भरण-पोषण के लिए अनावश्यक रूप से कई मुकदमे न करें : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

भरण-पोषण के लिए अनावश्यक रूप से कई मुकदमे न करें : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

भरण-पोषण के लिए अनावश्यक रूप से कई मुकदमे न करें : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: September 15, 2026 / 06:31 pm IST
Published Date: September 15, 2026 6:31 pm IST

लखनऊ, 15 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने भरण-पोषण के लिए एक महिला को अनावश्यक रूप से एक साथ कई मुकदमे चलाने के प्रति आगाह करते हुए कहा कि इससे कुटुम्ब अदालतों पर काम का बोझ बढ़ता है और मामलों के निस्तारण में देरी होती है।

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने शशि गुप्ता की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

शशि गुप्ता ने लखनऊ की एक कुटुम्ब अदालत में लंबित मुकदमे का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।

मामले के अनुसार, कुटुम्ब अदालत ने चार जून, 2024 को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत पति को अपनी पत्नी को प्रति माह सात हजार रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

इसके बाद शशि गुप्ता ने 19 जुलाई, 2024 को इस आदेश के क्रियान्वयन के लिए निष्पादन वाद दायर किया।

पीठ ने पाया कि शशि गुप्ता ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत भी कार्यवाही शुरू की थी, जिसमें उन्हें प्रति माह 4,500 रुपये भरण-पोषण दिया गया था।

अदालत ने यह भी पाया कि दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत पति को 1.51 लाख रुपये का भुगतान करने और कुछ सामान लौटाने पर सहमति बनी थी।

दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने पर भी सहमति जताई थी।

पति ने समझौते के तहत 50,000 रुपये का भुगतान किया लेकिन आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी।

पीठ ने कहा कि शशि गुप्ता ने न तो तलाक की कार्यवाही शुरू की और न ही वैवाहिक अधिकारों की बहाली का अनुरोध किया।

इसके बावजूद वह पति से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए अलग-अलग मंचों पर कार्यवाही कर रही हैं।

उच्च न्यायालय ने कहा कि कानून किसी व्यक्ति को भरण-पोषण के लिए विभिन्न वैधानिक प्रावधानों के तहत कार्यवाही शुरू करने का विकल्प देता है हालांकि, जब कोई महिला अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में आर्थिक असमर्थता का दावा करती है, तो एक ही राहत के लिए अनावश्यक रूप से मुकदमेबाजी बढ़ाना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने कहा कि इस तरह की वैकल्पिक और गैर-जरूरी कार्यवाही से पहले से ही काम के बोझ तले दबी कुटुम्ब अदालतों पर अतिरिक्त भार पड़ता है और मामलों के निस्तारण में देरी होती है।

भाषा सं आनन्द जितेंद्र

जितेंद्र


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