर्स हैं। वहीं अनुसूचित जाति के 27 हज़ार और अनुसूचित जनजाति के 15 हज़ार वोटर्स के अलावा 8-8 हज़ार मुस्लिम और क्रिश्चियन वोटर्स हैं, जो आने वाले चुनाव में एक बार फिर सियासी समीकरण बना या बिगाड़ सकते हैं।
जबलपुर कैंट विधानसभा सीट पर मौजूदा विधायक और विपक्ष के उम्मीदवार, सियासी समीकरणों के बूते जीत का गणित समझने में लगे हैं। लेकिन बुनियादी समस्याओं से संघर्ष कर रही यहां की जनता बड़ी ख़ामोशी से अपने विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड और विपक्ष की भी सक्रियता का लेखाजोखा बना रही है। दरअसल मौजूदा विधायक इलाके में जलसंकट और बेरोज़गारी दूर करने का चुनावी वादा निभा नहीं पाए। जबकि बीते चुनावों में सीएम शिवराज की घोषणा के बाद भी गोकलपुर इलाके के रहवासियों को पट्टे ना दिए जाने से वोटर्स में नाराज़गी है। वहीं कैंट में विकास की योजनाओं में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी आगामी चुनाव में जमकर गूंजने जा रहा है।
जबलपुर कैंट विधानसभा क्षेत्र में स्वच्छ भारत अभियान का ये हाल भ्रष्टाचार की पूरी कहानी खुद-ब-खुद बयां कर देता है। इलाके के वार्ड क्रमांक 79 में शौचालय बनाने के नाम पर हुए फर्जीवाड़े और भ्रष्टाचार को लेकर जनता ख़ासी नाराज़ है। यहां घर-घर शौचालय बनाने के नाम पर लोगों से पैसे लेकर गड्ढे खुले छोड़ दिए गए, जबकि सार्वजनिक शौचालयों में दरवाज़े तक नहीं लगाए गए। इसे लेकर लोगों के पास शिकायतों की लंबी लिस्ट है। जी हां! कैंट विधानसभा क्षेत्र में इस जलसंकट का मुद्दा बाकी तमाम मुद्दों पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। जनता की इस परेशानी पर सियासत भी खूब हो रही है, जिसमें विपक्ष के नेता मौजूदा विधायक पर नाकामी के आरोप लगाते हैं।
कैंट विधानसभा क्षेत्र छावनी परिषद और सेना की वजह से विकसित नज़र आता है लेकिन दूसरे इलाकों में स्थिति खराब है। इलाके में सबसे ज्यादा यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेज होने के बाद भी प्रोफेसर्स की कमी और शिक्षा की गुणवत्ता यहां चुनावी मुद्दा बन चुका है। मौजूदा विधायक के कार्यकाल में यहां ऐसा एक भी उद्योग स्थापित नहीं हुआ जो युवाओं को रोज़गार दे पाता। जाहिर है कांग्रेस आगामी चुनाव में इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने के मूड में है।
कुल मिलाकर कैंट विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के पास 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को घेरने के लिए पर्याप्त मुद्दे हैं। हालांकि बीजेपी के पास भी गिनाने के लिए विकास कामों की लंबी फेहरिस्त है। लेकिन आजकल की सियासत में प्रेजेंटेशन पर काफी कुछ निर्भर करता है और जबलपुर कैंट में भी आने वाले दिनों में मुद्दों के प्रजेंटेशन में दोनों पार्टियां खासी मशक्कत करती नजर आने वाली है।
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जबलपुर कैंट विधानसभा क्षेत्र में छिड़ने जा रहे सियासी समर में प्रादेशिक मुद्दों के साथ साथ स्थानीय मुद्दे जमकर गूंजने जा रहे हैं जिन्हें लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। लेकिन चुनाव से पहले दोनों ही प्रमुख दल कहीं गुटबाज़ी तो कहीं प्रत्याशियों की दावेदारियों से जूझ रहे हैं। हालांकि टिकट का ये टशन इस सीट पर 25 सालों से वापसी का इंतज़ार कर रही कांग्रेस पर ज्यादा भारी पड़ सकता है।
सियासत में महत्वाकांक्षा को ज्यादा वक्त तक दबाना मुश्किल होता है, लेकिन जबलपुर कैंट में इसे बीजेपी नेताओं की मजबूरी कहें या कुछ और रोहाणी परिवार के दबदबे के चलते यहां कोई दूसरा नेतृत्व नहीं उभर पाया है। पहले ईश्वरदास रोहाणी और उनके निधन के बाद अब उनके बेटे अशोक रोहाणी को यहां से टिकट मिल रही है। लेकिन कार्यकर्ताओं की इसी दबी हुई महत्वाकांक्षा का अब सियासी इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है, लाजमी है अशोक रोहाणी ने भी इलाके में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है, क्योंकि वो जानते हैं जो काम कांग्रेस इतने सालों में नहीं कर पाई वो पार्टी के अंदर की गुटबाजी कर सकती है। हालांकि मौजूदा विधायक टिकट का फैसला पार्टी पर छोड़ने की बात कर रहे हैं और खुद की दावेदारी जरूर मजबूत बताते हैं।
जाहिर है सियासी महासमर 2018 में भी बीजेपी से मौजूदा विधायक टिकट के स्वाभाविक दावेदार नजर आ रहे हैं। लेकिन इस बैचेनी का सियासी इस्तेमाल करने की कोशिशें भी यहां शुरू हो गई हैं। अगर ऐसा होता है तो पार्टी हाईकमान भी अपने विधायक के खिलाफ एंटी इंकमबेंसी और परर्फार्मेंस को देखकर टिकट बदलने का विचार कर सकती है। ऐसे में नगर निगम के एमआईसी सदस्य कमलेश अग्रवाल का नाम सबसे आगे है। वहीं जबलपुर नगर निगम की अध्यक्ष सुमित्रा वाल्मीकि, एमआईसी सदस्य रेखा सिंह और नगर निगम के पूर्व अध्यक्ष राजेश मिश्रा बीजेपी की टिकट के दावेदार हैं।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में भी इस बार कैंट सीट से टिकट के दावेदारों की कमी नहीं है। नेता अपनी दावेदारी खुलकर पेश कर रहे हैं। आलोक मिश्रा सबसे बड़े दावेदार है जो क्षेत्र में परिवर्तन यात्रा भी निकाल चुके हैं। उनके अलावा कैंट बोर्ड जबलपुर के उपाध्यक्ष अभिषेक चिंटू चौकसे टिकट के दावेदार हैं जिनके अलावा बीते चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी सर्वेश्वर चमन श्रीवास्तव, जबलपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन प्रेम दुबे और कांग्रेस पार्षद राजेश यादव भी टिकट के दावेदार हैं।
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कुल मिलाकर इस बार भी जबलपुर कैण्ट विधानसभा में सियासी जंग कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही होगी। दरअसल यहां बीजेपी और कांग्रेस छोड़ तमाम प्रत्याशियों की जमानतें हर विधानसभा चुनावों में जब्त होती आई हैं लिहाजा दोनों ही पार्टियों से टिकट पाने वालों की फेहरिस्त लंबी है। हालांकि कांग्रेस और बीजेपी में सीधी टक्कर भी इस बार दीगर चुनावों से अलहदा होने जा रही है।
वेब डेस्क, IBC24

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