दीर अल-बलाह (ग़ाज़ा पट्टी), 18 सितंबर (एपी) इजराइल और हमास के बीच संघर्ष विराम के करीब एक साल बाद ग़ाज़ा में एक बहुमंजिला इमारत ढहने की घातक घटना ने वहां रह रहे फलस्तीनियों की मुश्किलों की ओर फिर से ध्यान खींचा है। संघर्ष विराम से क्षेत्र में पुनर्निर्माण शुरू होने की उम्मीद जगी थी।
बातचीत में गतिरोध के कारण पुनर्निर्माण की योजनाएं रुक गईं। इसके बाद से कई लोग युद्ध में क्षतिग्रस्त हुए लाखों घरों में से कुछ में वापस लौट गए हैं, जबकि इन घरों की कमजोर नींव और अस्थिर दीवारों के अचानक गिरने का खतरा बना हुआ है।
ग़ाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि बुधवार को ग़ाज़ा शहर में एक इमारत ढहने से 21 लोगों की मौत हो गई। हादसे में अपने परिजन को खोने वाले उम मोहम्मद अदास ने कहा कि गिरी हुई इमारत मजबूरी में आखिरी सहारे के रूप में इस्तेमाल की जा रही थी।
उन्होंने कहा, “अब वे लोग बिना घर और बिल्कुल खाली हाथ सड़क पर हैं। यहां तक कि उनके पहने हुए कपड़े भी उधार लिए हुए हैं।”
इसी तरह की इमारतों में रह रहे परिवारों ने कहा कि उनके पास किसी अन्य जगह रहने के लिए पैसे नहीं हैं।
अहमद अराफात ने मलबे से भरी सड़क पर अपने घर के पास कहा, “हमारे पास कहीं और जाने के लिए पैसे नहीं हैं। हम अन्य लोगों की तरह तंबू खरीदने का खर्च भी नहीं उठा सकते।”
ग़ाज़ा शहर में मलबे से भरी इमारतों, टूटे हुए फर्श और दरार वाली छतों के मकानों में लौटे अन्य लोगों ने कहा कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है।
क्षतिग्रस्त इमारत के बाहर रह रहे आलम जकूत ने कहा, “लोगों को इन जगहों पर रहने के लिए मजबूर करने वाली बात यह है कि इसके अलावा कोई और आश्रय नहीं है। न तंबू हैं और न ही बुनियादी जरूरतों की चीजें। बताइए, मैं कहां जाऊं? इस घर के अलावा मेरे पास कुछ नहीं है।”
इस सप्ताह हुई इमारत गिरने की घटना ग़ाज़ा में असुरक्षित आवासों के ढहने की पहली घटना नहीं है, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों की मौत ने उस क्षेत्र में मौजूद खतरों को रेखांकित किया है, जहां अधिकांश आबादी के पास पर्याप्त आवास उपलब्ध नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय ने बताया कि सितंबर के पहले सप्ताह में पांच आश्रय स्थलों में इमारतें गिरने की घटनाएं हुईं। इस श्रेणी में स्वतंत्र मकान या बड़ी इमारतों में बने आवासीय इकाइयां भी शामिल हो सकती हैं।
फलस्तीनी लोक निर्माण मंत्रालय ने बुधवार को एक बयान में कहा कि 2,000 से अधिक अतिरिक्त इमारतों के भी ढहने का खतरा बना हुआ है।
एपी मनीषा नरेश
नरेश