लखनऊ, 24 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने सोमवार को बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी फार्मा) पाठ्यक्रम शुरू करने से पहले संस्थानों के लिए राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेने की जरूरत से जुड़े कई अहम सवाल उठाए।
अदालत ने इस मामले पर फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) से जरूरी दस्तावेजों के साथ विस्तृत जवाब मांगा है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने पीसीआई, उत्तर प्रदेश सरकार और कई शिक्षण संस्थानों से जुड़े मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
पीठ ने पीसीआई को निर्देश दिया है कि अगर जरूरी हो तो वह दो हफ्ते के अंदर हलफनामा दाखिल करे। मामले को अगली सुनवाई के लिए दो हफ्ते बाद सूचीबद्ध किया गया है।
पीठ ने गौर किया कि बैचलर ऑफ फार्मेसी पाठ्यक्रम नियमन 2014 के तहत मंज़ूरी चाहने वाले संस्थान के पास तय सुविधाएं होनी चाहिए, जिनमें इमारतें, रहने की जगह, प्रयोगशालाएं, उपकरण और शिक्षक तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारी शामिल हैं।
अदालत ने सवाल किया कि राज्य सरकार द्वारा एनओसी जारी करने के लिए कोई तय प्रारूप या स्पष्ट पैमाने क्यों नहीं हैं। पीठ ने यह भी सवाल किया कि बी फार्मा कोर्स के लिए एनओसी की जरूरत क्यों है, जबकि डिप्लोमा इन फार्मेसी (डी फार्मा) कोर्स के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
अदालत ने पीसीआई को नियमन संख्या नौ में बताई गई योजना का मतलब और दायरा स्पष्ट करने का निर्देश दिया और साथ ही राज्य सरकार से कहा कि वह उदाहरण के तौर पर पहले जारी किए गए एक या दो एनओसी दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर रखे।
पीठ ने एनओसी और संबद्धता के लिए सहमति के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए।
अदालत ने प्रथम दृष्टया यह पाया कि संबद्धता का मामला विश्वविद्यालय या सक्षम संबद्धता प्राधिकरण से जुड़ा है और पीसीआई की मंजूरी के बाद इस पर विचार किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि पीसीआई खुद निरीक्षण करके यह पता लगा सकती है कि संस्थान तय मानदंडों को पूरा करते हैं या नहीं।
भाषा सं सलीम आशीष
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