वकीलों के गैरजरूरी स्थगन मांगने से बढ़ता है लंबित मुकदमों का बोझ: उच्‍च न्‍यायालय

वकीलों के गैरजरूरी स्थगन मांगने से बढ़ता है लंबित मुकदमों का बोझ: उच्‍च न्‍यायालय

वकीलों के गैरजरूरी स्थगन मांगने से बढ़ता है लंबित मुकदमों का बोझ: उच्‍च न्‍यायालय
Modified Date: July 25, 2026 / 12:30 am IST
Published Date: July 25, 2026 12:30 am IST

लखनऊ, 24 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अधिवक्‍ताओं के ज़िला अदालतों या न्यायाधिकरण में व्यस्त होने के कारण बार-बार सुनवाई टालने का अनुरोध करना और बिना किसी ठोस कारण के अदालत में मौजूद न रहना, वकालत के पेशे की गरिमा के खिलाफ है।

न्‍यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने कहा, ‘‘निचली अदालतों या न्यायाधिकरण में व्यस्त होने के कारण बार-बार सुनवाई टालना और बिना कोई कारण बताए पेश न होना, वकीलों की पेशेवर ज़िम्मेदारियों के प्रति सम्मान की कमी और अदालत के प्रति सम्मान की कमी को दिखाता है। यह वकालत के पेशे में गिरते स्तर को भी उजागर करता है।’’

न्‍यायमूर्ति विद्यार्थी ने कहा, ‘इसलिए, पीठ बार के सदस्यों से अनुरोध करता है कि वे उच्‍च न्‍यायालय के ज़िम्मेदार अधिकारियों के तौर पर अपनी भूमिका के महत्व को समझें, अपनी मदद के स्तर को बेहतर बनाएं और बेतुके या मामूली कारणों से सुनवाई टालने की मांग न करें, क्योंकि इससे पीठ की उत्पादकता कम होती है और तेज़ी से न्याय मिलने में बाधा आती है।’

उन्‍होंने कहा कि कुछ मामलों में, नए मामलों की सुनवाई जानबूझकर नहीं होने दी जाती ताकि वे बिना किसी असरदार आदेश के लंबित रहें, जिससे उच्‍च न्‍यायालय में लंबित मामलों की संख्या में कृत्रिम बढ़ोतरी होती है। उन्होंने यह भी कहा कि निचली अदालतें अक्सर सिर्फ़ इसलिए कार्यवाही टाल देती हैं क्योंकि मामला उच्च न्यायालय में लंबित है, भले ही कोई अंतरिम आदेश पारित न किया गया हो, जिससे न्याय मिलने में देरी होती है।

न्‍यायमूर्ति विद्यार्थी ने ये टिप्पणियां श्रावस्ती के अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम मामले से जुड़ी एक अपील को खारिज करते हुए कीं। उन्होंने श्रावस्ती के विशेष न्‍यायाधीश (एससी/एसटी कानून) के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उन्‍होंने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 के तहत अंकित यादव को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने की अर्ज़ी खारिज कर दी थी।

यह मामला 2022 में दर्ज एक मुकदमे से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राम सुरेश यादव और उनके बेटे अंकित यादव ने शिकायतकर्ता और उनके बेटे के साथ मारपीट की और उन्हें जाति-आधारित गालियां दीं।

जांच के बाद, पुलिस ने केवल राम सुरेश यादव के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करते हुए कहा कि अंकित यादव के खिलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। मुकदमे के दौरान, अपीलकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अंकित यादव को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने के लिए एक अर्ज़ी दाखिल की थी।

सबूतों की जांच के बाद, एससी/एसटी मामलों की विशेष अदालत ने पाया कि घायल चश्मदीद गवाह ने साफ़ तौर पर कहा था कि घटना वाली जगह पर राम सुरेश यादव के अलावा कोई और मौजूद नहीं था। अपील करने वाले ने भी अंकित यादव की कोई खास भूमिका नहीं बताई थी। इन तथ्यों के आधार पर, विशेष अदालत ने अर्ज़ी खारिज कर दी, जिसके बाद यह अपील दायर की गई।

अपील को खारिज करते हुए, उच्‍च न्‍यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत मिली शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब सिर्फ़ शुरुआती मामले से ज़्यादा मज़बूत सबूत हों।

पीठ ने कहा कि इस मामले में अंकित यादव को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने को सही ठहराने के लिए कोई ठोस सबूत या सामग्री मौजूद नहीं थी। इसलिए, पीठ को विशेष अदालत के आदेश में ऐसी कोई कमी नहीं मिली जिसके लिए अपील के स्तर पर दखल देने की ज़रूरत हो।

भाषा सं आनन्‍द आशीष

आशीष


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