एआई किस दिशा में बढ़ रहा है? 1960 के दशक के दो मीडिया विशेषज्ञ राह दिखा सकते हैं

एआई किस दिशा में बढ़ रहा है? 1960 के दशक के दो मीडिया विशेषज्ञ राह दिखा सकते हैं

एआई किस दिशा में बढ़ रहा है? 1960 के दशक के दो मीडिया विशेषज्ञ राह दिखा सकते हैं
Modified Date: September 1, 2026 / 04:48 pm IST
Published Date: September 1, 2026 4:48 pm IST

(निक केली, क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी)

ब्रिसबेन, एक सितंबर (द कन्वरसेशन) यदि हम देखें तो 1960 का दशक प्रौद्योगिकी, संस्कृति और राजनीति में बड़े बदलावों का दौर था। टेलीविजन मीडिया के पूरे परिदृश्य को तेजी से बदल रहा था और उस समय किसी को आसानी से समझ नहीं आ रहा था कि इस बदलाव को किस तरह से देखा जाए।

आज दुनिया एक और नयी उच्च प्रौद्योगिकी सृजनात्मक कृत्रिम मेधा (एआई) के प्रभाव का दौर देख रही है। ऐसे में उस दौर के दो विचारकों के मत यह समझने में नयी प्रासंगिकता प्राप्त कर रहे हैं कि हमारे सामने क्या हो रहा है और हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं।

निवेशक एआई कंपनियों और डेटा सेंटर में अरबों डॉलर लगा रहे हैं। उनका मानना है कि एआई दुनिया को बदल देगा, लेकिन हमें एआई के बारे में किस तरह सोचना चाहिए? क्या यह एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम है, जिसे हमें इसलिए अपनाना चाहिए कि कहीं हम बदलाव का विरोध करने वाले ‘लुडाइट्स’ न बन जाएं? या यह एक ऐसी मेधा है, जिसके साथ हमें मिलकर काम करना चाहिए?

‘लुडाइट्स’ ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है जो नई प्रौद्योगिकी को अपनाने का विरोध करते हैं, खासकर इस आशंका से कि प्रौद्योगिकी उनकी नौकरियां या पारंपरिक काम छीन लेगी। यह शब्द 19वीं सदी के इंग्लैंड के ‘लुडाइट’ आंदोलन से आया है जब कपड़ा उद्योग के कुछ कामगारों ने मशीनों का विरोध किया था, क्योंकि उन्हें डर था कि मशीनों के कारण उनकी रोजगार की जरूरत कम हो जाएगी।

एक दूसरा नजरिया यह है कि चैटजीपीटी और क्लॉड जैसी प्रणालियों को नए माध्यम के रूप में देखा जाए, जो हमारे संचार के माहौल को बदल रही हैं। यहीं 1960 के दशक के हमारे दो विचारक मददगार साबित हो सकते हैं। कनाडाई दार्शनिक मार्शल मैक्लुहान और फ्रांसीसी विचारक गाइ डेबोर्ड ने यह समझने के लिए महत्वपूर्ण विचार दिए कि माध्यम किस तरह काम करते हैं और समाज पर उनका क्या असर पड़ता है।

एआई एक माध्यम के रूप में

छापाखाने के शुरुआती दौर में उसका इस्तेमाल बाइबल की प्रतियां तैयार करने के लिए किया जाता था। टेलीविजन ने भी शुरुआत में अपनी अधिकांश सामग्री के लिए रंगमंच और रेडियो पर निर्भरता दिखाई। इंटरनेट का शुरुआती इस्तेमाल मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक “मेल” भेजने और “फाइलें” साझा करने के लिए होता था।

‘मैक्लुहान’ ने इसमें एक रुझान देखा। नए माध्यमों का इस्तेमाल शुरुआत में पुराने माध्यमों की सामग्री को नए रूप में पेश करने के लिए किया जाता है। लेकिन धीरे-धीरे ऐसे नए किस्म की विषय सामग्री सामने आने लगती हैं, जो उस नए माध्यम के लिए ही बनी होती हैं। मसलन, टेलीविजन ने रियलिटी टीवी, 24 घंटे चलने वाले समाचार प्रसारण और ऐसे दूसरे प्रारूपों को जन्म दिया, जो इस माध्यम के लिए खास तौर पर उपयुक्त थे।

सृजनात्मक कृत्रिम मेधा के साथ भी हम अभी शुरुआती दौर में हैं। लोग नए माध्यम में पुरानी तरह की सामग्री तैयार करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं-निबंध लिखने, पॉप गीत बनाने, वेब पेज तैयार करने आदि के लिए।

हालांकि, एआई की मदद से संचार के वास्तव में नए रूप भी अब उभरने लगे हैं। गूगल का प्रोजेक्ट ‘जिनी’ मांग के मुताबिक वास्तविक समय में ऐसे संसार तैयार करता है, जिनमें उपयोगकर्ता घूम-फिर सकते हैं और उन्हें खोज सकते हैं। अकादमिक जगत में भी ऐसी किताबों को लेकर प्रयोग हो रहे हैं, जिन्हें आपस में जुड़े मॉड्यूल के रूप में तैयार किया जाता है और जिनमें पाठकों के लिए निर्देश भी दिए जाते हैं।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मैक्लुहान का प्रसिद्ध कथन था—“माध्यम ही संदेश है।” आप चाहे ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ करने वाले लोगों को देख रहे हों या प्रकृति पर आधारित वृत्तचित्र, आखिरकार आपकी नजर एक स्क्रीन पर ही टिकी होती है। अगर लंबे समय तक मनुष्यों के बजाय एआई प्रणालियों के साथ आपका संवाद होता रहे, तो इससे दुनिया को अनुभव करने का आपका तरीका बदल जाएगा।

मीडिया के तमाशे में बदलता जीवन

हमारे समाज में किस तरह की प्रौद्योगिकियां विकसित होती हैं? इस पर डेबोर्ड का तर्क था कि कि पूंजीवादी समाज ऐसी मीडिया प्रौद्योगिकी को लगातार बढ़ावा देते हैं, जो हमारे जीवन को ऐसी गतिविधियों की शृंखला में बदल देती हैं, जिनमें हम वस्तु के रूप में पेश की गई छवियों और प्रस्तुतियों से जुड़ते हैं।

डीबोर्ड ने 1967 में प्रकाशित अपनी कृति ‘द सोसाइटी ऑफ द स्पेक्टेकल’ में कहा था कि जिन चीजों का लोग कभी सीधे अनुभव करते थे, उनमें से बहुत-सी चीजें आगे चलकर प्रौद्योगिकी के माध्यम से अनुभव की जाने लगेंगी। उस समय टेलीविजन नया और सबसे प्रभावशाली माध्यम था।

मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के दौर में यह सिलसिला और आगे बढ़ गया। लोग सोशल मीडिया के जरिए दोस्तों के संपर्क में रहने लगे, ऑनलाइन जीवनसाथी तलाशने लगे, कुछ क्लिक के जरिए राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने लगे और कहीं भी, कभी भी ‘‘विषय सामग्री” के जरिए अपना मनोरंजन करने लगे।

जो काम और अनुभव पहले सहज रूप से जीवन का हिस्सा हुआ करते थे, वे अब किसी न किसी माध्यम से होने लगे हैं। इससे उनके व्यावसायीकरण की गुंजाइश भी पैदा हुई है। एआई ने जीवन के उन और भी अधिक हिस्सों का दायरा बढ़ा दिया है, जिन्हें प्रौद्योगिकी के माध्यम से संचालित और फिर एक वस्तु की तरह बेचा जा सकता है।

यह किसी साजिश का नतीजा नहीं है। लेकिन कंपनियों के पास ऐसी नई प्रौद्योगिकी को विकसित करने और इस्तेमाल करने का जबरदस्त आर्थिक प्रोत्साहन जरूर है, जो इंसानी मन और व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।

आखिर जो कुछ भी हमारा ध्यान खींच सकता है और हमारे व्यवहार को बदल सकता है, उसकी बाजार में बड़ी कीमत है। अगला फेसबुक या टिकटॉक बनाने वाला व्यक्ति इसी वजह से बेहिसाब कमाई कर सकता है।

डेबोर्ड के विचारों के आधार पर एआई के भविष्य को समझने का एक तरीका यह है कि हम देखें कि इंसानी जीवन में अर्थव्यवस्था के दायरे से बाहर अब क्या-क्या बचा है? फिर सवाल करें: “किस तरह का एआई-आधारित माध्यम इन चीजों की जगह ले सकता है?” मनोरंजन, व्यायाम, नींद, दोस्ती, प्रेम, भोजन—क्या ऐसा कुछ भी है, जिसे प्रौद्योगिकी अपने दायरे में नहीं ला सकती?

एआई हमारे जीवन में प्रौद्योगिकी के दखल को और बढ़ाएगा। जैसा कि डेबोर्ड ने 1967 में लिखा था: “जब वास्तविक दुनिया महज छवियों में बदल जाती है, तो ये महज छवियां वास्तविक अस्तित्व बन जाती हैं-ऐसी गतिशील कल्पनाएं, जो सम्मोहित व्यवहार को सीधे प्रेरित करती हैं।”

मीडिया प्रौद्योगिकी हमें एक-दूसरे से और दूर कर सकती हैं। वे हमारा जीवन के वास्तविक, इंद्रियगत अनुभवों से हटाकर विषय सामग्री और वस्तुओं के उपभोग की ओर मोड़ सकती हैं। यह सब सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिए भले ही फायदेमंद हो, लेकिन मनुष्य जीवन की गुणवत्ता और पर्यावरण के लिहाज से इसके परिणाम गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

प्रचलित धारणाओं से आगे देखने की जरूरत

मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी है। हमारा जीवन माध्यमों के जरिए होने वाले संवाद पर टिका है-चाहे वह बोलकर दोस्तों और परिवार से बातचीत करना हो, छपी किताबों के जरिए उन लेखकों से संवाद करना हो जो अब हमारे बीच नहीं हैं, या किसी बड़े लेंग्वेज मॉडल के जरिए एआई महिला मित्र से बातचीत करना।

एआई को केवल एक उपकरण या एक प्रभावी प्रणाली के रूप में देखने के बजाय एक माध्यम के रूप में देखना हमें कहीं अधिक महत्वपूर्ण सवाल पूछने की ओर ले जाता है। सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि “एआई क्या कर सकता है?”, बल्कि यह भी होना चाहिए कि “एआई हमारे संचार के माहौल और हमारे जीवन जीने के तरीके को किस तरह बदल रहा है?”

एआई इस बदलते मीडिया माहौल को सकारात्मक दिशा भी दे सकता है। इसकी मदद से ईमेल के जवाब देने, प्रशासनिक फॉर्म भरने, मामूली और दोहराव वाले काम करने या स्कूलों में दिखावे के लिए किए जाने वाले मूल्यांकन जैसे कामों में लगने वाला समय कम किया जा सकता है। इसका मतलब हो सकता है-कंप्यूटर स्क्रीन के सामने कम समय और दोस्तों के साथ पार्क में अधिक समय।

लेकिन डेबोर्ड के विचारों से संकेत मिलता है कि अगर हमने अपनी दिशा में बुनियादी बदलाव नहीं किया, तो जरूरी नहीं कि एआई हमें इसी तरह का भविष्य दे। एआई में आज हो रहा भारी पूंजी निवेश दरअसल ऐसे भविष्य पर लगाया गया दांव भी माना जा सकता है, जिसमें नया मीडिया वातावरण इंसानों का और अधिक ध्यान खींचेगा और हमारे जीवन के बढ़ते हिस्सों को नए, अधिक दखल देने वाले तरीकों से अपने दायरे में ले आएगा।

लेकिन भविष्य का यही होना तय नहीं है। जैसा कि मैक्लुहान ने करीब 60 साल पहले लिखा था: “जब तक जो हो रहा है, उस पर विचार करने की इच्छा है, तब तक कुछ भी अपरिहार्य नहीं है।”

द कन्वरसेशन खारी माधव

माधव


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