लखनऊ, आठ अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा कि विवाह के सात वर्ष के भीतर किसी विवाहित महिला की ससुराल में असामान्य परिस्थितियों में मौत होना और मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर क्रूरता या उत्पीड़न के साबित होने के मामले में दहेज हत्या की कानूनी धारणा बनती है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पति या ससुराल वालों का महिला की मौत से सीधा संबंध साबित करने वाला प्रत्यक्ष साक्ष्य होना जरूरी नहीं है।
पीठ ने यह टिप्पणी दहेज हत्या के एक मामले में पति संदीप सिंह होरा की उम्रकैद की सजा घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदलते हुए की।
तालकटोरा थाना क्षेत्र में वर्ष 2010 में हुई इस घटना के मामले में अधीनस्थ न्यायालय ने वर्ष 2018 में होरा को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
होरा ने इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की थी।
न्यायमूर्ति अब्दुल मुईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने दहेज हत्या के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304-बी के तहत उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी लेकिन मामले के तथ्यों को देखते हुए उम्रकैद की अधिकतम सजा को उचित नहीं माना।
पीठ ने कहा कि महिला की ससुराल में असामान्य परिस्थितियों में मौत हुई थी और मुकदमे के दौरान दहेज की मांग को लेकर उसके साथ क्रूरता किए जाने की बात साबित हुई।
पीठ ने कहा कि धारा 304-बी की आवश्यक शर्तें पूरी होने पर कानून दहेज हत्या का मुकदमा बनता है और ऐसे में अभियुक्त का महिला की मौत से सीधा संबंध दर्शाने वाला प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं होने मात्र से दहेज हत्या का अपराध समाप्त नहीं हो जाता। हालांकि, उच्च न्यायालय ने उम्रकैद की सजा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने अधिकतम सजा देने के लिए कोई ठोस कारण नहीं बताया।
पीठ ने कहा कि सजा तय करते समय गंभीर और राहत देने वाली परिस्थितियों के बीच उचित संतुलन नहीं बनाया गया।
पीठ ने कहा कि मौजूदा मामला ऐसा दुर्लभ मामला नहीं है, जिसमें उम्रकैद जैसी अधिकतम सजा दी जानी चाहिए।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि होरा छह वर्ष चार माह 19 दिन की वास्तविक सजा भुगत चुका है।
पीठ ने कहा कि इस अवधि के दौरान उसके आचरण या पूर्व आपराधिक इतिहास के संबंध में कोई प्रतिकूल रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश नहीं की गई।
होरा की उम्र करीब 40 वर्ष है और घटना को 16 वर्ष बीत चुके हैं।
उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 304-बी में उम्रकैद का प्रावधान होने के बावजूद ऐसी अधिकतम सजा दुर्लभ मामलों में ही दी जानी चाहिए।
पीठ ने इसी आधार पर होरा की उम्रकैद की सजा को 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया और जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित करने का आदेश दिया।
अदालत ने हालांकि आईपीसी की धारा 498-ए और 406 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं तीन और चार के तहत उसकी दोषसिद्धि और सजाएं बरकरार रखीं।
भाषा सं आनन्द जितेंद्र
जितेंद्र