ऑशविट्ज यातना शिविर पीड़िता ईवा श्लॉस का निधन

ऑशविट्ज यातना शिविर पीड़िता ईवा श्लॉस का निधन

ऑशविट्ज यातना शिविर पीड़िता ईवा श्लॉस का निधन
Modified Date: January 6, 2026 / 10:51 am IST
Published Date: January 6, 2026 10:51 am IST

लंदन, छह जनवरी (एपी) ऑशविट्ज यातना शिविर की पीड़िता ईवा श्लॉस का निधन हो गया है। 96 वर्षीय ईवा किशोरावस्था में डायरी लिखने वाली ऐनी फ्रैंक की सौतेली बहन थीं। यह जानकारी ‘ऐनी फ्रैंक ट्रस्ट यूके’ ने दी।

ट्रस्ट ने बताया कि उनका निधन शनिवार को लंदन में हुआ, जहां वह रहती थीं।

ईवा श्लॉस ने जीवनभर ‘होलोकॉस्ट’ की भयावहता के बारे में लोगों को शिक्षित करने का काम किया। वह ‘ऐनी फ्रैंक ट्रस्ट यूके’ की मानद अध्यक्ष भी थीं।

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‘होलोकॉस्ट’ द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान नाजी जर्मनी द्वारा किया गया सामूहिक नरसंहार है जिसमें लगभग 60 लाख यहूदियों, साथ ही रोमा (जिप्सी), दिव्यांगजनों, समलैंगिक, राजनीतिक विरोधी और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के लोगों को यातना शिविरों और गैस चैंबरों में मार डाला गया था।

ब्रिटेन के महाराजा चार्ल्स तृतीय ने कहा कि उनके लिए यह “सौभाग्य और गर्व” की बात है कि वह श्लॉस को जानते थे।

महाराजा चार्ल्स ने कहा, “युवावस्था में उन्होंने जिन भयावहताओं का सामना किया, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसके बावजूद उन्होंने अपना शेष जीवन नफरत और भेदभाव को खत्म करने में लगा दिया। वह दयालुता, हिम्मत, समझदारी और मजबूती का संदेश देती रहीं।”

वियना में 1929 में ईवा गाइरिंगर के रूप में जन्मी ईवा श्लॉस नाजी जर्मनी द्वारा ऑस्ट्रिया पर कब्जे के बाद अपने परिवार के साथ एम्सटर्डम चली गई थीं। वहां उनकी दोस्ती उन्हीं की उम्र की एक अन्य यहूदी लड़की ऐनी फ्रैंक से हुई, जिसकी डायरी बाद में होलोकॉस्ट का सबसे प्रसिद्ध दस्तावेज बनी।

फ्रैंक परिवार की तरह ही ईवा का परिवार भी नीदरलैंड पर नाजियों के कब्जे के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए करीब दो वर्षों तक छिपकर रहा। अंततः उन्हें धोखा दिया गया, गिरफ्तार किया गया और ऑशविट्ज़ मृत्यु शिविर भेज दिया गया।

श्लॉस और उनकी मां फ्रिट्ज़ी 1945 में सोवियत सैनिकों द्वारा शिविर से मुक्त किए जाने तक जीवित रहीं। हालांकि, उनके पिता एरिख और भाई हाइंज की ऑशविट्ज़ में मृत्यु हो गई।

युद्ध के बाद ईवा ब्रिटेन चली गईं, जहां उन्होंने जर्मन यहूदी शरणार्थी ज़्वी श्लॉस से विवाह किया और लंदन में बस गईं।1953 में उनकी मां ने ऐनी फ्रैंक के पिता ओटो फ्रैंक से विवाह किया, जो अपने निकट परिवार में युद्ध से जीवित बचे एकमात्र सदस्य थे। ऐनी फ्रैंक की युद्ध समाप्त होने से कुछ महीने पहले, 15 वर्ष की आयु में, बर्गेन-बेल्सन यातना शिविर में टाइफस से मृत्यु हो गई थी।

श्लॉस ने दशकों तक अपने अनुभवों पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं की। बाद में उन्होंने कहा कि युद्धकालीन आघात के कारण वह अंतर्मुखी हो गई थीं और दूसरों से जुड़ नहीं पाती थीं।

उन्होंने 2004 में एसोसिएटेड प्रेस से कहा था, “मैं वर्षों तक चुप रही। पहले इसलिए क्योंकि मुझे बोलने की अनुमति नहीं थी, फिर मैंने उसे दबा दिया। मैं दुनिया से नाराज़ थी।”

हालांकि, 1986 में लंदन में ऐनी फ्रैंक प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर संबोधन देने के बाद श्लॉस ने नाजी नरसंहार के बारे में युवा पीढ़ी को शिक्षित करना अपना लक्ष्य बना लिया। इसके बाद के दशकों में उन्होंने स्कूलों और जेलों में, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपने अनुभव साझा किए और ‘ईवाज़ स्टोरी: ए सर्वाइवर्स टेल बाय द स्टेपसिस्टर ऑफ ऐनी फ्रैंक’ सहित कई पुस्तकों में अपनी कहानी लिखी।

एपी खारी मनीषा

मनीषा


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