(डोनाल्ड हेफलिन, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी)
मैसाचुसेट्स (अमेरिका), एक मार्च (द कन्वरसेशन) ईरान में गूंजे धमाकों ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ सैन्य दबाव है या ईरान में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत। इन हमलों के पैमाने से आपको क्या संकेत मिलता है?
मुझे लगता है कि इन बड़े हमलों और क्षेत्र में कई हफ्तों से तैनात जहाजों तथा कुछ सैनिकों के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रहा है। मेरा अनुमान है कि अगले कुछ दिनों तक और हमले हो सकते हैं। शुरुआत में वे उस पारंपरिक रणनीति को अपनाएंगे जिसमें सेना के कमांड और नियंत्रण प्रणाली यानी सैन्य नियंत्रण के मुख्य केंद्रों को निशाना बनाया जाता है।
मीडिया में आ रही खबरों से हमें पहले ही पता लग गया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के आवास पर हमला किया गया है।
यहां अमेरिका की रणनीतिक अंतिम योजना क्या है?
सत्ता परिवर्तन करना आसान नहीं होगा। आज ट्रंप ने ईरानी जनता से सरकार को गिराने की अपील की है लेकिन यह बहुत कठिन काम है। बिना हथियारों के लोग उस शासन को मुश्किल गिरा पाएंगे जो बहुत कड़े नियंत्रण में है और जिसके पास भारी हथियार हैं।
दूसरी बात यह है कि इस क्षेत्र में अमेरिका का इतिहास इस मामले में अच्छा नहीं रहा है। आपको याद होगा कि 1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिका ने इराकी जनता को विद्रोह के लिए प्रेरित किया था, लेकिन बाद में उसने बगदाद पर हमला न करने का फैसला लिया और वहीं रुक गया। यह बात इराक और आसपास के देशों में भूली नहीं गई है। इसलिए मुझे आश्चर्य होगा अगर ईरान में कोई जनविद्रोह वास्तव में शासन को गिराने की स्थिति में आ जाए।
क्या सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिका जमीनी स्तर पर सैनिक भेज सकता है?
मैं साफ तौर पर कहूंगा कि ऐसा होने का अंदेशा कम है। संभव है कि कुछ छोटे विशेष बल गुप्त रूप से भेजे जाएं, लेकिन बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक भेजे जाएं, ऐसा मुझे नहीं लगता।
इसके दो कारण हैं : पहला, कोई भी राष्ट्रपति इसे बेहद जोखिम भरा मानेगा। ईरान एक बड़ा देश है और उसकी सेना भी बड़ी है। इसमें भारी जनहानि का खतरा है और यह भी संभव है कि लक्ष्य हासिल न हो सके।
दूसरा, खुद ट्रंप बड़े पैमाने पर सैन्य हस्तक्षेप के समर्थक नहीं हैं। उन्होंने ईरान और वेनेजुएला के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की है, लेकिन वे आमतौर पर लड़ाकू विमान या छोटे विशेष बल भेजने तक ही सीमित रहते हैं, 10-20 हजार सैनिक नहीं।
इसका कारण यह है कि अपने पूरे राजनीतिक करियर में ट्रंप सीमित स्तर की अराजकता के साथ काम करना पसंद करते हैं। उन्हें थोड़ी अव्यवस्था पैदा कर उसके बाद उससे लाभ निकालना आता है। लेकिन युद्ध बहुत ज्यादा अराजकता पैदा करता है और उसके परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। अपने पहले कार्यकाल और दूसरे कार्यकाल के शुरुआती वर्ष में उन्होंने कहीं भी जमीनी सैनिक भेजने की इच्छा नहीं दिखाई है।
राष्ट्रपति ट्रंप के सामने क्या जोखिम हैं?
एक जोखिम अभी सामने है और वह यह है कि ईरान कोई बड़ा निशाना साध ले और बड़ी संख्या में लोगों को मार दे, जैसे यरुशलम या तेल अवीव या किसी अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हमला।
दूसरा जोखिम यह है कि हमले आंशिक रूप से सफल हों यानी शीर्ष नेताओं को हटा दिया जाए, लेकिन उनकी जगह कौन आएगा? उदाहरण के लिए वेनेजुएला में लोगों को लगा था कि विपक्ष का नेता सत्ता में आएगा, लेकिन अंत में पुराने शासन की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज मजबूत होकर सामने आईं।
ईरान में भी ऐसा ही हो सकता है। शासन की जड़े इतनी गहरी हैं कि कुछ नेताओं की मौत के बाद भी वह टिक सकता है। असली सवाल यह होगा कि शीर्ष पदों पर कट्टरपंथी आते हैं या व्यावहारिक नेता । लेकिन ईरान में इतनी ताकत सिर्फ सेना और खासकर अर्द्धसैनिक बल रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास है कि वही सत्ता संभाल सके।
क्या यह अमेरिका के लिए बेहतर होगा?
यह इस पर निर्भर करेगा कि उनका रवैया कैसा होगा। जैसे वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति का रवैया रहा कि ‘‘यह एक वास्तविकता है, हमें अमेरिका से बातचीत करके आगे का रास्ता निकालना होगा।’’
लेकिन ईरान के ये नेता काफी कट्टर क्रांतिकारी हैं। ईरान पिछले 47 वर्षों से क्रांतिकारी नेतृत्व के अधीन है और ये लोग अपने विचारों के पक्के समर्थक हैं। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि अमेरिका उनके साथ काम कर पाएगा या नहीं।
अंत में आपकी कोई टिप्पणी?
मुझे इस पूरे घटनाक्रम का समय दिलचस्प लगता है। अगर हम पिछले साल की स्थिति देखें, तो ट्रंप को एक अवसर तब मिला जब इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कतर पर हमला किया था।
पश्चिम एशिया के कई रूढ़िवादी शासन, जिन्हें इजराइल से बहुत बड़ी समस्या नहीं थी, उन्होंने भी कहा कि ‘‘यह संघर्ष बहुत आगे चला गया है।’’ ट्रंप ने इसी को आधार बनाकर सबको बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश की।
मुझे लगता है कि यहां भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कई देश ईरान में सत्ता परिवर्तन देखना चाहते हैं। लेकिन सीधे यह कहना कि ‘‘हमें आपका राजनीतिक नेतृत्व पसंद नहीं, इसलिए हम उसे हटाने जा रहे हैं’’, यह संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में अक्सर लोग राष्ट्रवाद के तहत एकजुट हो जाते हैं। जब बम गिरने लगते हैं तो लोग सरकार के समर्थन में खड़े होने लगते हैं।
हालांकि, पिछले कुछ महीनों में ईरान में मानवाधिकारों का बड़ा दमन हुआ है। संभव है कि हालिया प्रदर्शनों में 10,000 से 15,000 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई हो।
यही वह तर्क है जिसे ट्रंप इस्तेमाल कर सकते हैं। वे ईरानी जनता से कह सकते हैं, ‘‘वे आपको सड़कों पर मार रहे हैं, इसलिए हम हस्तक्षेप कर रहे हैं।’’
लेकिन समस्या यह है कि अगर इसके बाद कहा जाए कि ‘‘हम बमबारी से शासन को कमजोर करेंगे और अब आप सड़कों पर निकलकर सरकार गिरा दें’’,तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा। मेरी राय में ईरान की सरकार इतनी मजबूत है कि उसे निहत्थे लोगों द्वारा गिराया जाना बहुत मुश्किल है।
द कन्वरसेशन गोला खारी
खारी