लखनऊ, 17 अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने जिला स्तरीय समिति के उस आदेश को शुक्रवार को रद्द कर दिया जिसमें लखीमपुर खीरी में थारू जनजाति के सदस्यों के वन अधिकार दावों को खारिज किया गया था।
अदालत ने अधिकारियों को मामले की पुनः सुनवाई कर उचित समय के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक कोई नया निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक याची अपने मौजूदा वन अधिकारों का पूर्ववत उपयोग करते रहेंगे।
यह आदेश लखीमपुर खीरी के पलिया कलां क्षेत्र में रहने वाले थारू समुदाय के 101 सदस्यों और गैर-सरकारी संगठन ‘उदासा’ द्वारा दायर एक रिट याचिका पर आया।
अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले याचिकाकर्ताओं ने 15 मार्च 2021 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके सामुदायिक वन अधिकारों के दावों को खारिज कर दिया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जिला स्तरीय समिति वन अधिकार अधिनियम, 2006 के उद्देश्य और प्रावधानों पर समुचित विचार करने में विफल रही और अपना निर्णय देते समय मुख्य रूप से वर्ष 2000 में उच्चतम न्यायालय के एक अंतरिम आदेश पर ही निर्भर रही।
पीठ ने कहा कि इस अधिनियम का उद्देश्य वन-निवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना तथा उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाए और सभी प्रासंगिक तथ्यों एवं अभिलेखों की जांच के बाद एक तर्कसंगत आदेश पारित किया जाए।
भाषा सं जफर खारी
खारी