क्या उष्णलहर की वजह जलवायु परिवर्तन है? असली सवाल कुछ और है
क्या उष्णलहर की वजह जलवायु परिवर्तन है? असली सवाल कुछ और है
(हेली जे. फाउलर, न्यूकैसल विश्वविद्यालय; और एड हॉकिन्स, रीडिंग विश्वविद्यालय)
लंदन, एक अगस्त (द कन्वरसेशन) इस गर्मी में जब ब्रिटेन भीषण उष्णलहर की चपेट में रहा, तब टेलीविजन स्टूडियो और रेडियो कार्यक्रमों में बार-बार एक ही सवाल पूछा गया-‘‘क्या इस उष्णलहर की वजह जलवायु परिवर्तन है?’’
लेकिन यह सही सवाल नहीं है।
उष्णलहर कोई नयी घटना नहीं है। यह मौसम का एक स्वाभाविक चक्र है, जो लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों के कारण पैदा होता है। जिस प्रकार वर्ष 1976 की ऐतिहासिक गर्मी जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं आई थी, उसी प्रकार जून 2026 की उष्णलहर भी जलवायु परिवर्तन की प्रत्यक्ष देन नहीं है।
असल सवाल यह नहीं है कि उष्णलहर का कारण जलवायु परिवर्तन है या नहीं, बल्कि यह है कि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से वातावरण में बढ़ी ग्रीनहाउस गैस ने इन उष्णलहरों को कितना अधिक गर्म और खतरनाक बना दिया है।
इसी विषय का अध्ययन कारण-निर्धारण विज्ञान (एट्रिब्यूशन साइंस) करता है। यह विज्ञान यह समझने का प्रयास करता है कि वातावरण में अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसों के कारण किसी उष्णलहर की तीव्रता कितनी बढ़ गई। इसने चरम मौसमी घटनाओं को समझने के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बदल दिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस विषय पर सार्वजनिक विमर्श भी विज्ञान के अनुरूप आगे बढ़े।
जलवायु परिवर्तन पर होने वाली चर्चा में जिस बात की सबसे अधिक अनदेखी होती है, वह ‘‘मानव-जनित जलवायु परिवर्तन’’ नहीं, बल्कि ‘‘जीवाश्म ईंधनों से होने वाला उत्सर्जन’’ है।
आज आने वाली हर उष्णलहर ऐसे वातावरण में विकसित होती है, जो सौ वर्ष पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्म है और जिसमें ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी कहीं अधिक है। यही कारण है कि आज की प्रत्येक उष्णलहर, अतिरिक्त उत्सर्जन न होने की स्थिति की तुलना में अधिक गर्म होती है।
हमारे शोध से यह तथ्य स्पष्ट होता है। जब हमने 1976 में ब्रिटेन में आई उष्णलहर जैसी ही वायुमंडलीय परिस्थितियों को आज की जलवायु में दोबारा तैयार किया, तो पाया कि अधिकतम तापमान लगभग तीन से चार डिग्री सेल्सियस अधिक था। मौसम का स्वरूप वही था, लेकिन जिस जलवायु में वह घटना घटित हुई, वह बदल चुकी थी।
जलवायु परिवर्तन उष्णलहर पैदा नहीं करता, बल्कि उसके लिए परिस्थितियों को अधिक अनुकूल बना देता है। उष्णलहर आएगी या नहीं, यह अब भी मौसम की स्वाभाविक परिवर्तनशीलता तय करती है, लेकिन जीवाश्म ईंधनों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैस उसे अधिक गर्म, अधिक तीव्र, रिकॉर्ड तोड़ने वाली तथा स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे दोनों के लिए अधिक नुकसानदेह बना देती हैं।
यही सिद्धांत अत्यधिक वर्षा, सूखा और बाढ़ पर भी लागू होता है।
इसके पीछे का विज्ञान बेहद सरल है। वातावरण को राजनीति से कोई सरोकार नहीं होता। वह केवल ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। कोयला, तेल और गैस के उपयोग से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का प्रत्येक अतिरिक्त टन वातावरण में जुड़ता है और चरम मौसमी घटनाओं के अधिक विनाशकारी होने की आशंका बढ़ा देता है।
इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन पर हमारी चर्चा प्रायः इसी दृष्टिकोण से नहीं होती।
वैज्ञानिक और पत्रकार अक्सर ‘‘मानव-जनित जलवायु परिवर्तन’’ शब्द का प्रयोग करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से यह सही है, लेकिन यह कारण नहीं, बल्कि उसके परिणाम का वर्णन करता है। इससे लोगों का ध्यान सबसे पहले अपने व्यक्तिगत व्यवहार की ओर चला जाता है-जैसे उन्होंने पिछले वर्ष हवाई यात्रा की या नहीं, कचरे का पुनर्चक्रण किया या नहीं अथवा उन्हें निजी वाहन का उपयोग कम करना चाहिए।
व्यक्तिगत निर्णय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कहानी की शुरुआत यहां से नहीं होती। इसकी शुरुआत होती है जीवाश्म ईंधनों से है।
दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन का लगभग तीन-चौथाई और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से आता है। इनके लगातार बढ़ते उत्सर्जन ने पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन को बदल दिया है और उस जलवायु को भी, जिसमें आज हर मौसमी घटना घटित होती है।
इस सरल वैज्ञानिक तथ्य के धुंधला पड़ने का एक कारण ‘‘व्यक्तिगत कार्बन उत्सर्जन’’ की अवधारणा भी रही। वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में बीपी के ‘‘बियॉन्ड पेट्रोलियम’’ अभियान ने इसे लोकप्रिय बनाया और लोगों का ध्यान अपने व्यक्तिगत उत्सर्जन तक सीमित कर दिया।
इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्तियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है। व्यक्तिगत विकल्प और प्रयास समाधान का हिस्सा हैं, लेकिन इस अभियान ने लोगों का ध्यान उस मूल चुनौती से भटका दियाजिसमें अधिकांश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाना आवश्यक है।
कम समय तक स्नान करने या पूरी लगन से पुनर्चक्रण करने जैसे व्यक्तिगत प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे बिजली उत्पादन, परिवहन, उद्योग और घरेलू ऊर्जा व्यवस्था को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त बनाने की आवश्यकता की भरपाई नहीं कर सकते।
इसलिए यह पूछने के बजाय कि किसी उष्णलहर का कारण जलवायु परिवर्तन है या नहीं, हमें यह समझाना चाहिए कि जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें लगातार वातावरण में जमा हो रही हैं, गर्मी को रोक रही हैं और चरम मौसमी घटनाओं को और अधिक तीव्र बना रही हैं।
इसी वजह से आज की हर उष्णलहर पहले की तुलना में अधिक गर्म, अधिक बार आने वाली और अधिक खतरनाक होती जा रही है। जब तक जीवाश्म ईंधनों से होने वाला उत्सर्जन वातावरण में बढ़ता रहेगा, उष्णलहरें भी लगातार अधिक तीव्र होती जाएंगी।
वर्ष 2026 में यूरोप में पड़ी रिकॉर्ड तोड़ उष्णलहर और जंगलों में लगी भीषण आग इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का दूर का खतरा नहीं रह गया है। उसका असर आज हमारे आसपास के मौसम में साफ दिखाई दे रहा है। राजनीति या सार्वजनिक बहस चाहे जैसी भी हो, वातावरण ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के अनुरूप ही प्रतिक्रिया करता रहेगा।
आज जिस जलवायु में हम रह रहे हैं, वह हमारे जीवनकाल की सबसे कम चरम जलवायु है, क्योंकि जीवाश्म ईंधनों से होने वाला उत्सर्जन अब भी जारी है।
अब समय आ गया है कि जलवायु परिवर्तन पर सार्वजनिक विमर्श वैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप हो। यदि हम भविष्य में तापमान वृद्धि को सीमित करने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं, तो हमें जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन में तेजी से कमी लानी होगी। साथ ही, अपने घरों, बुनियादी ढांचे और समुदायों को उस जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम बनाना होगा, जिसकी आहट हम आज ही महसूस कर रहे हैं।
द कन्वरसेशन खारी नेत्रपाल
नेत्रपाल

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