गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
लखनऊ, 20 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने कहा कि राज्य के कानून के तहत गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा विनियमन, 2016 का हवाला देते हुए यह आदेश दिया।
पीठ ने इसके साथ ही राज्य सरकार के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें श्रावस्ती जिले के एक मदरसे को मान्यता प्राप्त नहीं होने के कारण बंद करने का कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
अदालत ने 16 जनवरी को यह आदेश दिया था, जो मंगलवार को उपलब्ध हुआ।
खंडपीठ ने विनियमन, 2016 के प्रावधानों पर विचार किया, जिसमें बताया गया कि एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा राज्य से कोई अनुदान पाने का हकदार नहीं होगा।
खंडपीठ ने विनियमन 2016 के प्रावधान की व्याख्या करते हुए कहा कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद करना अवैध है और इसलिए जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा एक मई, 2025 को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को रद्द किया जाता है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने मदरसा ‘अहले सुन्नत इमाम अहमद रजा’ द्वारा दायर रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया।
खंडपीठ ने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता मदरसा तब तक किसी भी सरकारी अनुदान का दावा करने का हकदार नहीं होगा, जब तक उसे मान्यता नहीं मिल जाती।
अदालत ने कहा कि इसके अलावा मदरसा शिक्षा बोर्ड, याचिकाकर्ता मदरसे के विद्यार्थियों को मदरसा बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षा में बैठने की अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं होगा और छात्र राज्य सरकार से संबंधित किसी भी उद्देश्य के लिए मदरसे से प्राप्त अपनी योग्यता का लाभ उठाने के हकदार नहीं होंगे।
याचिका में दलील दी गई कि उच्चतम न्यायालय ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है, पहले वे जो राज्य से न तो सहायता और न ही मान्यता चाहते हैं, दूसरे वे जो सहायता चाहते हैं और तीसरे वे जो केवल मान्यता चाहते हैं लेकिन सहायता नहीं।
याचिकाकर्ता के वकील सैयद फारूक अहमद ने दलील दी,“पहली श्रेणी के संस्थान भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) द्वारा संरक्षित हैं।”
भाषा सं जफर जितेंद्र
जितेंद्र


Facebook


