कक्षाओं में चैटजीपीटी: छात्रों के सीखने का आकलन अब कैसे करेंगे शिक्षक?

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कक्षाओं में चैटजीपीटी: छात्रों के सीखने का आकलन अब कैसे करेंगे शिक्षक?

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  • Publish Date - February 3, 2026 / 11:46 AM IST,
    Updated On - February 3, 2026 / 11:46 AM IST

( साराह इलैन एटन, बीट्रिज एंटोनिएटा मोया फिगुएरो एवं रॉबर्ट बेनन – यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी, राहुल कुमार – ब्रॉक यूनिवर्सिटी )

कैलगरी (कनाडा), तीन फरवरी (द कन्वरसेशन) दुनिया के हर क्षेत्र के साथ साथ उच्च शिक्षा में भी जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (जेनएआई) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और छात्र तथा शिक्षक पढ़ाई, सीखने और मूल्यांकन में चैटबॉट्स को शामिल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि शिक्षा की मूल प्रकृति को प्रभावित करने वाला है।

कनाडा के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के 28 शिक्षकों पर आधारित एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि शिक्षा एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि जब एल्गोरिदम मानव संज्ञान को सहारा दे सकते हैं या उसका अनुकरण कर सकते हैं, तब आकलन किस बात का होना चाहिए।

एआई और अकादमिक ईमानदारी पर पिछले 15 वर्षों के शोध की समीक्षा से पता चला कि एआई शिक्षा के लिए दोधारी तलवार है। एक ओर, उन्नत टेक्स्ट जनरेटर और अनुवादक मानव-जैसा लेखन कर सकते हैं, जिससे नकल को पकड़ना और उसका पता लगाना ही कठिन हो गया है। साथ ही, ये उपकरण कभी-कभी गलत जानकारी देते हैं या सामाजिक पूर्वाग्रह भी दोहरा सकते हैं। दूसरी ओर, एआई सीखने को अधिक समावेशी बना सकता है, विशेषकर दिव्यांग छात्रों या अतिरिक्त भाषा सीख रहे छात्रों के लिए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि चूंकि सभी एआई टूल्स को रोकना संभव नहीं है, इसलिए शिक्षण संस्थानों को केवल नकल पकड़ने पर ध्यान देने के बजाय नीतियों को अद्यतन करने और जिम्मेदार उपयोग का प्रशिक्षण देने की जरूरत है। अध्ययन में शामिल शिक्षकों ने खुद को अनुशासन लागू करने वाले नहीं, बल्कि ईमानदारी के साथ सीखने के मार्गदर्शक के रूप में देखा।

अध्ययन में तीन प्रमुख क्षेत्रों को चिन्हित किया गया जहां आकलन की सीमाएं तय की जा रही हैं—प्रॉम्प्टिंग, आलोचनात्मक चिंतन और लेखन। शिक्षकों ने प्रॉम्प्टिंग को एक वैध और आकलन योग्य कौशल माना, क्योंकि इसमें स्पष्ट सोच, अवधारणाओं की समझ और सटीक संवाद की आवश्यकता होती है। हालांकि, इसका उपयोग पारदर्शी ढंग से और अपनी बुनियादी समझ के आधार पर होना चाहिए।

आलोचनात्मक चिंतन के संदर्भ में, शिक्षकों ने कहा कि एआई द्वारा तैयार सामग्री की जांच कराना छात्रों की विश्लेषण क्षमता को परखने का प्रभावी तरीका हो सकता है। छात्रों से एआई-जनित तर्कों या सारांशों की कमजोरियां और त्रुटियां पहचानने को कहा जा सकता है।

लेखन को सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना गया। विचार-मंथन और व्याकरण सुधार में सीमित एआई सहायता को स्वीकार्य बताया गया, लेकिन चैटबॉट्स से पूरा लेख या तर्क लिखवाने को अस्वीकार्य माना गया। शिक्षकों के अनुसार, लेखन की रचनात्मक प्रक्रिया एक मानवीय गतिविधि है, जिसे मशीनों पर नहीं छोड़ा जा सकता।

अध्ययन में ‘पोस्ट-प्लेज़रिज़्म’ युग की अवधारणा पर भी चर्चा की गई, जिसमें मानव और एआई के सहयोग को स्वतः नकल नहीं माना जाता। शोधकर्ताओं का कहना है कि एआई शिक्षा को बाधित करने के बजाय आकलन और सीखने को मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करता है। शिक्षकों ने एआई को खतरे की जगह सुधार के साधन के रूप में अपनाने की वकालत की है।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा शोभना

शोभना