ओडीसियस की राह ताकता रहा आर्गोस: प्राचीन यूनान में इंसान और पशुओं के अटूट रिश्ते की कहानी

ओडीसियस की राह ताकता रहा आर्गोस: प्राचीन यूनान में इंसान और पशुओं के अटूट रिश्ते की कहानी

ओडीसियस की राह ताकता रहा आर्गोस: प्राचीन यूनान में इंसान और पशुओं के अटूट रिश्ते की कहानी
Modified Date: July 27, 2026 / 05:49 pm IST
Published Date: July 27, 2026 5:49 pm IST

(सुजाना फिलिपो और सैली वेट, न्यूकैसल यूनिवर्सिटी)

न्यूकैसल (ब्रिटेन), 27 जुलाई (द कन्वरसेशन) रहस्यमयी राक्षसों, अद्भुत जीवों और मानवीय संघर्ष की रोमांचक कथा से भरपूर होमर की महाकाव्य रचना ‘ओडिसी’ क्रिस्टोफर नोलन की नई हॉलीवुड फिल्म के लिए स्वाभाविक पसंद थी, लेकिन इस पूरे फंतासी संसार और साहसिक ड्रामे के बीच महाकाव्य के दो बेहद साधारण से दृश्य आज भी सबसे अधिक याद किए जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों का संबंध जानवरों से है।

पहला दृश्य नायक ‘ओडीसियस’ (फिल्म में मैट डेमन) और उसके वफादार कुत्ते ‘आर्गोस’ के मार्मिक पुनर्मिलन का है। यह छोटा-सा प्रसंग देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन धैर्य, निष्ठा और बिछड़ने के दर्द जैसे पूरे महाकाव्य के केंद्रीय भावों को बड़ी गहराई से सामने लाता है।

दूसरा दृश्य उस आदमखोर ‘साइक्लोप्स’ का है, जो अचानक अपने कोमल भावों का परिचय देता है। वह अपने प्रिय मेढ़े को ‘पेपोन’ कहकर पुकारता है। यह संबोधन यूनानी साहित्य में आमतौर पर घनिष्ठ मित्रों और परिजनों के लिए इस्तेमाल होता है। ‘साइक्लोप्स’ सोचता है कि कहीं उसका प्रिय मेढ़ा उसकी खोई आंखों को लेकर दुखी तो नहीं है, या फिर उसके साथ बदला लेने की इच्छा साझा कर रहा है।

ये दोनों प्रसंग दिखाते हैं कि होमर में वीरगाथाओं को भी मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने की अद्भुत क्षमता थी। उनकी दुनिया केवल देवताओं, राक्षसों और राजाओं तक सीमित नहीं है। उसमें सामान्य स्त्री-पुरुषों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भी बराबर जगह है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता बेहद स्वाभाविक रूप में सामने आता है।

प्राचीन यूनानी साहित्य में इंसानों और जानवरों का रिश्ता

प्राचीन यूनानी साहित्य और कला में मनुष्य तथा जानवरों के संबंधों का बहुत समृद्ध चित्रण मिलता है। हर तरह के जानवरों के प्रति आत्मीयता स्पष्ट दिखाई देती है।

ओडीसियस की पत्नी पेनेलोप के पास पालतू हंस थे। वह कहती है कि उन्हें देखकर उसका मन प्रसन्न हो जाता है। एक स्वप्न में जब एक गरुड़ उन हंसों को मार देता है, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ती है।

होमर की दूसरी महान कृति ‘इलियड’ में योद्धा हेक्टर अपने रथ के घोड़ों से कहता है कि वे उस मीठे स्वाद को याद करें, जो उनकी पत्नी उसे खिलाया करती थी।

इसी महाकाव्य में अकिलीस के प्रिय मित्र पैट्रोक्लस की मृत्यु के बाद उसके घोड़े भी काफी दुखी हो जाते हैं। होमर उनकी तुलना उस स्तंभ से करते हैं, जो किसी स्त्री या पुरुष की कब्र पर मौन खड़ा रहता है।

बाद के यूनानी साहित्य में कुत्तों की स्मृति में लिखे गए अनेक शिलालेख भी मिलते हैं। ईसा पूर्व छठी-पांचवीं शताब्दी के कवि सिमोनिदीस को एक प्रसिद्ध शिलालेख का रचयिता माना जाता है, जो एक मादा कुत्ते की कब्र पर लगाया गया था और उसमें लिखा है- ‘हे शिकारी लाइकास, तुम भले ही अब इस संसार में नहीं हो, लेकिन मुझे लगता है कि जंगल के पशु आज भी तुम्हारी इस समाधि में दफन सफेद हड्डियों से कांप उठते होंगे। तुम्हारी वीरता के चर्चे पेलियन, ओसा पर्वत और किथैरोन की चोटियों तक हैं।’’

प्राचीन यूनानी कला में भी दिखता है यह अपनापन

प्राचीन यूनानी चित्रकला और मूर्तिकला में भी मनुष्य और कुत्तों के संबंधों के कई उदाहरण मिलते हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बेजली अभिलेखागार में 700 से 200 ईसा पूर्व के मिट्टी के बर्तनों पर बनी कुत्तों की 1,400 से अधिक चित्राकृतियां दर्ज हैं। इससे भी पुराने उदाहरण आज उपलब्ध हैं।

ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित माइसीनी काल (1750–1050 ईसा पूर्व) के एक पात्र पर एक व्यक्ति दो छोटे कुत्तों को पट्टे से संभालने की कोशिश करता दिखाई देता है। माना जाता है कि इसी काल की पृष्ठभूमि में होमर के महाकाव्य रचे गए।

हालांकि युद्ध में कुत्तों के इस्तेमाल के प्रमाण बहुत कम हैं, लेकिन अनेक चित्रों में दिखाया गया है कि जब कोई योद्धा युद्ध के लिए घर से निकलता है तो उसके साथ एक कुत्ता भी रहता है। इससे संकेत मिलता है कि वह या तो उसके साथ जा रहा है या फिर पीछे छूट रहा है।

घरेलू जीवन के चित्रों में भी कुत्ते बार-बार दिखाई देते हैं। कई चित्रों में वे उन पुरुषों की बैठकों के दौरान उनकी शय्याओं के नीचे बैठे हैं, जहां लोग मदिरापान और मनोरंजन में व्यस्त हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध चित्र लगभग 600–590 ईसा पूर्व का कोरिंथ में मिला है।

शिकार करने वाले कुत्ते भले ही सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक रहे हों, लेकिन अनेक कलाकृतियां उनके प्रति गहरे स्नेह को भी दर्शाती हैं। स्पार्टा की एक उभरी हुई शिल्पाकृति में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घुटनों पर एक छोटा कुत्ता अपने पंजे रखे स्नेह जताता दिखाई देता है।

एथेंस की कब्रों पर बनी मूर्तियों में भी छोटे कुत्ते बार-बार दिखाई देते हैं। वे खासतौर पर बच्चों और किशोरों के साथ अंकित किए गए हैं।

ऐसी ही एक समाधि यूखालिया नाम की एक बालिका की है, जिसमें वह अपने माता-पिता, दादी और एक छोटे कुत्ते के साथ दिखाई देती है। कुत्ता पिछले पैरों पर खड़ा होकर उसके घुटनों पर अपने पंजे रखे हुए है। माना जाता है कि यह मेलेटियन नस्ल का पालतू कुत्ता था, जो अपने स्नेही और शांत स्वभाव के लिए जाना जाता था।

आर्गोस आखिर किसका प्रतीक है?

यह सही है कि प्राचीन यूनानी समाज में कुत्तों को हमेशा सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। महाकाव्यों में ‘कुत्ता’ शब्द स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अपमानजनक शब्दों के रूप में भी इस्तेमाल हुआ है।

फिर भी आर्गोस की अटूट निष्ठा केवल उसके स्वामी ओडीसियस के महत्व को ही नहीं दर्शाती, बल्कि उस समाज के मूल्यों को भी सामने लाती है, जो तमाम अव्यवस्था और पतन के बावजूद अब भी जीवित हैं।

ओडीसियस का इथाका लौटना जितना आवश्यक था, उतना ही जरूरी था कि उसे अपने वफादार सूअरपालक यूमेयस जैसे जमीन से जुड़े लोगों का साथ मिले। आर्गोस की अटूट निष्ठा भी शायद उसे वही भावनात्मक संबल देती है, जिसकी उसे सबसे अधिक जरूरत थी।

आर्गोस का प्रसंग ‘ओडिसी’ के चौदहवें सर्ग की शुरुआत से बिल्कुल अलग है। जब ओडीसियस वर्षों बाद पहली बार अपने घर पहुंचता है, तो यूमेयस के खेत के पहरेदार कुत्ते उसे पहचान नहीं पाते और उसपर भौंकते हुए हमला करने दौड़ पड़ते हैं।

‘‘अचानक कुत्तों की नजर ओडीसियस पर पड़ी। वे जोर-जोर से भौंकते हुए उसकी ओर लपके। खतरा भांपकर ओडीसियस वहीं बैठ गया और उसके हाथ से लाठी छूटकर गिर गई। विडंबना यह थी कि अपने ही घर में वह गंभीर संकट का शिकार हो सकता था।’’

यह दृश्य बताता है कि उसकी अनुपस्थिति कितनी लंबी रही और अब वह स्वयं अपने घर के लिए भी एक अजनबी बन चुका है।

बाद में जब उसका बेटा टेलीमेकस वहां पहुंचता है, तो वही कुत्ते उसका उसी आत्मीयता से स्वागत करते हैं, जैसी आत्मीयता बाद में आर्गोस अपने स्वामी के प्रति दिखाता है।

यह प्रसंग और भी अधिक मार्मिक हो जाता है, क्योंकि ओडीसियस छिपकर अपने बेटे और यूमेयस को एक-दूसरे से गले मिलते देखता है। वे उसे पहचान नहीं पाते, जबकि वह स्वयं उस पूरे दृश्य का मौन साक्षी बना रहता है। इससे उसके लंबे बिछोह का दर्द और गहरा हो उठता है।

होमर ने आर्गोस की कहानी को यथार्थ, विडंबना और गहरी करुणा के अद्भुत संतुलन के साथ प्रस्तुत किया है।

एक समय का फुर्तीला और शक्तिशाली शिकारी कुत्ता अब उपेक्षा का शिकार है। वह गोबर के ढेर पर पड़ा है और उसके शरीर में कीड़े लग चुके हैं। ऐसे ही दयनीय हाल में उसकी वर्षों बाद अपने स्वामी से मुलाकात होती है।

दोनों के बीच भावनात्मक जुड़ाव आज भी उतना ही मजबूत है, लेकिन वे एक-दूसरे को छू नहीं पाते। आर्गोस अपने कान खड़े करता है, पूंछ हिलाता है, लेकिन इतनी ताकत नहीं बची कि उठकर अपने स्वामी तक पहुंच सके।

होमर के महाकाव्य वीरता और महान उपलब्धियों का महिमामंडन अवश्य करते हैं, लेकिन वे उतनी ही गहरी संवेदना के साथ उन साधारण रिश्तों को भी अमर बना देते हैं जो इंसानों और अन्य जीवों के बीच जन्म लेते हैं। शायद अंत में जीत, यश और पराक्रम से अधिक वही रिश्ते हमारे साथ रह जाते हैं, जो प्रेम, निष्ठा और अपनत्व पर टिके होते हैं।

द कन्वरसेशन खारी सुरेश

सुरेश


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