किराएदारी विवाद में डीआईओएस को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

किराएदारी विवाद में डीआईओएस को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

किराएदारी विवाद में डीआईओएस को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: July 31, 2026 / 11:32 pm IST
Published Date: July 31, 2026 11:32 pm IST

लखनऊ, 31 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को कहा कि जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) को मकान मालिक और किराएदार के बीच निजी किराएदारी विवाद में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

अदालत ने उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पुलिस की मदद से किराये पर संचालित एक स्कूल भवन का कब्जा दोबारा किराएदार को दिलाया गया था।

न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की एकल पीठ ने कहा कि डीआईओएस न तो इस विवाद में आवश्यक पक्षकार था और न ही पीड़ित पक्ष। ऐसे में उसके द्वारा पुनर्विचार (रिकॉल) अर्जी दाखिल करना और उस पर अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) द्वारा संबंधित पक्ष को नोटिस दिए बिना आदेश पारित करना पूरी तरह अवैध था।

पीठ ने आठ जून, 2026 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत संपत्ति का कब्जा मकान मालिकों से लेकर राजधानी लखनऊ के नरही स्थित सहायता प्राप्त विद्यालय ‘विद्या मंदिर गर्ल्स स्कूल’ को वापस सौंप दिया गया था।

अदालत ने कहा कि यह आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन और शक्तियों का मनमाना प्रयोग था।

अदालत ने डीआईओएस और अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) के आचरण को कानून के शासन के विपरीत बताते हुए दोनों पर 25-25 हजार रुपये का व्यक्तिगत हर्जाना लगाया।

अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों अधिकारी यह राशि अपने-अपने वेतन खाते से एक सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं को अदा करें।

उच्च न्यायालय ने विद्यालय पर भी 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और लंबित किराया अपील का निस्तारण एक सप्ताह के भीतर करने का निर्देश दिया।

यह मामला लखनऊ के नरही स्थित उस भवन से जुड़ा है, जिसमें विद्या मंदिर गर्ल्स स्कूल संचालित होता है। संपत्ति के मालिक डॉ. आभा गोयल और डॉ. अमित शेखर ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत बेदखली का आदेश प्राप्त किया था और चार जून, 2026 को उन्हें भवन का कब्जा सौंप दिया गया था।

इसके बाद डीआईओएस ने एक पुनर्विचार अर्जी दाखिल की, जिस पर अपर जिलाधिकारी ने मकान मालिकों को सुने बिना विद्यालय को दोबारा कब्जा सौंपने का आदेश दे दिया।

अदालत ने कहा कि डीआईओएस यह बताने में पूरी तरह विफल रहा कि निजी किराएदारी विवाद में हस्तक्षेप करने का अधिकार उसे किस कानूनी प्रावधान के तहत प्राप्त है।

राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (संपत्ति के अपव्यय की रोकथाम) अधिनियम, 1974 का हवाला दिया, लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि विवादित संपत्ति निजी स्वामित्व वाली थी, न कि किसी शैक्षणिक संस्थान की। इसलिए, वर्ष 1974 के अधिनियम के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते।

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि अपर महाधिवक्ता सुदीप कुमार एक ओर निजी प्रतिवादी विद्यालय की ओर से पेश हुए, जबकि दूसरी ओर उन्होंने राज्य सरकार और डीआईओएस का भी पक्ष रखा।

इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि क्या किसी निजी पक्षकार की ओर से पेश होने के बाद वह राज्य और उसके अधिकारी का भी प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने हितों के टकराव से इनकार किया, लेकिन अदालत ने कहा कि यह विषय विवादास्पद हो सकता है और ऐसा किया जाना वांछनीय भी प्रतीत नहीं होता।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर कोई अंतिम राय व्यक्त करने से परहेज करते हुए इसे अपर महाधिवक्ता के विवेक पर छोड़ दिया कि वे इस पहलू पर स्वयं विचार करें।

भाषा

सं, आनन्द रवि कांत


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