अवैध इजराइली बस्तियों के व्यापार पर ब्रिटेन के प्रतिबंध को लागू करने की चुनौतियां

अवैध इजराइली बस्तियों के व्यापार पर ब्रिटेन के प्रतिबंध को लागू करने की चुनौतियां

अवैध इजराइली बस्तियों के व्यापार पर ब्रिटेन के प्रतिबंध को लागू करने की चुनौतियां
Modified Date: September 11, 2026 / 04:59 pm IST
Published Date: September 11, 2026 4:59 pm IST

(साराह शिफलिंग – हैंकेन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, क्लेयर हनीबाल – रॉबर्ट गॉर्डन यूनिवर्सिटी एवं रोसाना कॉले, यूनिवर्सिटी ऑफ सरे)

सरे (ब्रिटेन), 11 सितंबर (द कन्वरसेशन) कब्जे वाले फलस्तीनी क्षेत्रों में अवैध इजराइली बस्तियों से आने वाली वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने के ब्रिटेन के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस प्रतिबंध को लागू कैसे किया जाएगा।

इस सवाल के जवाब के लिए यह देखना जरूरी है कि इसी तरह की परिस्थितियों में लगाए गए अन्य प्रतिबंधों को किस तरह लागू किया जाता है।

युद्ध को वित्तीय मदद देने वाले स्रोतों की आय के ‘‘खूनी हीरों’’ (ब्लड डायमंड्स) का उदाहरण अक्सर ऐसे व्यापार को रोकने के लिए दिया जाता है, जिससे नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, वेस्ट बैंक की बस्तियों पर लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़ा सामान और सेवाएं उतनी महंगी नहीं हैं।

इनमें खजूर और जैतून जैसे कृषि उत्पाद शामिल हैं। ब्रिटेन के विदेश मंत्री एड मिलिबैंड के अनुसार, ये उत्पाद बस्तीवासियों के आतंकवाद और जातीय सफाए को समर्थन देते हैं। ‘‘खूनी जैतून’’ शब्द भले ही प्रभावशाली नहीं लगता, लेकिन इन्हें लागू करने की चुनौतियां खूनी हीरों जैसी ही हैं।

घोषित प्रतिबंधों को लागू करना बेहद मुश्किल बताया गया है। विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय (एफसीडीओ) ने पहले भी चिंता जताई थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त इजराइल और कब्जे वाले फलस्तीनी क्षेत्रों के बीच अंतर साफ न होने से प्रतिबंधों को लागू करना कठिन हो सकता है। एफसीडीओ ने प्रतिबंधों के जरूरत से ज्यादा पालन और इसके अनपेक्षित परिणामों को लेकर भी चिंता जताई थी।

ये प्रतिबंध पहले से मौजूद कानूनों पर आधारित हैं। एफसीडीओ अवैध इजराइली बस्तियों में आर्थिक और वित्तीय गतिविधियां करने के खिलाफ सलाह देता है। 1967 के बाद इजराइल के कब्जे वाले क्षेत्रों में स्थित इजराइली बस्तियों में बने उत्पादों को ब्रिटेन में प्रवेश के समय वर्ष 2005 से विशेष शुल्क लाभ नहीं मिलता। इसके लिए उन स्थानों की सूची प्रकाशित की जाती है, जहां से आने वाले उत्पाद इसके पात्र नहीं हैं।

कई उत्पादों, खासकर कृषि क्षेत्र में, उनका मूल स्थान महत्वपूर्ण होता है। लेकिन उत्पाद कहां से आया है, यह पता लगाना कठिन है। पश्चिमी तट में सीमाएं भौगोलिक से ज्यादा राजनीतिक हैं।

अवैध बस्तियों और आसपास के इजराइली क्षेत्रों में लगे जैतून के पेड़ एक ही जलवायु, भूगर्भीय परिस्थितियों और यहां तक कि सिंचाई के पानी के स्रोत साझा कर सकते हैं। ऐसे में दोनों जगहों के जैतून को अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है।

पश्चिमी तट से आयात होने वाले सभी उत्पादों की सटीक उत्पत्ति तय करने का कोई आसान तरीका नहीं होने से मूल स्थान का दावा केवल कागजी प्रक्रिया बन जाता है। इसकी पुष्टि की जिम्मेदारी सीमा शुल्क अधिकारियों पर होती है, जिनके पास पहले से ही सीमित संसाधन होते हैं।

यूरोपीय संघ और ब्रिटेन में अवैध बस्तियों के उत्पादों को इजराइल के अन्य हिस्सों के उत्पादों जैसी व्यापारिक सुविधा नहीं मिलती। फिर भी इजराइल से जुड़े व्यापार रिकॉर्ड का विश्लेषण करने वाले ‘ग्लोबल इको लिटिगेशन सेंटर’ के अनुसार, यूरोपीय संघ को भेजे जाने वाले इजराइली माल का लगभग पांचवां हिस्सा बस्तियों से आता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ निर्यातक उत्पाद की वास्तविक उत्पत्ति छिपाने या गलत जानकारी देने के तरीके अपनाते हैं। कुछ लोग अवैध बस्ती के पोस्टकोड को इजराइल का पता बताकर दर्ज करते हैं, जबकि कुछ इजराइल के भीतर का गलत पता देते हैं।

उत्पादों को मिलाकर भी वास्तविक उत्पत्ति छिपाई जा सकती है। ऐसा अक्सर पैकिंग या आगे की प्रक्रिया के दौरान होता है।

कई अन्य व्यवस्थाएं भी हैं जिनका उद्देश्य कुछ उत्पादों को बाजारों तक पहुंचने से रोकना है। इसका प्रमुख उदाहरण किम्बरली प्रक्रिया है, जिसे 2003 में खूनी हीरों के व्यापार को रोकने के लिए लागू किया गया था।

हीरों की कीमत की तुलना में इसके प्रमाणन और जांच की लागत कम होती है तथा हीरे उत्पादन के स्थान भी सीमित होते हैं। इसके बावजूद किम्बरली प्रक्रिया की यह कह कर आलोचना हुई कि इससे कुछ मामलों में हीरों की उत्पत्ति छिपाने में मदद मिली।

कम कीमत वाले उत्पादों, जैसे पश्चिमी तट से आने वाले कृषि उत्पादों के लिए प्रमाणन की लागत अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

कृषि उत्पादों की उत्पत्ति की जांच का एक उदाहरण यूरोपीय संघ का वन कटाई नियम है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यूरोपीय उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद जंगलों की कटाई या नुकसान में योगदान न दें। इसके तहत पूरी आपूर्ति श्रृंखला में उत्पाद की सटीक उत्पत्ति बताना जरूरी है।

हालांकि, इसे लागू करने की अधिक लागत के कारण इसे दो बार टाला जा चुका है। दिसंबर 2026 से लागू होने वाले इसके सरल प्रारूप में अनुपालन लागत में करीब 75 प्रतिशत कमी का अनुमान है।

अवैध बस्तियों से आयात रोकने के लिए भी विस्तृत उत्पत्ति जांच की जरूरत होगी, जो महंगी प्रक्रिया है।

अमेरिका के उइगर जबरन श्रम रोकथाम कानून में एक अलग तरीका अपनाया गया है, जिसमें सबूत देने की जिम्मेदारी आयातकों पर डाली जाती है। आयातकों को स्पष्ट प्रमाण देना होता है कि संबंधित क्षेत्र से आने वाले उत्पाद जबरन श्रम से नहीं बने हैं।

इसी तरह की व्यवस्था पश्चिमी तट से आने वाले उत्पादों के लिए भी अपनाई जा सकती है जिसमें हर खेप की बाद में जांच करने के बजाय पहले से स्वीकृत आयातकों की सूची बनाई जाए।

रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी क्षेत्रों से आयात रोकने के लिए भी प्रतिबंध लागू हैं। लेकिन वहां स्थिति अलग है क्योंकि यूक्रेन उत्पादों की उत्पत्ति प्रमाणित करने में शामिल है।

पश्चिमी तट से आने वाला सभी सामान, चाहे वे फलस्तीनी निर्यात हों या बस्तियों से आए हों, इजराइली नियंत्रण वाले बंदरगाहों से बाहर जाते हैं। ग्लोबल इको की रिपोर्ट के अनुसार, उत्पत्ति प्रमाणन के मामले में इन व्यवस्थाओं पर भरोसे को लेकर सवाल उठे हैं।

इसलिए पश्चिमी तट से जुड़े उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला में शुरुआत से ही उत्पत्ति तय करना जरूरी होगा। उत्पादों की पहचान और अलग-अलग स्रोतों को बनाए रखने के लिए स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के उत्पाद आपस में न मिलें। अन्यथा अवैध बस्तियों से आयात पर प्रतिबंध का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

यदि सबूत देने की जिम्मेदारी सीमित आयातकों पर डाली जाए और उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला को स्पष्ट रखा जाए, तो घोषित प्रतिबंधों को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकता है।

घोषित प्रतिबंधों के कुछ अनपेक्षित परिणामों को लेकर भी चिंता जताई गई है। आपूर्ति श्रृंखला के स्तर पर इससे इजराइल के साथ होने वाला व्यापार प्रभावित हो सकता है, जिसमें दवाएं, सौंदर्य प्रसाधन और प्रौद्योगिकी उत्पाद शामिल हैं।

यदि नए नियम बहुत जटिल माने जाते हैं, तो कंपनियां पश्चिमी तट से किसी भी तरह का आयात करने से बच सकती हैं, जिससे फलस्तीनी निर्यातकों को नुकसान हो सकता है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि ब्रिटेन इजराइल के कब्जे वाले इलाकों के जैतून और इजराइली जैतून में अंतर कर सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि उत्पाद की उत्पत्ति साबित करने की जिम्मेदारी किस पर होगी।

कब्जे वाले फलस्तीनी क्षेत्रों से ब्रिटेन के मुख्य आयातों में फल, सब्जियां, तेल और वसा शामिल हैं। पश्चिमी तट के कई फलस्तीनी लोग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। यदि आपूर्ति श्रृंखला में उत्पत्ति साबित करने की व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं लोगों को उठाना पड़ सकता है।

द कन्वरसेशन मनीषा नरेश

नरेश


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