दिव्यांगता प्रतिशत को नहीं बदल सकता एनएमसी बोर्ड : उच्च न्यायालय
दिव्यांगता प्रतिशत को नहीं बदल सकता एनएमसी बोर्ड : उच्च न्यायालय
लखनऊ, 23 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुधवार को कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) का चिकित्सा आकलन बोर्ड किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध दिव्यांगता प्रमाणपत्र में दर्ज दिव्यांगता के प्रतिशत को दोबारा निर्धारित या बदल नहीं सकता।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने शुभम मिश्रा, सौरभ राणा और गुलफाम अहमद की तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चिकित्सा आकलन बोर्ड और अपीली मेडिकल पीडब्ल्यूबीडी (मानक दिव्यांगता वाले व्यक्ति) आकलन बोर्ड के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें तीनों को पीडब्ल्यूबीडी आरक्षण के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि तीनों अभ्यर्थियों को नीट-यूजी 2026 की शेष काउंसलिंग में पीडब्ल्यूबीडी श्रेणी के पात्र अभ्यर्थियों के रूप में शामिल किया जाए और उनके पीडब्ल्यूबीडी अखिल भारतीय रैंक के आधार पर सीट आवंटन पर विचार किया जाए।
शुभम मिश्रा को सुलतानपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने 45 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी किया था। हालांकि, मेडिकल बोर्ड ने 11 अगस्त को उनकी दिव्यांगता घटाकर 20 प्रतिशत कर दी और उन्हें पीडब्ल्यूबीडी आरक्षण के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। मिश्रा ने नीट-यूजी 2026 में पीडब्ल्यूबीडी अखिल भारतीय रैंक 948 हासिल की थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, राणा की प्रमाणित दिव्यांगता 50 प्रतिशत और अहमद की 40 प्रतिशत थी। अदालत ने कहा कि तीनों मामलों में मेडिकल बोर्ड ने अभ्यर्थियों को एमबीबीएस पाठ्यक्रम करने और पूरा करने में कार्यात्मक रूप से सक्षम पाया था।
पीठ ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 56 और 57 के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध प्रमाणपत्र तब तक बाध्यकारी रहता है, जब तक उसे सक्षम न्यायिक या वैधानिक मंच द्वारा निरस्त नहीं किया जाता और मेडिकल बोर्ड प्रमाणपत्र में दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत को बदल नहीं सकता।
भाषा सं. सलीम शफीक
शफीक

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