म्यांमा में तख्तापलट के पांच साल बाद भी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक संकट बरकरार

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म्यांमा में तख्तापलट के पांच साल बाद भी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक संकट बरकरार

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  • Publish Date - January 28, 2026 / 11:26 AM IST,
    Updated On - January 28, 2026 / 11:26 AM IST

(एडम सिंपसन, एडिलेड विश्वविद्यालय )

एडिलेड (आस्ट्रेलिया), 28 जनवरी (द कन्वरसेशन) म्यांमा में सेना द्वारा तख्तापलट किए जाने के पांच साल पूरे होने के बाद भी देश आज गंभीर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है।

म्यांमा में एक फरवरी 2021 को निर्वाचित सरकार को अपदस्थ कर सैन्य शासन लागू किया गया था। इसके बाद लोकतांत्रिक नेताओं को गिरफ्तार किया गया, निर्वासित किया गया या उन्हें भूमिगत होना पड़ा।

तख्तापलट के बाद से म्यांमा की अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर होती गई है। विदेशी निवेशक देश छोड़ चुके हैं और वैध आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं। इसके विपरीत, घोटाले, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियां फल-फूल रही हैं, जिनसे केवल सीमित वर्ग को लाभ मिल रहा है। मुद्रा का मूल्य गिरकर पांच साल पहले के मुकाबले लगभग एक-चौथाई रह गया है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है।

सैन्य जुंटा ने नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रताओं पर कड़े प्रतिबंध लगाकर सत्ता बनाए रखी है। जबरन सैन्य भर्ती के जरिए सेना ने अपनी ताकत बढ़ाई है जिसमें बच्चों को भी सेना में भर्ती किया जाना शामिल है।

इसके बावजूद उसे देश के कई हिस्सों में जातीय और लोकतंत्र समर्थक सशस्त्र समूहों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

हाल में संपन्न हुए एक महीने लंबे चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं माना जा रहा है। मतदान केवल उन्हीं क्षेत्रों में कराया गया, जो सेना के नियंत्रण में हैं, जबकि विपक्ष के समर्थन वाले इलाकों में चुनाव नहीं हुए। इससे बड़ी संख्या में मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह गए।

प्रमुख विपक्षी दल ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी’ (एनएलडी) पर प्रतिबंध है और आंग सान सू ची सहित इसके शीर्ष नेता जेल में हैं। चुनाव की आलोचना करना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

इन परिस्थितियों में सैन्य समर्थित ‘यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी’ (यूएसडीपी) का सत्ता में आना लगभग तय माना जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि ये चुनाव केवल सैन्य प्रशासन को वैधता का एक दिखावटी आधार देंगे, जिससे कुछ देश उसके साथ संबंध सामान्य करने का प्रयास कर सकते हैं।

देश के भविष्य को लेकर सबसे बड़ी चिंता उसके संभावित विघटन को लेकर है। तख्तापलट के बाद कई क्षेत्र पूरी तरह विपक्षी और जातीय सशस्त्र समूहों के नियंत्रण में चले गए हैं। कुछ समूहों द्वारा स्वतंत्रता या स्वायत्तता की घोषणाएं भी सामने आई हैं, जिससे म्यांमा के विभिन्न हिस्सों में बिखराव का खतरा बढ़ गया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हालात जटिल बने हुए हैं। म्यांमा की सेना अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार के आरोपों का सामना कर रही है, लेकिन वैश्विक शक्तियों के रुख को देखते हुए इन मामलों का व्यावहारिक असर सीमित माना जा रहा है। वहीं, आसियान के कुछ देश अब जुंटा के प्रति नरमी दिखाते नजर आ रहे हैं।

कुल मिलाकर, पांच साल बाद भी म्यांमा न तो राजनीतिक स्थिरता हासिल कर पाया है और न ही आर्थिक सुधार की राह पर लौट सका है। त्रुटिपूर्ण चुनाव, बढ़ता दमन और गहराता विभाजन देश को एक अनिश्चित और संकटपूर्ण भविष्य की ओर ले जाते दिखाई दे रहे हैं।

( द कन्वरसेशन )

मनीषा खारी

खारी