भर्ती में स्क्रीनिंग चरण के अंक का अंतिम चयन पर काफी असर पड़ता है: अदालत
भर्ती में स्क्रीनिंग चरण के अंक का अंतिम चयन पर काफी असर पड़ता है: अदालत
लखनऊ, 29 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि बिना किसी छूट या रियायत के अनारक्षित श्रेणी के लिए तय न्यूनतम कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल करने वाले आरक्षित श्रेणी के मेधावी अभ्यर्थी को स्क्रीनिंग चरण पर ही अनारक्षित श्रेणी का अभ्यर्थी माना जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि स्क्रीनिंग परीक्षा में मिले अंकों का अंतिम चयन पर काफी असर पड़ता है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मंगलवार को भावना यादव और अन्य की ओर से दायर एक विशेष अपील को मंजूरी देते हुए यह आदेश दिया।
पीठ ने कहा कि भर्ती में स्क्रीनिंग परीक्षा सिर्फ अभ्यर्थियों को उनकी योग्यता के आधार पर छांटने की या फिर शुरुआती प्रक्रिया नहीं है और इस परीक्षा में मिले अंकों का अंतिम चयन पर काफी असर पड़ता है।
अदालत ने कहा कि भर्ती विज्ञापन के अनुसार, अंतिम मेरिट सूची तैयार करने के लिए स्क्रीनिंग परीक्षा में मिले अंकों का 75 प्रतिशत और साक्षात्कार के अंकों का 25 प्रतिशत हिस्सा लिया जाता है, लिहाजा स्क्रीनिंग परीक्षा अंतिम चयन प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।
दरअसल, यह मामला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के पद पर भर्ती से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने 22 दिसंबर 2025 के अपने विज्ञापन में यह प्रावधान किया था कि आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को सिर्फ अंतिम चयन के चरण में ही अनारक्षित श्रेणी में समायोजित किया जाएगा, बशर्ते उन्होंने स्क्रीनिंग परीक्षा के चरण में योग्यता मानक में कोई लाभ या रियायत न ली हो।
याचिकाकर्ताओं ने इस शर्त और आयोग के नौ जनवरी 2020 के कार्यालय ज्ञापन को चुनौती दी थी।
पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम 1994 की धारा 3(6) में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है कि मेरिट के आधार पर आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार का अनारक्षित श्रेणी में अभिगमन (माइग्रेशन) या समायोजन केवल अंतिम चयन के चरण में ही हो सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि नौ जनवरी 2020 का कार्यालय ज्ञापन इस भर्ती पर लागू नहीं होगा और इसके साथ ही पीठ ने विज्ञापन की संबंधित शर्त को रद्द कर दिया।
अदालत ने आयोग को निर्देश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर कार्यालय ज्ञापन की प्रासंगिकता की समीक्षा करे। पीठ ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया है कि वह इस मुद्दे पर अपनी नीति बनाकर उसे स्पष्ट करे।
भाषा
सं. सलीम पारुल
पारुल

Facebook


