‘मां से अच्छा कोई नहीं’: स्कूल अब भी संपर्क करने के लिए मां को ही फोन करते हैं

‘मां से अच्छा कोई नहीं’: स्कूल अब भी संपर्क करने के लिए मां को ही फोन करते हैं

‘मां से अच्छा कोई नहीं’: स्कूल अब भी संपर्क करने के लिए मां को ही फोन करते हैं
Modified Date: August 5, 2026 / 05:32 pm IST
Published Date: August 5, 2026 5:32 pm IST

(लॉरा के. जी, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी; क्रिस्टी बुजार्ड, सिरैक्यूज यूनिवर्सिटी और ओल्गा स्टोडार्ड, ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी)

सिडनी, पांच अगस्त (द कन्वरसेशन) स्कूल का नया सत्र शुरू होते ही अभिभावकों के सामने जिम्मेदारियों की एक लंबी सूची आ जाती है। इसमें बच्चों के लिए स्कूल का सामान खरीदना, फॉर्म का ध्यान रखना, आने-जाने की व्यवस्था करना और शिक्षकों एवं स्कूल प्रशासन के लगातार आने वाली ईमेल का जवाब देना शामिल होता है।

कई परिवार इन जिम्मेदारियों को आपस में बांटने की कोशिश करते हैं, लेकिन शोध में बार-बार यही पाया गया है कि बच्चों के स्कूल से जुड़े ज्यादातर काम अक्सर माताएं ही करती हैं।

इसमें सिर्फ स्कूल के कार्यक्रमों में शामिल होना या बच्चे के लिए भोजन पैक करना ही शामिल नहीं है, बल्कि ऐसी कई जिम्मेदारियां होती हैं जो मामूली नजर आती हैं जैसे – डॉक्टर से मिलने का समय तय करना, स्कूल के बाद की गतिविधियों में उन्हें शामिल करना और शिक्षकों एवं स्कूल प्रशासक के ईमेल या फोन कॉल का जवाब देना।

हम अर्थशास्त्री हैं और लैंगिक समानता तथा परिवारों से जुड़े विषयों का अध्ययन करते हैं। हम यह समझना चाहते थे कि क्या स्कूल भी अनजाने में इस असमानता को बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि वे पिता की तुलना में माताओं से अधिक संपर्क करते हैं। हमारे हालिया शोध से संकेत मिलता है कि ऐसा वास्तव में हो रहा है।

स्कूल सबसे पहले किससे संपर्क करते हैं?

अर्थशास्त्रियों और दूसरे सामाजिक वैज्ञानिकों ने लंबे समय से यह माना है कि बच्चों की देखभाल में पिता की तुलना में माताएं अधिक समय बिताती हैं, भले ही दोनों माता-पिता पूर्णकालिक काम करते हों। हालांकि पिछले कुछ दशकों में अधिक से अधिक पुरुषों ने बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियां संभालनी शुरू की है, फिर भी महिलाएं अपने बच्चों और घर की देखभाल में अधिक समय बिताती हैं।

यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियों को बांटना केवल माता-पिता के काम के समय को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि कई अन्य पहलुओं पर भी असर डालता है। यह दीर्घकालिक तनाव और अत्यधिक थकान का कारण बन सकता है तथा दंपति के बीच काम के निष्पक्ष बंटवारे को लेकर तनाव की भावना भी आ सकती है।

यह माता-पिता के काम के घंटों, तरक्की के मौकों और उनकी कमाई पर असर डालकर उनके करियर को भी प्रभावित कर सकता है।

साल 2022 की गर्मियों में हमने अमेरिका के 80 हजार से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के प्रधानाचार्यों को शामिल करते हुए एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन किया। इस प्रयोग में स्कूलों को एक काल्पनिक परिवार से ईमेल भेजा गया, जिसमें माता और पिता दोनों अपने बच्चे का दाखिला कराने में दिलचस्पी दिखा रहे थे। ईमेल में दोनों अभिभावकों के नाम और फोन नंबर दिए गए थे और प्रधानाचार्य से अनुरोध किया गया था कि वे दोनों में से किसी एक को फोन करें।

ईमेल में नाम और भाषा को अलग-अलग तरीके से बदलकर हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या अभिभावक का लिंग इस बात को प्रभावित करता है कि स्कूल किसे वापस फोन करता है।

और परिणाम में हमें ऐसा ही कुछ मिला।

जब दोनों में से कोई भी अभिभावक दूसरे की तुलना में अधिक उपलब्ध नहीं दिख रहा था, तब माताओं को पिता की तुलना में पहला फोन मिलने की संभावना लगभग 1.4 गुना अधिक थी।

जिन प्रधानाचार्यों ने अभिभावकों में से किसी एक को वापस फोन किया, उनमें से लगभग 60 प्रतिशत ने पहले मां से और 40 प्रतिशत ने पिता से संपर्क किया।

हमने यह भी देखा कि जब ईमेल में साफ तौर पर बताया गया कि पिता बात करने के लिए अधिक उपलब्ध हैं, तो प्रधानाचार्यों द्वारा उन्हें कॉल करने की संभावना काफी बढ़ गई। हालांकि कई मामलों में ऐसा लिखे होने के बावजूद स्कूलों ने माताओं को ही फोन करना उचित समझा।

एक अन्य छोटे लेकिन महत्वपूर्ण संकेत का भी असर दिखा। जब पिता ने ईमेल भेजा और उसमें मां को भी शामिल किया, तो स्कूलों के उनके संपर्क करने की संभावना बढ़ गई। फिर भी, ऐसे मामलों में भी माताओं को काफी संख्या में फोन किए गए।

एक व्यापक स्थिति

स्कूल बच्चों से जुड़ी जिम्मेदारियों का केवल एक हिस्सा हैं।

पहले के कई शोध से पता चला है कि डॉक्टर से मिलने का समय तय करने, बच्चों की अतिरिक्त गतिविधियों की व्यवस्था करने और परिवार की दिनचर्या को सुचारू रखने वाली कई पर्दे के पीछे की जिम्मेदारियां निभाने में माताएं पिता की तुलना में अधिक सक्रिय रहती हैं। इन जिम्मेदारियों को अक्सर ‘‘मानसिक बोझ’’ कहा जाता है, क्योंकि इनमें योजना बनाना, निगरानी रखना और समन्वय करना शामिल होता है।

हमारे शोध से संकेत मिलता है कि स्कूल और अन्य संस्थान अनजाने में इस मानसिक बोझ को बढ़ा सकते हैं, क्योंकि वे अपनी अधिकतर जरूरतों और सूचनाओं के लिए माताओं से संपर्क करते हैं।

हमारे प्रयोग के साथ किए गए सर्वेक्षणों में शिक्षकों और परिवारों से नियमित संपर्क रखने वाले अन्य लोगों, जैसे बच्चों की देखभाल करने वाले कर्मचारी, खेल प्रशिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी ने भी बताया कि वे पिता की तुलना में माताओं से अधिक संपर्क करते हैं।

एक फोन कॉल भले ही छोटी बात लग सकती है लेकिन स्कूल की पूरी पढ़ाई के दौरान, इसके अलावा चिकित्सकों, खेल टीम, शिविरों तथा अन्य गतिविधियों में संपर्क का प्रमुख माध्यम होने के कारण इस तरह के फोन कॉल माताओं के लिए बड़ा बोझ बन सकते हैं।

यह नजरिया यह समझने में भी मदद करता है कि समान जिम्मेदारियां बांटने की कोशिश करने वाले दंपतियों में भी बच्चों की देखभाल से जुड़ी लैंगिक असमानताएं क्यों बनी रह सकती हैं।

कई स्कूल परिवारों को यह सुविधा देते हैं कि वे तय कर सकें कि सबसे पहले किससे संपर्क किया जाए या अलग-अलग परिस्थितियों के लिए अलग-अलग संपर्क व्यक्ति को चुन सकें।

द कन्वरसेशन सुरभि नरेश

नरेश


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