दक्षिण अफ्रीका के पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास को शामिल करने की मांग

दक्षिण अफ्रीका के पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास को शामिल करने की मांग

दक्षिण अफ्रीका के पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास को शामिल करने की मांग
Modified Date: May 1, 2026 / 12:30 pm IST
Published Date: May 1, 2026 12:30 pm IST

( फाकिर हसन )

जोहानिसबर्ग, एक मई (भाषा) ‘साउथ अफ्रीकन हिंदू धर्म सभा’ (एसएएचडीएस) ने दक्षिण अफ्रीका में संशोधित किए जा रहे स्कूल पाठ्यक्रम में भारतीयों के इतिहास को पर्याप्त स्थान देने की मांग करते हुए अधिकारियों से इसे नजरअंदाज नहीं करने का आग्रह किया है।

एक खुले पत्र में एसएएचडीएस के अध्यक्ष राम महाराज ने कहा कि अल्पसंख्यक होने के बावजूद भारतीय समुदाय के इतिहास को पाठ्यक्रम में समुचित रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “1981 में डरबन में आयोजित पहले राष्ट्रीय हिंदू सम्मेलन में एसएएचडीएस ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर स्कूल पाठ्यक्रम में भारतीयों के इतिहास को पर्याप्त रूप से शामिल करने की मांग की थी।”

महाराज ने कहा, “दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के इतिहास को इतिहास की पुस्तकों से मिटाया नहीं जा सकता और न ही मिटाया जाना चाहिए। हम मांग करते हैं कि सभी कक्षाओं में भारतीयों के इतिहास से संबंधित मौजूदा सामग्री को कम से कम दोगुना किया जाए, क्योंकि अल्पसंख्यक भी महत्वपूर्ण हैं।”

उन्होंने वर्तमान प्रस्तुतीकरण स्तर को “अपमानजनक” और “भारतीयों के योगदान को नजरअंदाज करने” वाला बताया।

महाराज ने कहा कि 1860 में बंधुआ मजदूरों के रूप में आगमन के बाद से भारतीयों ने दक्षिण अफ्रीका के आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा, “पाठ्यपुस्तकों में इस विरासत को कमतर दिखाना सच्चाई को कमतर करने जैसा है।”

उन्होंने कहा कि भारतीय समुदाय के संघर्षों को अधिक स्थान देने से नस्लीय सौहार्द, सामाजिक एकता और राष्ट्र निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही इससे यह धारणा भी दूर होगी कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को ऐतिहासिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त थे।

महाराज ने कहा, “हमारे बंधुआ पूर्वजों ने कठिन परिस्थितियों में काम किया और दास जैसी स्थितियों में जीवन बिताया। उन्होंने पीड़ा, उत्पीड़न और भेदभाव का सामना किया, लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा को प्राथमिकता देकर उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अवसर में बदला।”

एसएएचडीएस ने सुझाव दिया कि पाठ्यपुस्तकों में बंधुआ भारतीयों के कष्टों और बलिदानों के साथ-साथ उस रंगभेद विरोधी आंदोलन में उनकी भूमिका को भी शामिल किया जाए, जिसके परिणामस्वरूप नेल्सन मंडेला देश के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति बने।

महाराज ने कहा कि इस संघर्ष की शुरुआत ‘नताल इंडियन कांग्रेस’ ने की थी, जिसकी स्थापना महात्मा गांधी ने 1894 में की थी, जो अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की स्थापना से लगभग दो दशक पहले की बात है।

एसएएचडीएस ने औपनिवेशिक काल में हिंदुओं के खिलाफ हुए भेदभाव, मंदिरों के ध्वंस और जबरन पुनर्वास जैसे मुद्दों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता जताई।

महाराज ने कहा कि भारतीय इतिहास का निष्पक्ष और सटीक चित्रण दक्षिण अफ्रीका में विविधता में एकता को मजबूत करेगा और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देगा।

भाषा मनीषा अविनाश

अविनाश


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