कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे: हरीश के पिता
कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे: हरीश के पिता
लखनऊ, 11 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘इच्छा मृत्यु’ की इजाजत दिए जाने के बाद गाजियाबाद के रहने वाले 32 वर्षीय हरीश राणा के पिता ने कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे।
उच्चतम न्यायालय ने 12 साल से ज्यादा समय से कोमा में जीवन-रक्षक प्रणाली (वेंटिलेटर) के सहारे सांस ले रहे हरीश राणा को वेंटिलेटर से हटाकर ‘इच्छा मृत्यु’ की अनुमति दे दी।
हरीश राणा 20 अगस्त 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को निर्देश दिया कि वह प्रक्रिया में गरिमा सुनिश्चित करते हुए उपचार वापस लेने के लिए एक योजना तैयार करे।
दिल्ली स्थित एम्स के अधिकारियों ने बुधवार को बताया कि न्यायालय के आदेश को लागू करने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा।
एम्स की प्रवक्ता और एनाटॉमी विभाग में प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा ने कहा, “हम न्यायालय के आदेश का पालन करेंगे। एम्स भी एक समिति गठित करेगा, जो इस आदेश को लागू करने के तरीके पर निर्णय लेगी”
गाजियाबाद में अपने घर के बाहर पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत में हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने फैसले के भावनात्मक दर्द को स्वीकार करते हुए न्यायालय का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि उनका परिवार लगभग तीन साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहा था।
अशोक राणा ने याचिका सुनने और मानवीय आदेश देने के लिए उच्चतम न्यायालय को धन्यवाद दिया।
उन्होंने कहा कि इस फैसले से परिवार को कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होगा लेकिन इसे भारी मन से स्वीकार किया गया है।
अशोक ने मीडियाकर्मियों से कहा, “एक पिता के रूप में, यह बेहद दर्दनाक है। कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे।”
उन्होंने कहा कि परिवार को उम्मीद है कि इस फैसले से ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करने वाले अन्य लोगों को मदद मिलेगी।
हरीश के पिता ने कहा, “हमारा मानना है कि व्यापक जनहित में, इस फैसले से कई लोगों के परिवारों को मदद मिल सकती है, जो हरीश जैसी स्थिति में हो सकते हैं।”
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “वैसे हमने अब तक इस पर फैसला नहीं किया है, क्योंकि हम परिवार के सदस्यों के आने का इंतजार कर रहे हैं। साथ ही, यह (स्थानांतरण प्रक्रिया) आधिकारिक सहमति आने पर निर्भर करती है।”
परिवार ने कहा कि उन्होंने यह महसूस करने के बाद उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया कि उनके बेटे की स्थिति लाइलाज व अपरिवर्तनीय है और उन्होंने केवल जीवन-निर्वाह उपचार को वापस लेने के दिशानिर्देशों को लागू करने का अनुरोध किया।
परिवार ने फैसले को बेहद कठिन बताया और कहा कि यह हरीश के हित में लिया गया है और उम्मीद जताई कि इस फैसले से समान परिस्थितियों का सामना करने वाले अन्य परिवारों को मदद मिलेगी।
उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद गाजियाबाद की ‘ब्रह्म राज एम्पायर सोसायटी’ के बाहर भीड़ जमा हो गई, जिनमें मुख्य रूप से पत्रकार और टीवी कैमरामैन शामिल थे।
इसी सोसायटी में हरीश का परिवार रहता है।
इस आवासीय परिसर में सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षा कड़ी कर दी और बाहरी लोगों को परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया।
जिलाधिकारी रवींद्र कुमार मदंद और नगर निगम आयुक्त विक्रमादित्य मलिक अपराह्न सवा तीन बजे उनके आवास पर गए और कम से कम 15 मिनट तक वहां रहे।
उन्होंने मीडिया से कोई बात नहीं की।
स्थानीय निवासियों ने बेटे के इलाज के लिए परिवार के हर संभव प्रयास की पुष्टि की।
अधिकारियों ने बताया कि परिवार मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का रहने वाला है।
हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने 1989 से फरवरी 2021 में अपनी सेवानिवृत्ति तक नयी दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक निजी होटल के खानपान विभाग में काम किया और वर्तमान में वह अपनी पेंशन और घर पर तैयार खाद्य सामग्री को बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं।
जिला प्रशासन ने कहा कि जन सहयोग से परिवार को 2.5 लाख रुपये की तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान की गई है और आगे की सहायता मुख्यमंत्री विवेकाधीन राहत कोष से दी जाएगी।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि परिवार को स्थिर आजीविका सुनिश्चित करने के लिए एक दुकान आवंटन में मदद की जाएगी और उनके दीर्घकालिक भरण-पोषण के लिए अन्य सरकारी कल्याण योजनाओं से जोड़ा जाएगा।
कुछ स्थानीय लोगों ने संवाददाताओं को बताया कि अशोक राणा और उनकी पत्नी निर्मला राणा ने अपने बेटे के इलाज का खर्च उठाने के लिए दिल्ली में अपना घर बेच दिया था।
उन्होंने बताया कि पूर्व में एक आतिथ्य संस्था में काम करने वाले अशोक राणा को हर महीने लगभग 3,600 रुपये पेंशन मिलती है।
सोसायटी के एक अन्य निवासी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि अशोक राणा अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए सुबह के समय पास के क्रिकेट मैदानों में सैंडविच बेचते हैं।
परिवार ने न्यायालय में दायर याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का जिक्र करते हुए कहा था कि कानून उन मामलों में इलाज रोकने की इजाजत देता है, जिनमें मरीज ऐसी हालत में हो जिसे ठीक नहीं किया जा सकता हो और उपचार से सिर्फ उसकी तकलीफ ही बढ़ती हो।
उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बने दो मेडिकल बोर्ड ने पाया कि राणा की हालत ऐसी है, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता।
परिवार ने शीर्ष अदालत को बताया कि उन्होंने इच्छा मृत्यु की अर्जी इस भरोसे के साथ दायर की है कि ऐसी हालत में जीना हरीश राणा के भले के लिए नहीं है। भाषा मनीष सलीम जफर जितेंद्र
जितेंद्र

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