गहन अध्ययन से आलोचनात्मक सोच मजबूत, गलत सूचना से बचाव संभव: अध्ययन
गहन अध्ययन से आलोचनात्मक सोच मजबूत, गलत सूचना से बचाव संभव: अध्ययन
( टी जे टॉरेस – वाशिंगटन एंड ली यूनिवर्सिटी एवं जेफ सारेस – फॉय क्विनिपिएक यूनिवर्सिटी )
हैमडन (अमेरिका), 20 जनवरी (द कन्वरसेशन) डिजिटल युग में सूचना की भरमार और सोशल मीडिया की बढ़ती पकड़ के बीच गहन अध्ययन(डीप रीडिंग) आलोचनात्मक सोच को मजबूत करने और गलत सूचना से बचाव का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर अत्यधिक निर्भरता लोगों को निष्क्रिय ढंग से सूचना ग्रहण करने का आदी बना रही है, जिससे भ्रामक और असत्य सूचनाओं के फैलने की आशंका बढ़ गई है।
एक अमेरिकी, दिन में औसतन 140 से अधिक बार अपना मोबाइल फोन देखता है और लगभग 4.5 घंटे फोन का उपयोग करता है। करीब 57 प्रतिशत लोग खुद को मोबाइल फोन का ‘आदी’ मानते हैं। प्रौद्योगिकी कंपनियां, प्रभावक और कंटेंट निर्माता लोगों का ध्यान खींचने की होड़ में लगे हैं। इस प्रतिस्पर्धा ने सनसनीखेज और भ्रामक सामग्री को बढ़ावा दिया है, क्योंकि ऐसी सामग्री तेजी से ध्यान आकर्षित करती है।
इस चुनौतीपूर्ण सूचना परिदृश्य में आलोचनात्मक अध्ययन कौशल पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। हालांकि, साक्षरता को लेकर चिंताजनक रुझान सामने आ रहे हैं। अध्ययन की समझ से जुड़े आकलन लगातार गिर रहे हैं। जेन जेड के कई माता-पिता छोटे बच्चों को कुछ पढ़कर सुनाने को बोझ मानते हैं, जबकि बड़ी संख्या में कॉलेज छात्र पूरी किताब पढ़ने में कठिनाई महसूस करते हैं।
‘जेन जेड’ उस पीढ़ी को कहा जाता है जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है। यह वह युवा वर्ग है जो तकनीक, इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ बड़ा हुआ है। इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहा जाता है क्योंकि इनका जीवन स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया से जुड़ा माना गया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे अंतहीन स्क्रॉलिंग और आसानी से चीजें साझा करने के जरिए निष्क्रिय जुड़ाव को बढ़ावा दें। लोग अक्सर ऊब दूर करने, तनाव से बचने या समय बिताने के लिए इनका उपयोग करते हैं।
संज्ञानात्मक विज्ञान के शोध बताते हैं कि बार-बार स्क्रॉल करने से मस्तिष्क निष्क्रिय ढंग से सोचने का आदी हो जाता है। एल्गोरिद्म उपयोगकर्ताओं को वही सामग्री बार-बार दिखाते हैं, जिससे उनकी पहले से बनी धारणाएं और मजबूत होती हैं। अलग-अलग स्रोतों से एक ही बात दोहराए जाने पर वह अधिक विश्वसनीय लगने लगती है, जिसे ‘भ्रामक सत्य’ प्रभाव कहा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गहन अध्ययन इसके विपरीत एक सचेत और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें पाठ से गहराई से जुड़ना, निष्कर्ष निकालना, विभिन्न दृष्टिकोणों को समझना और सूचना का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना शामिल है। यह प्रक्रिया प्रयास मांगती है और कभी-कभी भ्रम या असहजता भी पैदा कर सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ महत्वपूर्ण हैं।
अध्ययन में कहा गया है कि बिना सोचे-समझे स्क्रॉलिंग से ऊब, अकेलापन और अस्तित्वगत चिंता बढ़ सकती है। इसके विपरीत, ध्यान और मानसिक प्रयास व्यक्ति में उद्देश्य की भावना को मजबूत करते हैं और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाते हैं। कक्षा में उपन्यास जैसी लंबी रचनाओं को पढ़ने और उन पर चर्चा करने से अध्ययन की समझ बेहतर होती है और पढ़ने में रुचि विकसित होती है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि डिजिटल युग में भी गहन अध्ययन को अपनाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर ‘बुकटॉक’ जैसे समुदाय इसका उदाहरण हैं, जहां लोग किताबों पर विस्तार से चर्चा करते हैं। सूचना पढ़ते समय थोड़ी देर रुककर उसका मूल्यांकन करना, पढ़ने की गति को आवश्यकतानुसार धीमा करना और पाठ के अर्थ पर विचार करना गलत सूचना के प्रभाव को कम कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, गहन अध्ययन की शुरुआत कविताओं, लघु कथाओं या निबंधों से की जा सकती है और फिर धीरे-धीरे लंबी किताबों की ओर बढ़ा जा सकता है। मित्रों या परिवार के साथ मिलकर पढ़ना और चर्चा करना नए विचारों और दृष्टिकोणों को समझने में सहायक हो सकता है।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा शोभना
शोभना


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