जापान में आये भूकंप के बाद आपातकालीन कर्मियों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा

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जापान में आये भूकंप के बाद आपातकालीन कर्मियों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा

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  • Publish Date - August 12, 2026 / 06:29 PM IST,
    Updated On - August 12, 2026 / 06:29 PM IST

(ग्लेन मैकग्रेगर, डरहम यूनिवर्सिटी)

डरहम, 12 अगस्त (द कन्वरसेशन) जापान के क्यूशू में हाल में आए भूकंप के बाद लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे आपातकालीन कर्मियों को भीषण गर्मी का सामना भी करना पड़ा।

जुलाई के अंत में आए भूकंप में कम से कम 38 लोगों की मौत हो गई थी और हजारों लोग बेघर हो गये थे। भूकंप के बाद दिन का तापमान बढ़कर 30 डिग्री सेल्सियस के ऊपरी स्तर तक पहुंच गया और कुछ स्थानों पर पहली बार 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। साथ ही हवा में नमी भी काफी अधिक थी।

अत्यधिक गर्मी आपातकालीन प्रतिक्रिया के लगभग हर पहलू को प्रभावित करती है। जापान के चार मुख्य द्वीपों में सबसे दक्षिणी द्वीप पर स्थित कुमामोतो क्षेत्र में 130 निकासी केंद्रों और अस्थायी आवासों में रह रहे लगभग 7,000 लोगों के लिए गर्म और उमस भरे मौसम से निर्जलीकरण (शरीर में पानी की कमी) और ‘हीटस्ट्रोक’ का खतरा बढ़ जाता है।

बुजुर्ग, शिशु और पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोग विशेष रूप से इसके प्रति संवेदनशील होते हैं।

गर्मी के कारण लोगों के लिए सोना भी मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब एयर कंडीशनिंग (एसी) उपलब्ध न हो या बिजली की आपूर्ति बाधित हो गई हो। पर्याप्त नींद नहीं लेने से तनाव बढ़ सकता है और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। आपातकालीन सेवाओं में लगे कर्मी भी इसी तरह प्रभावित होते हैं।

बचाव कार्य, मलबा हटाना और बुनियादी ढांचे की मरम्मत शारीरिक रूप से काफी मेहनत वाले काम हैं। अधिक तापमान से शारीरिक कार्यक्षमता कम हो जाती है, थकान बढ़ जाती है और बार-बार आराम करने की जरूरत पड़ती है, जिससे राहत और बचाव कार्यों की गति धीमी हो सकती है।

इन प्रभावों का असर स्वास्थ्य के अलावा अन्य चीजों पर भी पड़ता है। क्षतिग्रस्त जल ढांचे के कारण पीने के पानी की मांग बढ़ जाती है, ठीक उस समय जब पानी की आपूर्ति सीमित हो सकती है। इसी दौरान, जारी बिजली कटौती के बीच ठंडक के लिए बिजली की मांग बढ़ जाती है।

कुछ इलाकों में पानी की आपूर्ति बाधित हो गई है और बिजली कटौती के कारण ठंडक देने वाले उपकरणों का इस्तेमाल सीमित हो गया है, जिससे निकासी केंद्रों में बहुत अधिक गर्मी हो गई है। ये परिस्थितियां एक दूसरी आपात स्थिति पैदा करती हैं, जिस पर भूकंप की तुलना में बहुत कम ध्यान दिया जाता है, लेकिन इसका जनस्वास्थ्य और रबचाव एवं पुनर्वास कार्यों पर गहरा असर पड़ सकता है।

वर्ष 2026 की परिस्थितियां उन परिस्थितियों से बहुत अलग हैं, जब कुमामोतो में पिछली बार अप्रैल 2016 में बड़े भूकंप आए थे।

वर्ष 2016 के कुमामोतो भूकंप ने व्यापक तबाही मचाई थी। हालांकि, उस समय अप्रैल का तापमान अपेक्षाकृत सामान्य था।

कुमामोतो का भूकंप दिखाता है कि अत्यधिक गर्मी आपदा के जोखिम को कई गुना बढ़ाने वाला एक बड़ा कारक बन सकती है।

कुमामोतो में आये भूकंप से पता चलता है कि आपदा से निपटने की क्षमता अब केवल मजबूत बुनियादी ढांचा बनाने या भूकंप-रोधी डिजाइन में सुधार करने तक सीमित नहीं है।

जलवायु परिवर्तन के कारण जब अत्यधिक गर्मी की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है, तब आपातकालीन स्थितियों की तैयारी करने वालों को इसे भी अपनी योजना में शामिल करना होगा।

जैसे-जैसे दुनिया में लू की घटनाएं बढ़ रही हैं, अत्यधिक तापमान साल के सबसे गर्म समय में आपदा के बाद राहत एवं बचाव कार्यों के लिए नयी चुनौतियां पैदा करेगा।

(द कन्वरसेशन) देवेंद्र संतोष

संतोष