अपारदर्शी शिखर सम्मेलन के बाद चीन-अमेरिका की साथ काम करने की इच्छा क्या दुनिया के लिए अच्छी खबर नहीं

अपारदर्शी शिखर सम्मेलन के बाद चीन-अमेरिका की साथ काम करने की इच्छा क्या दुनिया के लिए अच्छी खबर नहीं

अपारदर्शी शिखर सम्मेलन के बाद चीन-अमेरिका की साथ काम करने की इच्छा क्या दुनिया के लिए अच्छी खबर नहीं
Modified Date: May 16, 2026 / 11:45 am IST
Published Date: May 16, 2026 11:45 am IST

(वेस्ली विडमायर, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी)

कैनबरा, 16 मई (द कन्वरसेशन) ‘ग्रुप ऑफ 2’ या ‘जी-2’ शब्द 2005 में अमेरिकी अर्थशास्त्री फ्रेड बर्गस्टेन ने गढ़ा था। उनका विचार था कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच मजबूत साझेदारी बनाई जाए।

कुछ वर्षों बाद वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग ने यह संकेत दिया था कि चीन को उदार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में शामिल करने की कोशिशें सफल हो रही हैं।

हालांकि, प्रस्तावित ‘जी-2’ का उद्देश्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बड़े और औपचारिक समूह ‘जी20’ की जगह लेना नहीं था, बल्कि उसे और मजबूत करना था।

वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने के लिए ‘जी-20’ की व्यापक रणनीति के तहत अमेरिका ने शुरुआती दौर में 787 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज लागू किया, जबकि चीन ने 586 अरब डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज दिया। इससे दुनिया को कहीं बड़े आर्थिक संकट से बचाने में मदद मिली।

इस सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई वार्ता ने एक अलग तरह के शिखर सम्मेलन “जी-2” का संकेत दिया है।

शुक्रवार को ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच कुछ “अहम व्यापारिक समझौते” हुए हैं। लेकिन शुल्क, दुलर्भ खनिजों या ईरान जैसे मुद्दों पर इन समझौतों का ब्योरा चाहने वालों को निराशा हाथ लगी।

बातचीत में जो कुछ भी हुआ हो, लेकिन अब अमेरिका-चीन सहयोग का मतलब यह नहीं रह गया है कि उससे दुनिया के बाकी देशों को भी सकारात्मक लाभ मिलेगा। इसके बजाय 2026 में ‘जी-2’ एक ऐसे निजी समझौते की तरह दिखाई देता है, जिसमें दो महाशक्तियां अपने हित साध रही हैं और इसकी ऐसी कीमत बाकी दुनिया चुका रही है जो अभी तक किसी के सामने नहीं आई है।

ट्रंप प्रशासन में अमेरिका के आर्थिक हितों को देखने के नजरिए में साफ बदलाव आया है। अब यह साझा उदार मूल्यों पर नहीं, बल्कि महाशक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों पर आधारित होता दिख रहा है। ऐसे में असली सवाल यह नहीं है कि अमेरिका और चीन सहयोग कर सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उनका यह सहयोग किस तरह की वैश्विक व्यवस्था तैयार करेगा।

पश्चिम और पूर्व :

यहां एक पुरानी आर्थिक तुलना प्रासंगिक हो जाती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोपीय देश वाले पश्चिमी गुट एक साझा कीन्सवादी वैश्विक व्यवस्था के तहत एकजुट हुआ था। ब्रेटन वुड्स प्रणाली पर आधारित इस व्यवस्था का उद्देश्य वस्तुओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना था, जबकि देशों की आर्थिक स्वायत्तता भी बरकरार रखी गई थी।

इसके विपरीत, सोवियत संघ के नेतृत्व वाला पूर्वी गुट ‘काउंसिल फॉर म्यूचुअल इकोनॉमिक असिस्टेंस’ (कोमेकॉन) के माध्यम से व्यापार करता था। इसमें कई वस्तुओं का लेनदेन नकद के बजाय योजनाबद्ध विनिमय व्यवस्था के तहत होता था।

विडंबना यह है कि आज ट्रंप-शी एजेंडा काफी हद तक पुराने पूर्वी गुट की इसी शैली जैसा दिखाई देता है।

इस संदर्भ में यह बात महत्वपूर्ण है कि ‘जी-2’ अब ‘जी-20’ या व्यापक नियम-आधारित व्यवस्था से अलग रास्ते पर चलता दिख रहा है। इसका संकेत केवल वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच बातचीत नहीं, बल्कि शुल्क में राहत, विमान सौदे, दुर्लभ खनिजों तक पहुंच, चिप प्रतिबंध, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दे हैं जिन्हें दोनों देश आपस में जोड़कर देख रहे हैं।

इन सभी मामलों में दोनों देशों का अपनी नीतियों में तालमेल बैठाना स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन सामूहिक रूप से देखें तो यह एक ऐसी नयी वैश्विक व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जहां दो महाशक्तियां अपने हितों के मुताबिक फैसले लेने लगी हैं।

चिप और दुर्लभ खनिज :

दुर्लभ खनिज और उन्नत चिप इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। बीजिंग ऐसी अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक तक पहुंच चाहता है, जो कृत्रिम मेधा की दौड़ में उसे बढ़त दिला सके।

वहीं वाशिंगटन दुर्लभ खनिजों और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की आपूर्ति चाहता है, जिनकी अहमियत ईरान के साथ तनाव के कारण और बढ़ गई है। इस तनाव ने अमेरिका के मिसाइल, ड्रोन, वायु रक्षा प्रणालियों और अन्य उन्नत सैन्य तकनीकों के भंडार पर व्यापक असर डाला है।

यदि इन दोनों जरूरतों का आपस में सौदा किया जा रहा है, तो यह शिखर वार्ता आर्थिक उदारीकरण की नहीं, बल्कि इस बात की है कि रणनीतिक प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बनी रहेंगी या द्विपक्षीय सौदेबाजी का हिस्सा बन जाएंगी।

उद्योगपतियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल :

ट्रंप की इस यात्रा में उनके साथ गए कारोबारी प्रतिनिधिमंडल ने भी इसी दिशा की ओर संकेत किया।

जेनसन हुआंग, टिम कुक और एलन मस्क जैसे उद्योगपतियों की मौजूदगी ने इस शिखर वार्ता को किसी बड़े कारोबारी समझौते जैसा रूप दे दिया। इनके अलावा क्वालकॉम, सिटीग्रुप और बोइंग जैसी कंपनियों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।

विमान खरीद, कृषि उत्पादों की खरीद, निवेश मंचों और कॉरपोरेट पहुंच से जुड़े संभावित समझौतों को आर्थिक सामान्यीकरण के संकेत के रूप में पेश किया जा सकता है।

लेकिन असली सवाल केवल यह नहीं है कि अमेरिकी कंपनियों को बाजार तक पहुंच मिल रही है या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या ये कारोबारी लाभ एक ऐसे महाशक्ति समझौते को स्थिर बना रहे हैं, जिसकी भू-राजनीतिक कीमत बाकी दुनिया चुका रही है।

दोनों देशों के बीच शुल्क को लेकर जो भी समझौता होगा, उसका सबसे बड़ा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है। लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण उसका राजनीतिक संदेश हो सकता है, जिससे ट्रंप खुद को एक सफल कारोबारी नेता के रूप में पेश कर सकें।

अल्पकाल में इससे बाजारों को राहत मिल सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह नियम-आधारित बहुपक्षीय उदारीकरण से पीछे हटने का संकेत भी हो सकता है।

ताइवान पर चेतावनी, ईरान पर लगभग चुप्पी :

इस सप्ताह की शिखर वार्ता में ताइवान का मुद्दा प्रमुख रूप से उभरा। बृहस्पतिवार को शी चिनफिंग ने ट्रंप को असामान्य रूप से सीधी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस मुद्दे को सही ढंग से नहीं संभाला गया, तो दोनों देशों के बीच “टकराव और यहां तक कि संघर्ष” की स्थिति पैदा हो सकती है।

व्यापक संदर्भ में खतरा केवल यह नहीं है कि अमेरिका ताइवान को लेकर कोई औपचारिक रियायत दे दे। असली चिंता यह है कि ताइवान और अन्य क्षेत्रीय देशों को किसी निजी महाशक्ति समझौते की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

यदि ताइवान किसी बड़े समझौते का एक हिस्सा बन जाता है, तो अमेरिका-चीन सहयोग की वास्तविक कीमत उन देशों को चुकानी पड़ेगी, जो बातचीत की मेज पर मौजूद ही नहीं हैं।

ईरान और तेल का मुद्दा भी इसी तर्क को और व्यापक बनाता है। यदि ट्रंप ने शी से तेहरान पर चीन के प्रभाव का इस्तेमाल करने को कहा है, तो वह केवल कूटनीतिक मदद नहीं मांग रहे बल्कि चीन को एक सह-प्रभुत्वशाली शक्ति के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।

इस तरह का ‘जी-2’ वैश्विक जन हितों को कमजोर कर सकता है। साथ ही यह भी तय करेगा कि ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय देशों जैसी मध्यम शक्तियां निर्णय लेने वाली मेज पर अपनी जगह बनाए रख पाएंगी या नहीं। जैसा कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा था, ‘‘कहीं ऐसा न हो कि वे “मेन्यू का हिस्सा” बनकर रह जाएं।’’

द कन्वरसेशन खारी गोला

गोला


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