यूएनएससी बैठक में जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान की ‘अनावश्यक’ टिप्पणी की भारत ने निंदा की

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यूएनएससी बैठक में जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान की ‘अनावश्यक’ टिप्पणी की भारत ने निंदा की

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  • Publish Date - June 24, 2026 / 11:53 AM IST,
    Updated On - June 24, 2026 / 11:53 AM IST

(योषिता सिंह)

संयुक्त राष्ट्र, 24 जून (भाषा) भारत ने चीन और पाकिस्तान द्वारा आयोजित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक में जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान की ‘‘अनावश्यक’’ टिप्पणी की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह केंद्रशासित प्रदेश देश का ‘‘पूरी तरह आंतरिक’’ मामला है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने ‘कार्यान्वयन की खाई को पाटना: सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना’ विषय पर मंगलवार को आयोजित सुरक्षा परिषद की ‘अर्रिया-फॉर्मूला’ बैठक में यह टिप्पणी की।

हरीश ने कहा, ‘‘मैं पाकिस्तान के प्रतिनिधि द्वारा की गई अनावश्यक टिप्पणियों का भी उल्लेख करना चाहूंगा। यह अविश्वसनीय है कि जिस सह-अध्यक्ष से संतुलित और निष्पक्ष आचरण की अपेक्षा थी, उसने इस मंच का राजनीतिकरण करने का विकल्प चुना।’’

उन्होंने कहा, ‘‘समय की कमी को देखते हुए मैं केवल इतना कहना चाहूंगा कि केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है। यह हमेशा से ऐसा रहा है, अब भी है और आगे भी रहेगा।’’

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत आसिम इफ्तिखार अहमद ने बैठक में अपने संबोधन के दौरान जम्मू कश्मीर का मुद्दा उठाया था जिसके बाद हरीश ने यह टिप्पणी की। बैठक का आयोजन संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और चीन के स्थायी मिशनों ने किया था।

पाकिस्तान 2025 और 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का अस्थायी सदस्य है।

भारत लगातार कहता रहा है कि संपूर्ण जम्मू कश्मीर और लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा हैं तथा हमेशा बने रहेंगे।

कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। नयी दिल्ली किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को दृढ़ता से खारिज करती रही है और उसका कहना है कि जम्मू कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है।

‘अर्रिया-फॉर्मूला’ बैठकें अनौपचारिक और गोपनीय बैठकें होती हैं जिनमें सुरक्षा परिषद के सदस्य और आमंत्रित प्रतिभागी देश लचीली व्यवस्था में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इस प्रारूप का नाम वेनेजुएला के पूर्व राजदूत डिएगो अर्रिया के नाम पर रखा गया है जिन्होंने 1992 में इसकी शुरुआत की थी।

हरीश ने चर्चा के व्यापक विषय पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर में अध्याय छह और सात के तहत संघर्षों से निपटने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं दी गई हैं।

उन्होंने कहा कि इन दोनों अध्यायों की प्रकृति अलग है और विभिन्न परिस्थितियों में इनकी उपयोगिता भी अलग-अलग होती है।

हरीश ने कहा कि अध्याय सात के तहत उपाय शांति को खतरे, शांति भंग होने और आक्रामक कार्रवाई से जुड़ी परिस्थितियों में ‘‘अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने या बहाल करने’’ के उद्देश्य से किए जाते हैं तथा इन्हें लागू नहीं करने के ‘‘गंभीर परिणाम’’ हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अध्याय छह ‘‘मूल रूप से अलग’’ है और यह उन परिस्थितियों से निपटने के लिए कई विकल्प उपलब्ध कराता है जिनके कारण अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि जिन प्रस्तावित तरीकों पर विचार किया जा सकता है, उनमें बातचीत, जांच, मध्यस्थता और सुलह शामिल हैं। इन तरीकों पर विचार करते समय संबंधित पक्षों द्वारा पहले से अपनाई गई प्रक्रियाओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।

हरीश ने कहा, ‘‘ये उपाय मौजूदा हालात को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं और हमेशा के लिए मान्य नहीं होते। बदलती परिस्थितियों और संदर्भों के अनुसार इनकी समीक्षा की जानी चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एजेंडे में दशकों से शामिल मुद्दे इस संबंध में अहम सबक देते हैं। इसका एक उदाहरण फलस्तीन मुद्दा है जिसमें संघर्ष की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप मध्यस्थता के प्रारूप लगातार बदलते रहे हैं।’’

हरीश ने कहा, ‘‘पुराने हो चुके मध्यस्थता प्रारूपों की समीक्षा किए जाने का स्पष्ट आधार मौजूद है। यह मानना गलत है कि अध्याय छह के तहत मध्यस्थता का कोई उपाय हमेशा लागू रहेगा।’’

भारत ने यह भी कहा कि सदस्य देश संयुक्त राष्ट्र की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए ‘यूएन80’ पहल के तहत महासभा के अधिकार क्षेत्रों की समीक्षा कर रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा परिषद के अधिकार क्षेत्रों को ऐसी समीक्षा से बाहर रखने का कोई कारण नहीं है।

भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की लंबे समय से मांग करता रहा है। उसका कहना है कि 15 सदस्यीय परिषद का मौजूदा ढांचा पुराना हो चुका है और यह समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता।

सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर नयी दिल्ली की दावेदारी को कई देशों का समर्थन मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य-चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका तथा दो वर्ष के कार्यकाल के लिए निर्वाचित 10 अस्थायी सदस्य होते हैं।

भाषा

सिम्मी मनीषा

मनीषा