‘एआई मंथन 2.0’ में स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने की चर्चा

‘एआई मंथन 2.0’ में स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने की चर्चा

‘एआई मंथन 2.0’ में स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने की चर्चा
Modified Date: September 13, 2026 / 07:20 pm IST
Published Date: September 13, 2026 7:20 pm IST

लखनऊ, 13 सितंबर (भाषा) ‘स्वास्थ्य सेवा के लिए एआई’ विषय पर रविवार को आयोजित सत्र में विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के व्यावहारिक इस्तेमाल पर चर्चा की। इसमें बीमारियों की जल्द और सटीक पहचान करने तथा चिकित्सा सेवाओं को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाने जैसे मुद्दे शामिल रहे।

राज्यपाल की अध्यक्षता में जन भवन (पूर्व में राज भवन) और कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘एआई मंथन 2.0’ के दूसरे दिन इस सत्र का आयोजन किया गया।

‘डॉक्टर्स एआई एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन’ के डॉक्टर अमित कुमार डे ने ‘क्लिनिकल प्रैक्टिस के लिए जेनरेटिव एआई’ विषय पर चर्चा में प्रेडिक्टिव एआई और जनरेटिव एआई के बीच अंतर स्पष्ट किया।

उन्होंने कहा कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल द्वारा दिए गए परिणामों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में एआई का उपयोग सारांश तैयार करने, फॉर्मेटिंग और ड्राफ्टिंग जैसे कार्यों में किया जा सकता है, लेकिन एआई से प्राप्त तथ्यों, दवाओं की मात्रा एवं आंकड़ों का उपयोग करने से पहले उनका सत्यापन जरूरी है।

डॉक्टर लाल पैथलैब्स, नयी दिल्ली के रीनल पैथोलॉजी एंड इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के निदेशक एवं अनुसंधान एवं विकास प्रमुख डॉक्टर आलोक शर्मा ने ‘लेबोरेटरी मेडिसिन में एआई’ विषय पर अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि प्रयोगशालाओं में जांच संबंधी आंकड़ों की मात्रा एवं जटिलता तेजी से बढ़ रही है जबकि विशेषज्ञों की संख्या सीमित है, ऐसे में डिजिटल पैथोलॉजी, हेमेटोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी सहित विभिन्न क्षेत्रों में एआई के प्रयोग से जांच एवं रिपोर्टिंग को अधिक सटीक और तेज बनाया जा सकता है।

शर्मा ने कहा कि एआई का उद्देश्य मौजूदा स्वचालन प्रणालियों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उनकी कार्यकुशलता एवं सटीकता को बढ़ाना है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के विनायक पाठक ने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई चिकित्सकों का विकल्प नहीं, बल्कि उनकी सहायता करने वाला प्रभावी उपकरण है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नयी दिल्ली के ‘सेंटर फॉर डेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च’ के ओरल पैथोलॉजी एंड माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉक्टर दीपिका मिश्रा ने ‘ओरल कैंसर और डेंटिस्ट्री में एआई: पहचान से निर्णय-निर्माण तक’ विषय पर प्रस्तुति दी।

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवा में एआई का उपयोग शोध से आगे बढ़कर वास्तविक चिकित्सकीय अनुप्रयोगों तक पहुंच चुका है।

मिश्रा ने बताया कि मुंह के कैंसर की समय पर पहचान एवं प्रभावी रोकथाम के लिए ‘आरोग्य संकल्प’ मोबाइल ऐप और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। छह राज्यों के नौ प्रमुख केंद्रों पर किए गए प्रथम चरण के अध्ययन में 40,746 संदिग्ध मामलों की स्क्रीनिंग की गई, जिनमें 9,643 मामलों को टेली-विशेषज्ञों द्वारा संदिग्ध तथा 1,385 मामलों को उच्च जोखिम वाला पाया गया।

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के मथुरा सहित 48 गांवों में भी इस पहल का परीक्षण किया गया है तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों, आशा एवं एएनएम कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि ग्रामीण एवं दूरदराज के क्षेत्रों में कैंसर की समय पर पहचान एवं उपचार सुनिश्चित किया जा सके।

भाषा सलीम आशीष

आशीष


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