ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को चरमपंथी समूह बना सकते हैं निशाना
ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को चरमपंथी समूह बना सकते हैं निशाना
(नियोफाइटोस जॉर्जियू, फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय)
एडिलेड, 28 सितंबर (द कन्वरसेशन) हाल में सामने आई मीडिया खबरों में कहा गया है कि ऑस्ट्रेलिया में ‘नियो-नाजी’ संगठन ऑटिज्म से प्रभावित युवाओं को सक्रिय रूप से अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
मेरे अध्ययन समेत कुछ शोध से संकेत मिलता है कि ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोग ऑनलाइन मौजूद साजिश रचने की धारणाओं और चरमपंथी विचारधारा जैसी हानिकारक सामग्री की ओर दूसरों की तुलना में अधिक आकर्षित हो सकते हैं।
लेकिन इस क्षेत्र में शोध करना आसान नहीं है और अब भी ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जिनके बारे में हमें जानकारी नहीं है।
चरमपंथ पर काम करने वाले शोधकर्ताओं और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि केवल ऑटिज्म के आधार पर यह नहीं समझा जा सकता कि कोई व्यक्ति चरमपंथी विचारधारा की ओर क्यों आकर्षित होता है या ऑनलाइन चरमपंथी सामग्री क्यों देखता है। न ही केवल ऑटिज्म को इस बात का कारण माना जा सकता है कि कोई व्यक्ति चरमपंथी हिंसा में शामिल हो सकता है। इसके बजाय, हमें उन परिस्थितियों पर ध्यान देने की जरूरत है, जो ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोगों को ऐसे भर्ती के प्रयासों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। इनमें खास तौर पर उन्हें मिलने वाला सहयोग और उस गहरे सामाजिक बहिष्कार की स्थिति शामिल है, जिसका सामना बहुत-से ऑटिज्म से प्रभावित लोग करते हैं।
तो इसके पीछे और कौन-से कारक काम करते हैं? और ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोगों को चरमपंथी समूहों के बहकावे में आने के लिए अधिक संवेदनशील बना सकती हैं?
इसका अध्ययन करना इतना कठिन क्यों है
ऑनलाइन मौजूद चरमपंथी सामग्री से जुड़ने के जोखिम के एक संभावित कारक के रूप में ऑटिज्म का अध्ययन तेजी से उभरता शोध क्षेत्र है। लेकिन इस विषय पर शोध करना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हमारे पास अभी ठोस प्रमाण बहुत कम हैं।
हाल में सहकर्मियों के साथ की गई एक समीक्षा में हमने पाया कि ऑटिज्म और ऑनलाइन जोखिम के बीच संबंध को लेकर उपलब्ध शोध को समझना इतना आसान नहीं है। इस विषय पर बहुत कम ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं, जिनकी वास्तविक आंकड़ों और शोध के आधार पर जांच की गई हो।
इसके अलावा, नैतिक और कानूनी चुनौतियां भी हैं। चूंकि चरमपंथ से जुड़ाव अक्सर गुप्त और/या गैरकानूनी होता है, इसलिए ऐसे लोगों की पहचान करना मुश्किल होता है और उनका अध्ययन करना लगभग असंभव हो जाता है।
इसलिए फिलहाल आपराधिक मामलों के विस्तृत अध्ययन यानी किसी खास आपराधिक मामले से जुड़ी घटनाओं और परिस्थितियों की विस्तृत पड़ताल, ऑटिज्म और चरमपंथ के बीच संबंध को समझने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।
हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों को शामिल करके किए गए अध्ययनों के विपरीत, ऐसे अध्ययन यह नहीं बता सकते कि चरमपंथ की ओर ले जाने वाले रास्ते कितने आम हैं। न ही इनके निष्कर्षों को ऑटिज्म से प्रभावित सभी लोगों पर व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है।
चरमपंथी विचारधारा कुछ लोगों को क्यों आकर्षित कर सकती है
ऑटिज्म से जुड़े विशेष प्रभाव जब कम उम्र, सामाजिक अलगाव और सीमित सहयोग जैसी परिस्थितियों के साथ मिल जाते हैं तो कुछ लोगों को दूसरों के बहकावे में आने के लिए अधिक संवेदनशील बना सकते हैं।
वर्ष 2024 में मेरे नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में कुछ प्रमाण मिले कि ऑटिज्म से जुड़े कुछ ‘लक्षण’ लोगों को गलत सूचनाओं और साजिश की धारणाओं पर विश्वास करने के लिए अधिक संवेदनशील बना सकते हैं।
किसी विषय पर गहरी और केंद्रित रुचि
मिसाल के तौर पर, ऑटिज्म से प्रभावित लोगों में किसी खास विषय में बेहद गहरी रुचि होना आम बात है। इसे ‘केंद्रित रुचि’ कहा जा सकता है। इसमें किसी खास विषय के बारे में जानने या किसी कौशल में महारत हासिल करने के लिए काफी समय लगाना शामिल हो सकता है।
किसी विषय में इस तरह गहरी रुचि होना केवल ऑटिज्म से जुड़ी बात नहीं है और ऐसी रुचियां ऑटिज्म से प्रभावित लोगों के लिए बेहद सकारात्मक भी हो सकती हैं। इनके जरिए सामाजिक संबंध बन सकते हैं और पढ़ाई, काम तथा रचनात्मक गतिविधियों के सार्थक अवसर पैदा हो सकते हैं।
लेकिन शोध से पता चलता है कि समस्याएं तब पैदा हो सकती हैं, जब ऐसी गहरी रुचि किसी विवादास्पद या साजिश की धारणाओं, चरमपंथी विचारधाराओं या हिंसा जैसे संभावित रूप से नुकसान पहुंचाने वाले विषय पर केंद्रित हो जाए।
अपनी सोच पर अडिग रहना
शोध से पता चला है कि जो लोग अपनी सोच पर अधिक अडिग रहते हैं, वे किसी बात के विरोध में दिए गए तर्कों या किसी मुद्दे की दूसरी संभावित व्याख्याओं पर विचार करने के लिए कम इच्छुक हो सकते हैं।
अगर चरमपंथी विचार किसी व्यक्ति के लिए गहरी रुचि का विषय बन जाएं, तो ऑटिज्म से प्रभावित व्यक्ति के लिए उन विचारों पर सवाल उठाना या उनसे दूर होना अधिक मुश्किल हो सकता है।
चरमपंथी समूहों में लोगों को जोड़ने वाले लोग इस परिस्थिति का फायदा उठा सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक एक ही तरह के संदेश सुनने या देखने को मिलें, तो इससे उसका नजरिया सीमित हो सकता है और किसी मुद्दे की एक तय धारणा उसके मन में और मजबूत हो सकती है।
व्यवस्था और निश्चित दिनचर्या की पसंद
ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोग दिनचर्या और निरंतरता के साथ सहज महसूस करते हैं और ऐसी दुनिया से खास तौर पर परेशान हो सकते हैं, जो अव्यवस्थित और अप्रत्याशित हो।
इसके विपरीत, चरमपंथी विचारधाराएं आमतौर पर पूर्वानुमेय और एकरूप होती हैं। वे जटिल सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के सरल और दो-टूक समाधान पेश करती हैं।
चरमपंथी समूह अक्सर खुद को संगठित, व्यवस्थित और अनुशासित बताते हैं तथा यह स्पष्ट नियम बताते हैं कि किस तरह सोचना चाहिए। यह सख्त ढांचा और स्पष्ट समाधान सामान्य तंत्रिका-विकास वाले लोगों को भी आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन व्यवस्था और पूर्वानुमेयता पसंद करने वाले ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोगों को ये चीजें खास तौर पर सुकून देने वाली लग सकती हैं।
लेकिन समस्या खुद ऑटिज्म नहीं
ऑटिज्म से प्रभावित अधिकांश लोग चरमपंथ की ओर आकर्षित नहीं होते। और अगर हम केवल ऑटिज्म से जुड़े विशेष प्रभावों पर ध्यान दें तथा इस बात को नजरअंदाज कर दें कि चरमपंथी समूह सामाजिक बहिष्कार, बेबसी और पूरी न हो पाने वाली जरूरतों का किस तरह फायदा उठाते हैं, तो हम असली मुद्दे को समझने से चूक सकते हैं।
प्रमाण बताते हैं कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और युवाओं को दूसरों की तुलना में कहीं अधिक सामाजिक बहिष्कार और परेशानी का सामना करना पड़ता है। हम जानते हैं कि इसका उन पर गहरा असर पड़ता है और उन्हें अलगाव का भी सामना करना पड़ता है।
ऑटिज्म को लेकर बनी रूढ़िवादी धारणाएं और गलतफहमियां सामाजिक अलगाव का कारण बन सकती हैं। इससे कुछ ऑटिज्म से प्रभावित लोगों में यह पीड़ादायक भावना पैदा हो सकती है कि उन्हें कोई नहीं चाहता, वे शक्तिहीन हैं और किसी तरह इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं।
चरमपंथी विचारधाराएं इसका बिल्कुल अलग नजरिया पेश कर सकती हैं कि वे अपनी शक्ति वापस हासिल कर सकते हैं और समान विचार रखने वाले लोगों के समुदाय का हिस्सा बन सकते हैं।
कुछ प्रमाण हैं कि जोखिम का सामना कर रहे ऑटिज्म से प्रभावित युवाओं को विशेष सहायता देने से उनके जीवन में सुधार हो सकता है, उन्हें मजबूत संबंध बनाने में मदद मिल सकती है और वे कट्टरपंथी विचारों से दूर हो सकते हैं। लेकिन इस दिशा में अभी बहुत अधिक काम किए जाने की जरूरत है।
अगर आपको अपने बच्चे को लेकर चिंता है, तो उससे बातचीत का रास्ता खुला रखने की कोशिश करें और उसका मजाक उड़ाने या उससे टकराव करने से बचें।
द कन्वरसेशन खारी वैभव
वैभव

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