स्टॉर्मर के इस्तीफे से उठा सवाल: क्या आज के ब्रिटेन में कोई प्रधानमंत्री लंबे समय तक टिक सकता है?

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स्टॉर्मर के इस्तीफे से उठा सवाल: क्या आज के ब्रिटेन में कोई प्रधानमंत्री लंबे समय तक टिक सकता है?

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  • Publish Date - June 24, 2026 / 01:45 PM IST,
    Updated On - June 24, 2026 / 01:45 PM IST

( निकोलस डिकिन्सन, यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर )

एक्सेटर (ब्रिटेन), 24 जून (द कन्वरसेशन) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और लेबर पार्टी के नेता केअर स्टॉर्मर के इस्तीफे ने एक बार फिर यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मौजूदा ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में कोई प्रधानमंत्री लंबे समय तक सत्ता में टिक सकता है ?

स्टॉर्मर पिछले एक दशक में पद छोड़ने वाले छठे ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने लेबर पार्टी के नेतृत्व से इस्तीफा दिया, जिसके बाद उनके प्रधानमंत्री पद से हटने का रास्ता भी साफ हो गया है।

खबरों के अनुसार, मेकरफील्ड उपचुनाव में एंडी बर्नहम की निर्णायक जीत के बाद स्टॉर्मर पर पार्टी और मंत्रिमंडल के भीतर दबाव तेजी से बढ़ गया था। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से पद पर बने रहने की बात कही थी, लेकिन अंततः बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

विश्लेषकों का कहना है कि स्टॉर्मर ने अपने इस्तीफे की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत व्यवस्थित रखने की कोशिश की, ताकि सत्ता हस्तांतरण हाल के वर्षों में बोरिस जॉनसन और लिज़ ट्रस जैसे प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल समाप्त होने के दौरान देखी गई राजनीतिक अव्यवस्था से अलग हो।

स्टॉर्मर अत्यधिक लोकप्रिय नेता नहीं माने जाते थे। चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी लोकप्रियता में हल्का सुधार हुआ, लेकिन यह सुधार अस्थायी साबित हुआ। सर्वेक्षणों में उनका समर्थन स्तर मामूली बढ़त के बाद फिर स्थिरता और बाद में गिरावट की ओर चला गया।

तुलनात्मक रूप से, पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को 1997 में सत्ता में आने के बाद भारी जनसमर्थन मिला था, जबकि 2010 में गठबंधन सरकार बनने के बाद डेविड कैमरन की लोकप्रियता में भी उछाल आया था। इसके विपरीत, स्टॉर्मर को सत्ता संभालने के बाद केवल सीमित और अस्थिर समर्थन ही मिल सका।

विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि भारी संसदीय बहुमत होने के बावजूद स्टॉर्मर की स्थिति उतनी मजबूत नहीं थी जितनी दिखाई देती थी। इसी तरह 2019 के चुनाव के बाद बोरिस जॉनसन को भी लंबे समय तक सत्ता में बने रहने वाला नेता माना गया था, लेकिन वह तीन वर्ष से कुछ अधिक समय में ही पद से हट गए।

स्टॉर्मर के राजनीतिक पतन की तुलना उनके पूर्ववर्ती जेरेमी कॉर्बिन के अनुभव से भी की गई है। दोनों नेताओं के समर्थन में गिरावट के पीछे समान स्थिति देखी गयी—शुरुआती उम्मीदों के बाद तेजी से विश्वास में कमी।

विश्लेषण के अनुसार, 2017–19 और 2022–24 के दौरान लेबर पार्टी की बढ़त मुख्य रूप से सरकार विरोधी असंतोष के कारण थी, न कि पार्टी के प्रति मजबूत समर्थन के कारण। इसी कारण यह बढ़त टिकाऊ साबित नहीं हुई।

2024 के चुनाव में लेबर पार्टी को लगभग 64 प्रतिशत सीटें मिलीं, जबकि वोट शेयर केवल 34 प्रतिशत रहा, जिसे इतिहास में सबसे कम जनाधार वाली बहुमत सरकारों में से एक बताया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि स्टॉर्मर को एक ओर ‘रिफॉर्म यूके’ जैसे दलों से चुनौती मिली, जो पारंपरिक श्रमिक वर्ग के क्षेत्रों में लेबर के वोटों में सेंध लगाते हैं, जबकि दूसरी ओर ग्रीन पार्टी और गाजा समर्थक निर्दलीय उम्मीदवारों ने शहरी प्रगतिशील मतदाताओं को आकर्षित किया। इसके कारण लेबर पार्टी का वोट बैंक कमजोर हुआ। परिणामस्वरूप उपचुनावों में हार, स्थानीय चुनावों में खराब प्रदर्शन और स्कॉटलैंड में भी कमजोर स्थिति सामने आई।

लेख में यह भी कहा गया है कि 2016 के ब्रेक्जिट जनमत संग्रह के लगभग एक दशक बाद भी ब्रिटेन की राजनीति उसी विभाजन रेखा से प्रभावित है। हालांकि समय के साथ यह विवाद पृष्ठभूमि में चला गया है, लेकिन इसके प्रभाव राजनीतिक ध्रुवीकरण के रूप में आज भी मौजूद हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिटिश राजनीति अब दो बड़े ध्रुवों में बंटी हुई है, जहां मतदाता पहचान-आधारित राजनीतिक खेमों में बंधे हुए हैं। ऐसे में किसी भी प्रधानमंत्री के लिए विविध विचारधाराओं को एक साथ जोड़कर स्थिर राजनीतिक गठबंधन बनाए रखना लगातार कठिन होता जा रहा है।

इसी संदर्भ में स्टॉर्मर का इस्तीफा केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक असफलता नहीं, बल्कि उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है जिसमें ब्रिटेन में प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल पहले की तुलना में अधिक अस्थिर और अल्पकालिक होता जा रहा है।

द कन्वरसेशन मनीषा वैभव

वैभव