युद्ध से जूझ रहे ईरान में, जलते हुए तेल डिपो और बमबारी वाली इमारतों से वायु प्रदूषण

युद्ध से जूझ रहे ईरान में, जलते हुए तेल डिपो और बमबारी वाली इमारतों से वायु प्रदूषण

युद्ध से जूझ रहे ईरान में, जलते हुए तेल डिपो और बमबारी वाली इमारतों से वायु प्रदूषण
Modified Date: March 17, 2026 / 06:27 pm IST
Published Date: March 17, 2026 6:27 pm IST

(आर्मिन सोरोशियान, यूनिवर्सिटी ऑफ़ एरिज़ोना )

फीनिक्स (अमेरिका), 17 मार्च (द कन्वरसेशन) तेहरान और बेरूत में अमेरिका और इज़राइल के बम हमले और जवाब में पड़ोसी देशों पर ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले, इमारतों से कहीं ज़्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं – वे उन शहरों में हवा में ज़हरीला मलबा भेज रहे हैं, जहां लाखों लोग रहते हैं।

सैन्य हमलों ने ईरान के मिसाइल जखीरे, परमाणु प्रतिष्ठानों और तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाया है। जब एक हमले में एक तेल डिपो में आग लग गई, तो तेहरान के ऊपर ज़हरीले काले बादल छा गए और तेजाबी बारिश हुई, जो इमारतों, कारों और लोगों पर जम गई। वहां के लोगों ने सिरदर्द और सांस लेने में दिक्कत होने की बात कही।

एक रसायन और पर्यावरण इंजीनियर के तौर पर, जो हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के व्यवहार और असर का अध्ययन करता है, मैं नुकसान संबंधी रिपोर्ट को देख रहा हूं ताकि यह समझ सकूं कि ज़हरीले तत्वों के हवा में जाने से वहां के लोगों को स्वास्थ्य से जुड़े किन खतरों का सामना करना पड़ रहा है। खतरे कई वजहों से आते हैं, हथियारों में मौजूद भारी धातुओं से लेकर उनके फटने से हवा में उड़ने वाली सामग्री तक।

युद्ध के दौरान दिखाई न देने वाला दुश्मन: पर्यावरण प्रदूषण

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किसी आपदा का हवा की गुणवत्ता और जन स्वास्थ्य पर असर काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि क्या नष्ट हो रहा है।

11 सितंबर, 2001 को न्यूयॉर्क शहर के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले स्थानीय थे, लेकिन उन्होंने हवा में बड़े पैमाने पर प्रदूषक फैलाए। इनमें खतरनाक ‘ऑर्गेनिक कंपाउंड’ और ‘पार्टिकल्स’ जैसी गैसें शामिल थीं – जिन्हें अक्सर एरोसोल कहा जाता है – जिनमें धूल, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, धातु, एस्बेस्टस और पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल जैसे कई तत्व होते हैं।

ये प्रदूषक फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है, और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं, जिससे दिल का दौरा और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

ढाई माइक्रोमीटर से छोटे सूक्ष्म कण, जिन्हें पीएम2.5 कहा जाता है, खास तौर पर नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि वे इंसान के श्वसन तंत्र में गहराई तक जा सकते हैं। लेकिन बड़े कण भी हवा में सेहत के लिए बड़े खतरे ला सकते हैं। जब इमारतों को बहुत ज़्यादा नुकसान होता है या वे गिर जाती हैं, तो मलबे में अक्सर कुचला हुआ कंक्रीट, जिप्सम और कैंसर पैदा करने वाले रेशेदार तत्व, जैसे एस्बेस्टस होते हैं। शुरुआती धूल जमने के बाद भी, हवा और दूसरी गड़बड़ियां, जिसमें ज़िंदा लोगों को ढूंढने या मलबा हटाने की कोशिशें शामिल हैं, उस सामग्री को वापस हवा में भेज सकती हैं, जिससे और लोग खतरे में पड़ सकते हैं।

साल 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरने पर मदद करने वाले कई बचाव और राहत कर्मियों को सांस संबंधी दिक्कतें हो गईं। सैन्य हमलों के बाद बमबारी वाली इमारतों में ज़िंदा लोगों को ढूंढने वाले और बाद में मलबा साफ करते समय भी यह एक खतरा है।

आग से और भी खतरे पैदा होते हैं, क्योंकि गाड़ियां, इमारतें और उनमें मौजूद रसायन और दूसरी सामग्री जल जाती हैं। लॉस एंजिल्स में जनवरी 2025 की आग ने खतरनाक सूक्ष्म कणों और गैसों का एक ढेर निचले वातावरण में भेज दिया।

मशीनरी और तेल प्रतिष्ठान

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सैन्य हमले दूसरे तरीकों से भी हवा की गुणवत्ता खराब करते हैं। गाजा पट्टी, इराक, कुवैत, यूक्रेन और हाल ही में ईरान और आस-पास के देशों को ज़हरीले सामान से बहुत नुकसान हुआ है। बम और तोपों में अक्सर विस्फोटक और भारी धातुएं होती हैं, जैसे सीसा और पारा, जो मिट्टी, पानी और पर्यावरण को भी खराब करते हैं।

जब तेल गोदामों की जगहें और पाइपलाइन खराब हो जाती हैं, तो वे बहुत नुकसानदायक प्रदूषकों का मिश्रण छोड़ती हैं। इस रासायनिक मिश्रण में हवा में मौजूद कालिख के कण होते हैं, जो आसमान को काला कर देते हैं।

वर्ष 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान, हवा की दिशा वाले देशों में भी ऐसी ही प्रदूषित बारिश हुई थी, क्योंकि कुवैत के तेल के मैदान जल रहे थे।

युद्धों के दौरान पर्यावरण प्रदूषण के गंभीर नतीजों ने अमेरिकी नेशनल एकेडमीज़ ऑफ़ साइंस, इंजीनियरिंग और मेडिसिन को 2000 के दशक की शुरुआत में खाड़ी युद्ध के वरिष्ठ सैनिकों के स्वास्थ्य पर कई रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने रसायन और भारी धातुओं के संपर्क में आने के बाद सैनिकों को हुई बीमारियों का दस्तावेजीकरण किया, जिसमें तेल के कुओं में आग लगने से होने वाली बीमारियां भी शामिल हैं। उन्होंने युद्ध में प्रदूषण और सैनिकों के बच्चों पर प्रजनन और विकास से जुड़े असर के बीच संभावित संबंधों पर वैज्ञानिक सबूतों की भी जांच की।

हवा से प्रदूषण हटाना

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बारिश और हवा सहित प्रकृति, हवा में प्रदूषण के स्तर को कम करने में मदद कर सकती है।

बारिश हवा से कणों को बाहर निकालने में मदद करती है, और उन्हें वापस ज़मीन और सतहों पर जमा कर देती है। बारिश की बूंदें कणों के चारों ओर बनती हैं और गिरते समय और कण भी इकट्ठा करती हैं। हालांकि, सैन्य हमलों के बाद से बारिश कभी-कभार ही हुई है।

तेहरान के सामने प्रदूषण की एक और चुनौती है, क्योंकि उसका इलाका बहुत छोटा है। शहर पहाड़ों से घिरा हुआ है और सर्दियों में कम ऊंचाई पर तापमान में बदलाव के असर का खतरा रहता है, जिससे प्रदूषक ज़मीन के और पास आकर और भी ज़्यादा जमा हो जाते हैं।

(द कन्वरसेशन) नरेश दिलीप

दिलीप


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