ब्रिटेन के एश्मोलियन संग्रहालय ने प्राचीन मूर्ति लौटाई, तमिलनाडु के मंदिर में होगी स्थापित

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ब्रिटेन के एश्मोलियन संग्रहालय ने प्राचीन मूर्ति लौटाई, तमिलनाडु के मंदिर में होगी स्थापित

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  • Publish Date - March 4, 2026 / 04:39 PM IST,
    Updated On - March 4, 2026 / 04:39 PM IST

(अदिति खन्ना)

लंदन, चार मार्च (भाषा) ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ऐश्मोलियन संग्रहालय ने 16वीं शताब्दी की एक कांस्य प्रतिमा को भारत को लौटाई है जिसे तमिलनाडु में उसके मूल मंदिर में स्थापित किया जाएगा।

संत थिरुमनकाई अलवर की पवित्र प्रतिमा को संग्रहालय ने 1967 में सोथबी की नीलामी में हासिल किया था। नवंबर 2019 में एक स्वतंत्र शोधकर्ता ने थाडिकोम्बु में श्री सौंदराजा पेरुमल के मंदिर से इसकी उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी थी।

इसके मद्देनजर संग्रहालय ने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग से इसकी उत्पत्ति की औपचारिक पुष्टि करने का अनुरोध किया, और यह प्रक्रिया मंगलवार शाम को इंडिया हाउस में एक औपचारिक हस्तांतरण समारोह के साथ संपन्न हुई।

ब्रिटेन के पहले सार्वजनिक संग्रहालय के निदेशक डॉ. ज़ा स्टर्गिस ने कहा, ‘‘यह ऐश्मोलियन संग्रहालय के लिए वास्तव में एक महत्वपूर्ण क्षण है।’’

इस संग्रहालय की स्थापना 17 वीं शताब्दी में हुई।

उन्होंने कहा, ‘‘पांच साल से भी अधिक समय पहले हमें पहली बार पता चला कि इस कांस्य प्रतिमा की तस्वीर तमिलनाडु के मंदिर में ली गई थी। उस समय यह स्पष्ट हो गया कि इसे भारत से किसी वैध तरीके से बाहर नहीं ले जाया जा सकता था।

उन्होंने कहा, ‘‘भले ही संग्रहालय ने इस कांस्य प्रतिमा को 1967 में सद्भावना के साथ अधिग्रहीत किया था, हमने इसे भारत को लौटाने की संभावना पर भारतीय उच्चायोग के साथ बातचीत शुरू की। ’’

माना जाता है कि मंदिर से चोरी कर इसकी जगह एक आधुनिक प्रतिकृति रख दी गई थी। यह कांस्य प्रतिमा अब भारत वापसी के लिए तैयार है। संग्रहालय के विशेषज्ञ भारत जाकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), तमिलनाडु राज्य सरकार के अधिकारियों और मंदिर प्रशासन के साथ मिलकर इसकी मूल उत्पत्ति की पुष्टि कर चुके हैं।

ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त विक्रम दुरैस्वामी ने कहा कि किसी वस्तु को उसके मूल स्थान पर लौटाने की प्रक्रिया में—इस मामले में तमिलनाडु के सौंदराजा पेरुमल मंदिर की देवप्रतिमा—हमें केवल उसकी असल उत्पत्ति साबित करनी थी, यह बताए बिना कि वह भारत से बाहर कैसे गई।

भाषा पवनेश

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